हाईकोर्ट का फैसला: पत्नी को दूसरे पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखना अकेले व्यभिचार का सबूत नहीं; तलाक की अपील खारिज
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, पटना।
पत्नी को किसी दूसरे पुरुष के साथ कथित रूप से आपत्तिजनक या ‘कंप्रोमाइजिंग पोजिशन’ में देखना, अपने आप में व्यभिचार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
पटना हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पति की तलाक की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि आपत्तिजनक स्थिति में देखे जाने और वास्तव में किसी अन्य व्यक्ति के साथ यौन संबंध होने के बीच कानूनी रूप से अंतर है।
यह फैसला 3 सितंबर 2026 को जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की डिवीजन बेंच ने Sanjay Kumar Jha vs Annu Devi मामले में सुनाया।
हाईकोर्ट ने मधुबनी फैमिली कोर्ट के 4 अप्रैल 2024 के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति की तलाक की अर्जी खारिज की गई थी।
2006 में हुई थी शादी, 2010 में बेटा हुआ
मामले के अनुसार, दंपति की शादी 2 जुलाई 2006 को हुई थी। दोनों के एक बेटे का जन्म 2010 में हुआ। बाद में पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ गया और पति ने पत्नी पर क्रूरता के साथ-साथ किसी अन्य पुरुष से अवैध संबंध होने का आरोप लगाया।
पति का आरोप था कि उसकी पत्नी का उसकी बड़ी बहन के पति के साथ अवैध संबंध था। उसने दावा किया कि उसने दोनों को एक आपत्तिजनक स्थिति में देखा था।
इसी आधार पर उसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i) के तहत व्यभिचार और धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता को आधार बनाकर तलाक की मांग की थी।
पत्नी ने आरोपों से किया इनकार
पत्नी ने पति के आरोपों को गलत बताया। उसने कथित अवैध संबंध से इनकार करते हुए कहा कि उसके चरित्र पर इस तरह के आरोप लगाए जाना स्वयं मानसिक प्रताड़ना का कारण है।
मामला फैमिली कोर्ट पहुंचा, जहां पति की तलाक याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद पति ने पटना हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी गलती नहीं पाई और अपील खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा- ‘आपत्तिजनक स्थिति’ और यौन संबंध अलग बातें
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के साथ ‘कंप्रोमाइजिंग पोजिशन’ में देखना और उसके साथ यौन संबंध होना एक ही बात नहीं है।
कोर्ट के मुताबिक, व्यभिचार का आरोप साबित करने के लिए केवल संभावना या संदेह पर्याप्त नहीं है। फैसले में कहा गया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ऐसी कड़ी होनी चाहिए, जिससे आरोप के अलावा कोई दूसरा उचित निष्कर्ष न निकलता हो। केवल पति का अपना बयान व्यभिचार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।
पुलिस शिकायत और स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं मिली
कोर्ट ने मामले के साक्ष्यों पर विचार करते हुए यह भी देखा कि पति ने कथित घटना के संबंध में पुलिस में शिकायत नहीं की थी। उसके आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि करने वाला कोई पर्याप्त साक्ष्य भी रिकॉर्ड पर नहीं था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी के खिलाफ लगाए गए क्रूरता के आरोप मुख्य रूप से कथित अवैध संबंध के आरोप पर ही आधारित थे।
जब व्यभिचार का आरोप पर्याप्त साक्ष्य से साबित नहीं हुआ, तो क्रूरता का दावा भी इस मामले में टिक नहीं पाया। कोर्ट ने इन आरोपों को अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति का माना।
व्यभिचार साबित करने के लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य अहम
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पुराने न्यायिक फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने माना कि व्यभिचार जैसे मामलों में प्रत्यक्ष साक्ष्य मिलना मुश्किल हो सकता है। इसलिए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर भी इसे साबित किया जा सकता है।
हालांकि परिस्थितियां ऐसी होनी चाहिए जो आरोप की ओर स्पष्ट रूप से संकेत करें। केवल शक, संभावना या किसी एक संदिग्ध परिस्थिति के आधार पर व्यभिचार का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज की
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद पटना हाईकोर्ट ने कहा कि पति अपनी पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ यौन संबंध होने का आरोप साबित करने में असफल रहा। क्रूरता के आरोप भी पर्याप्त और स्वतंत्र आधार पर साबित नहीं हुए।
इसके बाद कोर्ट ने Miscellaneous Appeal No. 445 of 2024 को खारिज करते हुए मधुबनी फैमिली कोर्ट के 4 अप्रैल 2024 के फैसले को बरकरार रखा।
क्या है इस फैसले का मतलब?
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि किसी भी मामले में आपत्तिजनक स्थिति परिस्थितिजन्य साक्ष्य नहीं बन सकती।
कोर्ट ने इस विशेष मामले में उपलब्ध साक्ष्यों को अपर्याप्त पाया। व्यभिचार का आरोप साबित करने के लिए अदालत पूरे मामले की परिस्थितियों और साक्ष्यों को देखती है।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i) के तहत तलाक के लिए व्यभिचार का आधार तभी सफल हो सकता है, जब विवाह के बाद पति या पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्वैच्छिक यौन संबंध होने का आरोप कानूनी रूप से साबित हो।
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