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सितारे पांच, पर थाली में कीड़े और जहर: बड़े होटलों की असली तस्वीर का खुलासा

Khulasa First

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संवाददाता

14 सितंबर 2026, 4:41 pm
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सितारे पांच, पर थाली में कीड़े और जहर

नोटिस, नमूने और फिर खामोशी, खाद्य सुरक्षा की कार्रवाई अधूरी क्यों रह जाती है

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट...इंदौर।

कार्रवाई बेअसर नोटिस जारी करने और नमूने जांच के लिए भेजने तक सीमित
दूसरी अहम बात यह है कि खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई अक्सर नोटिस जारी करने और नमूने जांच के लिए भेजने तक सीमित रह जाती दिखती है। जब तक प्रयोगशाला से रिपोर्ट आती है तब तक हजारों ग्राहक उस प्रतिष्ठान का खाना खा चुके होते हैं। कड़े और त्वरित दंडात्मक कदमों के बजाय मामलों को लंबी कानूनी प्रक्रिया और जवाब-तलबी के भरोसे छोड़ देना प्रशासनिक व्यवस्था की एक बड़ी सीमा है। भले ही यह कहना गलत होगा कि हर मिली खामी का मतलब यह है कि परोसा गया हर खाद्य पदार्थ असुरक्षित था। ज्यादातर मामलों में यह दस्तावेजी, भंडारण या स्वच्छता से जुड़ी लापरवाही है। इस फर्क को समझना जरूरी है।

रसोई में जंग, लीकेज और अधूरे रिकॉर्ड, खाद्य सुरक्षा तंत्र की जिम्मेदारी बढ़ी

इंदौर देशभर में स्वच्छता के लिए अपनी पहचान बनाता रहा है, लेकिन शहर के सबसे महंगे और नामी खान-पान प्रतिष्ठानों की रसोई से हाल ही में सामने आई तस्वीरें इस छवि पर एक गंभीर सवालिया निशान लगाती हैं। कलेक्टर शिवम वर्मा के मार्गदर्शन में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन ने पिछले कुछ हफ्तों में शहर के कई बड़े होटलों, रेस्टोरेंट, बार और डेयरी प्रतिष्ठानों में लगातार औचक निरीक्षण किए हैं। इन कार्रवाइयों में जो खामियां उजागर हुई हैं, वे इक्का-दुक्का घटना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थागत ढिलाई की ओर इशारा करती हैं, चाहे वह पांच सितारा दर्जे का होटल हो या मोहल्ले की डेयरी।

निरीक्षणों में क्या-क्या सामने आया... हाल के दौर के निरीक्षणों में पाई गई खामियां कई स्तर की रहीं। कुछ प्रतिष्ठानों की रसोई में जलभराव, फिसलन भरा फर्श, जंग लगे बर्तन और स्टोरेज ट्रे तथा पुराने-अस्वच्छ चॉपिंग बोर्ड मिले। कुछ जगह पेयजल की पेस्टिसाइड जांच रिपोर्ट ही उपलब्ध नहीं थी। कई प्रतिष्ठानों में पैक्ड और आयातित खाद्य सामग्री पर जरूरी लेबलिंग जैसे आयातक का नाम-पता, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई लाइसेंस विवरण नदारद मिली। खाद्य सामग्री के भंडारण में तय एफआईएफओ /एफईएफओ व्यवस्था (पहले आया माल पहले इस्तेमाल होने का सिद्धांत) का पालन न होना भी एक आम समस्या के रूप में उभरा। कई जगह कर्मचारियों के मेडिकल फिटनेस रिकॉर्ड तय प्रारूप में मौजूद नहीं थे, जो सीधे तौर पर यह सुनिश्चित करने से जुड़ा मानक है कि खाना बनाने-परोसने वाला व्यक्ति संक्रामक बीमारी से मुक्त है।

एक-दो जगह मामला और गंभीर निकला। जांच में लिए गए कुछ नमूने (सूखे मेवे, पनीर, घी) प्रयोगशाला जांच में असुरक्षित या अवमानक घोषित हुए। एक प्रतिष्ठान में खराब हालत में मिली खाद्य सामग्री को मौके पर ही नष्ट करना पड़ा। कुछ छोटे डेयरी और घी कारोबारियों से लिए गए दर्जनों नमूने भी जांच में फेल हो गए, जो दिखाता है कि यह समस्या सिर्फ बड़े होटलों तक सीमित नहीं, बल्कि रोजमर्रा के दूध-घी के कारोबार में भी गहरी पैठी हुई है। यह सिर्फ एक मामला नहीं, तंत्र की एक बड़ी कमजोरी है। इन निरीक्षणों से जो सबसे बड़ी बात निकलकर आती है, वह यह है कि ऊंची कीमत, चमचमाती लॉबी और बड़ा ब्रांड कोई भी चीज रसोई के भीतर की स्वच्छता और सुरक्षा की गारंटी नहीं देती। ग्राहक जब किसी बड़े प्रतिष्ठान में पैसे खर्च करता है तो वह सुविधा के साथ साथ भरोसे के लिए भी भुगतान करता है और यही भरोसा है जो बार-बार सामने आने वाली इन खामियों से हिलता है।

{यह चूक किसे महंगी पड़ सकती है... इस तरह की खामियां चाहे वे कितनी भी मामूली या दस्तावेजी क्यों न लगें असल में बड़े स्वास्थ्य जोखिम की नींव बन सकती हैं। खराब भंडारण और तापमान नियंत्रण की कमी से खाद्य पदार्थों में बैक्टीरिया पनपने का खतरा बढ़ता है। कर्मचारियों के मेडिकल रिकॉर्ड की अनदेखी संक्रामक रोगों के फैलने का रास्ता खोल सकती है। लेबलिंग की खामियां एलर्जी से पीड़ित ग्राहकों के लिए सीधा खतरा बन सकती हैं, क्योंकि उन्हें यह पता ही नहीं चलता कि किसी उत्पाद में क्या-क्या मिला है और घी-दूध जैसे रोजमर्रा के उत्पादों में मिलावट का असर सबसे ज्यादा उन आम परिवारों पर पड़ता है जो इन्हें बिना शक के इस्तेमाल करते हैं।

{आगे क्या होना चाहिए...पारदर्शिता बढ़े: निरीक्षण रिपोर्ट और लैब नतीजे सार्वजनिक रूप से, समयबद्ध तरीके से जारी किए जाएं, ताकि उपभोक्ता खुद फैसला ले सकें।

{बार-बार की चूक पर सख्ती: जिन प्रतिष्ठानों में एक से अधिक बार गंभीर खामियां मिली हैं, उनके लिए सिर्फ नोटिस नहीं, बल्कि लाइसेंस निलंबन जैसी ठोस कार्रवाई तय समयसीमा में होना चाहिए।

{रैंडम, बिना पूर्व-सूचना वाले निरीक्षण नियमित हों: त्योहारी सीजन या शिकायत आने पर ही नहीं, बल्कि पूरे साल अनियमित अंतराल पर जांच चलती रहे।

{उपभोक्ता जागरूकता: ग्राहकों को एफएसएसएआई लाइसेंस, हाईजीन रेटिंग जैसी जानकारी खुद मांगने और शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

{छोटे कारोबारियों के लिए सहयोग तंत्र: डेयरी और छोटे खाद्य विक्रेताओं के लिए मानक पूरे करने में मदद के लिए प्रशिक्षण और सुलभ जांच सुविधा उपलब्ध हो, ताकि सुधार सजा से पहले संभव हो सके। सवाल सिर्फ किसी एक होटल या डेयरी का नहीं है। सवाल यह है कि क्या इंदौर का खाद्य सुरक्षा तंत्र अपनी चमकती छवि के हिसाब से भीतर से भी उतना ही मजबूत है। जब तक निरीक्षण से आगे बढ़कर जवाबदेही तय नहीं होती तब तक शहर के ग्राहकों की थाली पूरी तरह सुरक्षित मानना जल्दबाजी होगी।

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