हर शाम इंदौर की सड़कों पर बिखरता सब्र: ट्रैफिक जाम में जिंदगी; जरूरत सब बराबर
KHULASA FIRST
संवाददाता

'नंबर वन' शहर की सड़कों पर 'जामराज', बेकाबू ट्रैफिक में घुट रही जनता की सांसें, मंत्री से लेकर आम राहगीर तक बेबस
10 मिनट का सफर और घंटों का इंतजार, चालानी कार्रवाई में मस्त ट्रैफिक पुलिस, जाम की आगोश में दम तोड़ती आपातकालीन सेवाएं
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शाम के साढ़े छह बजे हैं। पलासिया चौराहे पर सिग्नल हरा होने का इंतजार करते हुए बाइक, कार, ऑटो और बसों का हुजूम एक-दूसरे में घुसा जा रहा है। दफ्तर से लौटता कोई कर्मचारी घड़ी देखकर झुंझला रहा है, कोई हॉर्न पर हॉर्न बजा रहा है, और भीड़ में फंसा एक स्कूल वैन ड्राइवर बच्चों को देर होने की सफाई फोन पर दे रहा है।
यही मंजर भंवरकुआं, विजय नगर, मालवा मिल और रीगल चौराहे पर हर शाम दोहराता है- सफाई में देश भर में डंका बजाने वाला इंदौर, ट्रैफिक में हर रोज सांस रोक कर रेंगता है। विकास के नाम पर खुदते शहर में आए दिन ऐसे हालात बन जाते हैं कि लोगों की कराह तक जिम्मेदारों को नहीं सुनाई देती।
लोगों के आक्रोश का आलम... सिग्नल के हरे होने का इंतजार कर रहे लोगों के आक्रोश का आलम अक्सर ऐसे सामने आता है-रोज की नौटंकी है साहब। 10 मिनट के रास्ते में एक-एक घंटा बर्बाद हो रहा है। पेट्रोल जल रहा है सो अलग, मानसिक तनाव और चिढ़ इतनी हो जाती है कि इंसान घर पहुंचकर अपनों से भी ढंग से बात न कर पाए।
हाई कोर्ट भी अपनी सख्त नाराजगी जता चुका
इस बदहाली पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट भी अपनी सख्त नाराजगी जता चुका है। याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अफसरों को आड़े हाथों लेते हुए सवाल उठाया था कि जब हाई कोर्ट परिसर के ठीक सामने ही रोज नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं, बिना नंबर की गाड़ियां दौड़ रही हैं और अवैध हूटर बज रहे हैं तो बाकी शहर का क्या हाल होगा।
याचिकाकर्ता के वकील ने सीधा आरोप लगाया है कि पुलिस प्रशासन केवल चालान काटने और राजस्व वसूलने में मस्त है जबकि ट्रैफिक सुधारने के जमीनी प्लान पर कोई काम नहीं हो रहा। इस मामले में अगली सुनवाई 28 सितंबर को होनी है। कोर्ट ने अफसरों से भारी वाहनों की शहर में एंट्री की व्यवस्था पर भी जवाब मांगा है, जो अगली सुनवाई पर पेश किया जाएगा।
गाड़ियों का ऐसा जाल बिछा है कि कोई चाहकर भी रास्ता नहीं दे पा रहा
सड़कों पर चारों तरफ फैली इस अराजकता के बीच अचानक एक कराहती हुई आवाज गूंजती है-'पूं-पूं-पूं'। कभी सायरन बजाती एक एंबुलेंस चौराहे के बीचों-बीच फंस जाती है तो मरीज के परिजन गाड़ी से नीचे उतरकर बदहवास होकर हाथ जोड़ रहे हैं, लेकिन आगे गाड़ियों का ऐसा जाल बिछा है कि कोई चाहकर भी रास्ता नहीं दे पा रहा।
यह नजारा सिर्फ एक जगह का नहीं होता। आवश्यक सेवाओं के वाहन हों या स्कूल बसों में बिलखते मासूम बच्चे, हर कोई इस नाकारा व्यवस्था की बलि चढ़ रहा है। लोग खुलेआम ट्रैफिक पुलिस और नगर निगम के अफसरों को कोसते नजर आते हैं।
रेड सिग्नल पर गाड़ियों की लंबी कतारें... दिनभर दफ्तर में पसीना बहाने के बाद थका-हारा इंदौरी जब मुस्कुराते हुए घर लौटने की सोचता है, तो शहर का अगला ही चौराहा उसकी सारी मुस्कान छीन लेता है। रेड सिग्नल पर गाड़ियों की तीन-तीन किलोमीटर लंबी कतारें, कानों को बहरा कर देने वाला हॉर्न का शोर और हवा में तैरता एकाधिक गाड़ियों का काला धुआं।
यह इंदौर की किसी एक शाम की कहानी नहीं है, बल्कि 'नंबर वन' सफाई का तमगा सीने पर सजाए इस शहर का रोज का कड़वा सच बन चुका है। केवल एक एरिया नहीं , कहीं भी निकल जाइये ऐसे दृश्यों से रूबरू होने से आप नहीं बच पाएंगे।
आयोजनों के नाम पर रूट डाइवर्ट
बात सिर्फ रोजमर्रा की नहीं है। इंदौर में जब भी कोई बड़ा धार्मिक आयोजन, वीआईपी मूवमेंट या बड़े नेताओं का दौरा होता है, तो पूरा शहर मानो थम सा जाता है। आयोजनों के नाम पर रूट डाइवर्ट तो कर दिए जाते हैं, लेकिन प्रभावी और सुविधाजनक बैकअप प्लान के अभाव में समानांतर सड़कों पर गाड़ियों का ऐसा सैलाब उमड़ता है कि पूरा शहर बंधक बन जाता है। मालवा मिल से लेकर भंवरकुआं और विजय नगर तक हर बड़े आयोजन के दौरान शहरवासियों को घंटों ट्रैफिक के नर्क से गुजरना पड़ता है।
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