कंठ में विष और माथे पर चंद्र: सावन के पहले सोमवार पर जगती है ‘शिव संकल्प’ की महाशक्ति
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संवाददाता

जब जल की एक बूंद से शांत हुआ था सृष्टि का संताप, शिवजी को क्यों प्रिय है यह दिन? मन को शीतल रख लें आराधना का संकल्प
हलाहल से शीतलता तक शिव-संकल्प और साधना का महापर्व, आस्था और नक्षत्रों का संगम:कैसे जगाएं अपना ‘शिव-तत्व’?
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
श्रावण का पहला सोमवार केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है; यह प्रकृति, भक्ति और पौराणिक इतिहास का वह मुहाना है जहां से शिव-तत्व का उत्सव शुरू होता है। हलाहल के ताप से तपे नीलकंठ पर जब जल की पहली बूंद गिरती है, तो मानों पूरी सृष्टि एक अलौकिक शीतलता से भर उठती है।
भविष्य पुराण और शिव पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि 12 महीनों में श्रावण मास भगवान शिव को सर्वाधिक प्रिय है, लेकिन सावन के ‘सोमवार’ का महत्व सिर्फ इस बात में नहीं है कि यह एक व्रत है, बल्कि इसके पीछे गहरा पौराणिक और खगोलीय आधार छिपा है।
सोमवार का कारक ग्रह ‘चंद्रमा’ है और चंद्रमा शिव के मस्तक पर विराजमान है। जब सावन की रिमझिम फुहारों के बीच पहला सोमवार आता है, तो यह मन (चंद्रमा) को शांत करने और संकल्प को साधने का सबसे बड़ा अवसर बन जाता है।
समुद्र मंथन का ‘हलाहल’ और पार्वती की तपस्या
सावन के पहले सोमवार को लेकर पुराणों में दो प्रमुख कथाएं दर्ज हैं, जो इस दिन के महत्व को रेखांकित करती हैं-
समुद्र मंथन और नीलकंठ का अवतार... पद्म पुराण के अनुसार, सावन के महीने में ही देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। मंथन से जब प्राणघातक ‘हलाहल विष’ निकला, तो उसकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे।
तब भगवान शिव ने सृष्टि को बचाने के लिए उस विष को अपने कण्ठ में धारण कर लिया। विष के दाह (जलन) को कम करने के लिए सभी देवताओं ने उन पर जल और बेलपत्र चढ़ाया। सावन का पहला सोमवार इसी आभार और जल-समर्पण का ऐतिहासिक दिन माना जाता है।
माता पार्वती का कठिन संकल्प...स्कंद पुराण के अनुसार, माता सती के बाद जब उन्होंने पार्वती के रूप में जन्म लिया, तो शिव को पुनः पति रूप में पाने के लिए उन्होंने सावन के महीने में ही कठोर निराहार व्रत शुरू किया था। सावन के पहले सोमवार से शुरू हुआ उनका यह तप ही उनकी मनोकामना पूर्ति का कारण बना।
कैसे करें शिव-पूजा?...शिव
पुराण के अनुसार, भोलेनाथ की पूजा में आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। ‘आशुतोष’ (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) शिव को प्रसन्न करने का सही क्रम यह है-
प्रथम प्रहर स्नान और त्रिपुंड: सूर्योदय से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। मस्तक पर चंदन या भस्म से त्रिपुंड लगाएं।
जलधारा और पंचामृत: शिवलिंग पर सबसे पहले शुद्ध जल की धारा चढ़ाएं। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और मिश्री से निर्मित पंचामृत से अभिषेक करें और अंत में पुनः शुद्ध गंगाजल से स्नान कराएं।
पत्र-पुष्प का अर्पण: 3 पत्तियों वाला अखंडित (कहीं से कटा-फटा न हो) बेलपत्र लें। चिकनी सतह को शिवलिंग की ओर रखते हुए चढ़ाएं। इसके साथ धतूरा, भांग और सफेद आंकड़े (मंदार) का फूल अर्पित करें।
मंत्र का जप: पूजा के दौरान निरंतर ‘ऊं नमः शिवाय’ या महामृत्युंजय मंत्र का उच्चार मन ही मन करते रहें।
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