यूपीआई पर टैक्स अफवाहों का गुब्बारा: डिजिटल पेमेंट पर वसूली; आखिर क्या है सच
KHULASA FIRST
संवाददाता

15 अक्टूबर से लगेगा 0.04 प्रतिशत टैक्स, आम आदमी पर असर नहीं
सरकार का दावा- टैक्स वसूली से आए पैसे से डिजिटल पेमेंट सिस्टम और मजबूत व सुरक्षित होगा।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने सरकार के फैसले के बचाव में कहा- ये सुरक्षित कारोबार के लिए अच्छा कदम
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सोशल मीडिया पर ‘यूपीआई पेमेंट पर टैक्स’ के नाम पर फैलाया जा रहा पैनिक और कुछ नहीं, ये बस अधूरे तथ्यों से उपजा एक भ्रामक उन्माद है, जिसे वित्त मंत्रालय ने साफ कर खारिज कर दिया है। मंत्रालय ने दो-टूक कहा कि आम जनता की जेब पर इससे एक रुपए का भी असर नहीं होगा।
बावजूद इस कोलाहल के पीछे की कड़वी नीतिगत हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार ने इस फैसले के जरिये दशकों पुरानी शून्य शुल्क नीति को अलविदा कह दिया है।
0.4% का मर्चेंट डिस्काउंट रेट सीधे तौर पर भले ही सिर्फ व्यापारियों की बैलेंस शीट को प्रभावित करे, लेकिन यह आशंका पूरी तरह जायज है कि मर्चेंट्स इसका अप्रत्यक्ष बोझ अंततः वस्तुओं की कीमतें बढ़ाकर उपभोक्ताओं पर ही ट्रांसफर करेंगे।
राहत की बात बस इतनी है कि आम जनता के आपसी ट्रांसफर और 96 प्रतिशत छोटे भुगतान इस टैक्स दायरे से मुक्त हैं, जिसने एक बड़े जन-आक्रोश को फिलहाल टाल दिया है। डिजिटल पब्लिक गुड्स के नाम पर खड़ा किया गया यह विशाल साम्राज्य अब बैंकिंग और फिनटेक लॉबी के भारी दबाव में मुद्रीकरण की राह पर चल पड़ा है, जो यह साबित करता है कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में कुछ भी ‘हमेशा के लिए मुफ्त’ नहीं हो सकता।
यूपीआई पेमेंट पर टैक्स नहीं, बल्कि ‘मर्चेंट चार्ज’ (एमडीआर) को लेकर सरकार ने नया फ्रेमवर्क जारी किया है, जो 15 अक्टूबर 2026 से लागू होगा। सोशल मीडिया पर यूपीआई ट्रांजेक्शन पर टैक्स या जीएसटी लगने की जो भी खबरें चल रही हैं, वे पूरी तरह भ्रामक और अफवाह हैं। वित्त मंत्रालय ने साफ किया है कि आम ग्राहकों के लिए यूपीआई हमेशा की तरह 100 फीसदी फ्री रहेगा।
सोशल मीडिया और इंटरनेट पर पिछले कुछ दिनों से यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) पर टैक्स या जीएसटी लगने की चल रही अफवाहों पर वित्त मंत्रालय ने पूरी तरह विराम लगा दिया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि आम उपभोक्ताओं की जेब पर एक पैसे का भी बोझ नहीं पड़ेगा। दरअसल, सरकार ने पेमेंट सिस्टम को टिकाऊ व सुरक्षित बनाने के लिए एक नया मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) फ्रेमवर्क तैयार किया है, जो 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होगा।
सरकार और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार इस नए नियम का असर केवल बड़े व्यावसायिक भुगतानों पर पड़ेगा, न कि रोजमर्रा की सब्जी, दूध या किराने की खरीदारी पर।
सरकार का कहना है कि आम जनता को घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। आपका गूगल-पे, फोन-पे या पेटीएम से किया जाने वाला डेली ट्रांजेक्शन पहले की तरह ही मुफ्त और आसान बना रहेगा।
दोस्तों-रिश्तेदारों को ट्रांसफर बिलकुल फ्री...यदि आप अपने किसी मित्र या परिवार के सदस्य को कितने भी रुपए ट्रांसफर करते हैं, तो वह पूरी तरह मुफ्त रहेगा। रुपे और डेबिट कार्ड के जरिये होने वाले ट्रांजेक्शन भी पूरी तरह शुल्कमुक्त रखे गए हैं।
दुकानदारों, ऑटो चालकों या किसी भी छोटे व्यापारी को 2,000 तक का किया गया भुगतान पूरी तरह फ्री रहेगा। देश के कुल डिजिटल मर्चेंट ट्रांजेक्शन में से 96 प्रतिशत ट्रांजेक्शन इसी दायरे में आते हैं, इसलिए 96 फीसदी लोग इससे अप्रभावित रहेंगे।
किस पर लगेगा चार्ज और किसे देना होगा 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट...यदि कोई ग्राहक किसी बड़े मर्चेंट को 2 हजार से अधिक का यूपीआई भुगतान करता है, तो उस पर 0.4% का शुल्क लगेगा। यह शुल्क सिर्फ दुकानदार/व्यापारी को बैंक या पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को देना होगा, ग्राहक को नहीं।
सरकार ने बैंकों को निर्देश दिए हैं कि वे सुनिश्चित करें कि मर्चेंट इस चार्ज को ग्राहकों के बिल में न जोड़ें। बड़े भुगतानों के लिए इस चार्ज को 300 रुपए पर सीमित किया गया है। यानी 75 हजार या उससे ऊपर के किसी भी बड़े ट्रांजेक्शन पर अधिकतम 300 रुपए ही मर्चेंट फीस लगेगी।
इस प्रक्रिया में खास सेक्टरों के लिए राहत दी गई है। रेलवे, टेलीकॉम, इंश्योरेंस, पेट्रोल पंप और कृषि इनपुट्स जैसे थिन-मार्जिन सेक्टरों में 2,000 से ऊपर के भुगतान पर केवल 5 रुपए का फ्लैट चार्ज तय किया गया है।
क्यों लिया गया यह फैसला?...बैंकिंग और फिनटेक इन्फ्रास्ट्रक्चर, साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल भुगतान के बढ़ते नेटवर्क को सुरक्षित रखने के लिए भारी निवेश की जरूरत होती है।
पूर्व एसबीआई चेयरमैन सहित कई आर्थिक विशेषज्ञों ने इस कदम का समर्थन करते हुए कहा है कि यह कोई ‘टैक्स’ नहीं, बल्कि डिजिटल इंडिया के इकोसिस्टम को मजबूत और सुरक्षित बनाए रखने के लिए एक जरूरी लॉजिस्टिक्स कॉस्ट है।
हालांकि विपक्षी दलों और कुछ आलोचकों का मानना है कि मर्चेंट्स पर चार्ज लगाने से अंततः वे अपनी वस्तुओं की कीमतें बढ़ा सकते हैं, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से इसका भार जनता पर आ सकता है।
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