घाट चढ़ी तो सागर में गले-गले डूबी सरकार: बालाघाट और सागर तक राजनेता व नौकरशाही विफल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश सरकार एक संकट से निकलती है तो दूसरा संकट सामने खड़ा हो जाता है। बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत और अब सागर में कथित जहरीली शराब से मौतों ने सरकार, नौकरशाही और स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बालाघाट में दुर्गम बैगा इलाकों तक समय पर स्वास्थ्य सेवाएं और इलाज नहीं पहुंच सका। सागर में जहरीली शराब ने लोगों की जान ले ली। दोनों घटनाओं में सवाल एक ही है- सिस्टम तब क्यों जागा, जब मौतें हो गईं?
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पूरे समय सक्रिय नजर आते हैं, लेकिन वह अकेले कब तक व्यवस्था संभालेंगे? जिस नौकरशाही और अपने नेताओं के भरोसे मुख्यमंत्री हैं, वही हर समय संकट का कारण बनी पाई जाती है और उसके किए धरे की कीमत मुख्यमंत्री के खाते में जमा हो जाती है।
हालांकि मुख्यमंत्री सिस्टम में कसावट लाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहे, फिर भी बेहतर सलाहकारों की कमी से व्यवस्था गैर जिम्मेदारी के रास्ते पर चल रही है। सरकार की योजनाओं को जमीन पर उतारने वाली नौकरशाही और स्थानीय विधायक-सांसदों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
समस्या केवल अधिकारियों को हटाने या जांच बैठाने से खत्म नहीं होगी। जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदारी तय हो और ऐसा सिस्टम बने, जो हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले सक्रिय नजर आए।
अब बालाघाट और इसके जैसे इलाकों को वहां की जरूरत और प्राकृतिक संतुलन के हिसाब से विकसित किया जाना जरूरी है। शराब के सागर से प्रदेश को उभारा जाए, शराबबंदी के लिए फिर से वातावरण तैयार होना चाहिए। नशा मुक्ति की तरह शराबबंदी भी जरूरी है। नहीं तो प्रजा और सरकार इसी तरह शराब के सागर में डूबती रहेगी।
बालाघाट में बच्चों की मार्मिक और असमय हुई मृत्यु से सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक बदनाम होना पड़ा है। बालाघाट हो या झाबुआ या मंडल अथवा डिंडोरी, इनका संतुलित या टिकाऊ विकास भाजपा की बीते 18 बरस की सरकार में नहीं हो पाया।
इस समय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के ढाई वर्ष में सुदूर दुर्गम आदिवासी इलाकों में बेहतर सुविधाएं उनके जिम्मेदार मंत्री और अफसर खड़ी नहीं कर पाए। केंद्र और राज्य की सरकारों को एक्सप्रेस हाईवे और स्टेट हाईवे से निकलकर या थोड़ी फुरसत पाकर दुर्गम इलाकों में जीने योग्य जरूरी सुविधाओं का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना चाहिए, जो अभी तक की सरकारों की प्राथमिकता में होते हुए भी नहीं रहा है। यानी विकास भ्रष्टाचार का पर्याय बना हुआ है।
केंद्र की टीम के अनुसार अब तक 32 हजार से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है, लेकिन यही आंकड़े एक दूसरा सवाल भी खड़ा करते हैं। अगर हजारों लोगों की स्क्रीनिंग, हजारों बच्चों का टीकाकरण और सैकड़ों जलस्रोतों की सफाई मौतों के बाद तेज करनी पड़ी, तो क्या यह कार्रवाई पहले नहीं हो सकती थी?
असली सवाल इससे आगे का है- अगर ये बीमारियां पहचानी और इलाज योग्य थीं, तो दूरदराज के बैगा गांवों तक स्वास्थ्य व्यवस्था समय पर क्यों नहीं पहुंच सकी? आदिवासी बहुल दूर-दराज के ऐसे इलाकों में आजादी के 80 बरस बाद भी पहुंच मार्ग तक सरकार से नहीं बन पाए हैं।
दुर्गम इलाकों तक सुविधा पहुंच नहीं पाती या बेहद चुनौतीपूर्ण तरीके से पहुंचानी होती है, जैसा कि डिंडोरी क्षेत्र के जनजातीय विषयों के जानकार और जनजाति शोधकर्ता दीपांशु धुर्वे कहते हैं कि बालाघाट हो या मंडला, डिंडोरी... सभी जगह विकास के नाम पर आने वाला पैसा भ्रष्टाचार का पर्याय बना हुआ है।
जिले के मुखिया से लेकर पंचायत तक प्रशासनिक तंत्र के हालात चिंताजनक हैं। बालाघाट के इन इलाकों में और ऐसे ही अन्य कई क्षेत्र हैं, जहां पहुंच मार्ग के नाम पर पगडंडी है। गांव और फलिया दूर इलाकों में फैले हैं। राजनेता चुनाव जीतकर सिर्फ ऐशो-आराम में डूबे रहते हैं। सरकारी तंत्र के ऐसे गैर जिम्मेदारीपूर्ण हालात इंदौर के भागीरथपुरा से लेकर बालाघाट तक जगह-जगह जड़ें जमाए हुए हैं।
अभी तक इसे प्रशासन की लापरवाही से हुई मौतें कहना जांच पूरी होने से पहले जल्दबाजी होगी, लेकिन समय पर सूचना न मिलना, दुर्गम गांवों में स्वास्थ्य निगरानी की कमजोरी और दो जिला अधिकारियों को हटाया जाना प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न जरूर खड़े करता है।
क्या बड़े प्रशासनिक अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?.... अभी उपलब्ध रिपोर्टों में कलेक्टर या जिला प्रशासन के किसी शीर्ष अधिकारी को हटाने की पुष्टि नहीं मिलती, बल्कि 27 अगस्त को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने अलग से जांच शुरू की। स्वास्थ्य, मलेरिया, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, महिला एवं बाल विकास तथा जनजातीय विभाग की भूमिका और संभावित चूक की जांच के लिए रिकॉर्ड मांगे।
जब स्वास्थ्य विभाग को तीन बच्चों की मौत के बाद घटना की जानकारी मिली, तो क्या यह केवल दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों की समस्या थी या सरकारी निगरानी तंत्र की विफलता? सरकार ने जिला टीकाकरण और मलेरिया अधिकारियों को तो हटा दिया, लेकिन क्या उस समय की निगरानी व्यवस्था के लिए वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी?
एक और महत्वपूर्ण तथ्य है कि सितंबर की शुरुआत तक सरकार बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग, अतिरिक्त एमआर टीकाकरण और अन्य स्वास्थ्य उपाय कर रही थी, जबकि विपक्ष ने स्वास्थ्य, पोषण और मूलभूत सेवाओं की विफलता को लेकर जवाबदेही मांगी है।
बालाघाट के तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. परेश उपलप के अनुसार स्वास्थ्य विभाग को बच्चों की मौतों की जानकारी तीन बच्चों की मौत के बाद मिली। प्रभावित गांव अत्यंत दुर्गम थे और स्वास्थ्य टीमों को वहां पहुंचने में कठिनाई हुई। बाद में कुछ परिवार बच्चों को अस्पताल भेजने के लिए तैयार नहीं थे और पुलिस की मदद लेनी पड़ी।
22 अगस्त को उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने कार्रवाई करते हुए जिला टीकाकरण अधिकारी और जिला मलेरिया अधिकारी को पद से हटाने के निर्देश दिए। रिपोर्ट के अनुसार जिला टीकाकरण अधिकारी डॉ. परेश उपलप और जिला मलेरिया अधिकारी मनीषा जुनेजा को हटाया गया। सरकार ने कहा कि जांच में लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदारी तय की जाएगी।
कुपोषण ने बीमारी को कितना घातक बनाया?
केंद्र की स्क्रीनिंग में 7,711 बच्चों में गंभीर कुपोषण पाया गया, जिनमें 518 बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्रों में भर्ती कराया गया। 13,406 बच्चों में डायरिया और 274 में गंभीर निमोनिया की पहचान हुई। इससे यह स्पष्ट होता है कि मामला केवल संक्रमण का नहीं है। एक कमजोर और कुपोषित बच्चे के लिए खसरा या मलेरिया जैसी बीमारी कहीं ज्यादा खतरनाक साबित होती है।
दुर्गम, इसलिए बालाघाट नाम है
बालाघाट क्षेत्र सतपुड़ा पर्वतमाला और उसके घाटों वाला इलाका है। नाम का संबंध इसी भौगोलिक स्वरूप से जोड़ा जाता है। पुराने समय में यह क्षेत्र गोंड शासकों के प्रभाव में रहा और बाद में मराठा तथा ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आया। ब्रिटिशकाल में 1867 में बालाघाट जिला बनाया गया। उस समय इसे भंडारा जिले से अलग करके प्रशासनिक इकाई के रूप में गठित किया गया था।
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