प्रसिद्ध घाट का जल स्नान लायक नहीं: दूषित जल से पेचिश; टाइफाइड और हेपेटाइटिस-ए का खतरा, श्राद्धपक्ष में रोज पहुंच रहे सैकड़ों श्रद्धालु
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, उज्जैन।
धार्मिक आस्था के बड़े केंद्र सिद्धवट घाट पर शिप्रा नदी का पानी इन दिनों श्रद्धालुओं के लिए चिंता का कारण बना हुआ है। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अगस्त 2026 की रिपोर्ट में सिद्धवट घाट के पानी की गुणवत्ता लगातार दूसरे महीने ‘असंतोषजनक’ पाई गई है।
इसके बावजूद श्राद्धपक्ष में देशभर से आने वाले श्रद्धालु तर्पण और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए नदी में उतर रहे हैं। घाट पर पहुंचे श्रद्धालुओं का कहना है कि पानी देखने में ही गंदा और हरा नजर आ रहा है। आस्था के कारण लोग स्नान तो कर रहे हैं, लेकिन दूषित पानी से स्वास्थ्य को लेकर डर भी बना हुआ है।
‘पानी नहाने लायक भी नहीं, लेकिन आस्था के कारण डुबकी लगानी पड़ती है’
घाट पर पहुंचे श्रद्धालुओं ने पानी की स्थिति को लेकर चिंता जताई। उनका कहना है कि इतने महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल पर पानी की गुणवत्ता बेहतर होनी चाहिए, क्योंकि यहां श्राद्धपक्ष के दौरान हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
कुछ श्रद्धालुओं ने बताया कि पानी दूर से ही हरा और गंदा दिखाई दे रहा है। कई लोग स्नान करने से बच रहे हैं, जबकि कुछ लोग धार्मिक आस्था के कारण नदी में उतर रहे हैं।
विशेषज्ञ बोले- दूषित पानी से संक्रमण का खतरा
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अनिल डोंगरे के मुताबिक दूषित पानी के सीधे या अप्रत्यक्ष संपर्क से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे पानी के संपर्क या सेवन से दस्त, पानी की कमी, पेचिश और पेट से जुड़ी अन्य समस्याएं हो सकती हैं।
उन्होंने बताया कि दूषित पानी के कारण टाइफाइड और हेपेटाइटिस-ए जैसी बीमारियों का खतरा भी हो सकता है। इसके अलावा पानी की खराब गुणवत्ता का असर जलीय जीवों और पूरे नदी तंत्र पर भी पड़ सकता है।
पानी हरा दिखाई दे रहा, स्थानीय पुजारी ने भी जताई चिंता
सिद्धवट घाट पर कर्मकांड कराने वाले पंडित राजेश त्रिवेदी ने पानी का नमूना दिखाते हुए बताया कि शिप्रा का पानी इस समय हरा और मटमैला नजर आ रहा है।
उनके अनुसार कम बारिश के कारण नदी में पानी का प्रवाह कम रहा, जिससे गंदगी और जल गुणवत्ता की समस्या ज्यादा दिखाई दे रही है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि स्थिति ऐसी ही रही तो आने वाले दिनों में पानी की स्थिति और खराब हो सकती है।
सिद्धवट का धार्मिक महत्व
सिद्धवट को उज्जैन के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। यहां श्राद्धपक्ष के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पितरों का तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करने पहुंचते हैं।
पंडित राजेश त्रिवेदी के अनुसार स्कंद पुराण के अवंतिका खंड में शिप्रा के धार्मिक महत्व का वर्णन मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार शिप्रा उत्तरवाहिनी नदी है और सिद्धवट पर तर्पण एवं पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है।
14 नालों की जांच में तीन प्रमुख नालों पर सवाल
वर्ष 2026 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की संयुक्त समिति ने उज्जैन के 14 नालों की जांच की थी। रिपोर्ट में हाटकेश्वर, पीलियाखाल और भैरवगढ़ नालों को शिप्रा में प्रदूषण की दृष्टि से प्रमुख बताया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक हाटकेश्वर और पीलियाखाल नालों से घरेलू सीवेज नदी में पहुंच रहा है। वहीं भैरवगढ़ नाले से हैंड-ब्लॉक प्रिंटिंग इकाइयों का रसायनयुक्त पानी शिप्रा में मिलने की बात सामने आई। इन नालों के पानी में जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) 48 से 70 मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज की गई थी।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हर महीने भेज रहा रिपोर्ट
मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उज्जैन के क्षेत्रीय अधिकारी दीपक काले के अनुसार शिप्रा नदी के पानी की नियमित जांच की जाती है।
सिद्धवट घाट के पानी की गुणवत्ता से संबंधित रिपोर्ट हर महीने नगर निगम और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को भेजी जाती है, ताकि संबंधित विभाग आवश्यक कार्रवाई कर सकें।
नगर निगम बोला- नालों को रोकने पर काम जारी
उज्जैन नगर निगम के जलकार्य प्रभारी प्रकाश शर्मा ने माना कि सिद्धवट क्षेत्र में गंदे पानी की समस्या पुरानी है। उन्होंने कहा कि प्रिंटिंग इकाइयों से निकलने वाले रसायनयुक्त पानी को शिप्रा में जाने से रोकने के लिए परियोजनाओं पर काम चल रहा है।
उन्होंने बताया कि नमामि गंगे और कान्ह डक्ट परियोजना के माध्यम से नालों के पानी को नदी में जाने से रोकने की योजना पर काम किया जा रहा है। इन परियोजनाओं की लागत करीब 900 करोड़ रुपए बताई गई है।
आस्था बड़ी, लेकिन साफ पानी की मांग भी उतनी ही जरूरी
सिद्धवट घाट पर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था सबसे बड़ा कारण है, लेकिन पानी की खराब गुणवत्ता ने स्वास्थ्य संबंधी चिंता भी बढ़ा दी है।
सवाल यह है कि जब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट लगातार पानी की गुणवत्ता को असंतोषजनक बता रही है, तो नदी में मिलने वाले दूषित पानी को रोकने के लिए स्थायी समाधान कितनी जल्दी जमीन पर दिखाई देगा। श्रद्धालुओं की मांग है कि तर्पण और आस्था के इस पवित्र स्थल पर शिप्रा का पानी स्वच्छ और सुरक्षित होना चाहिए।
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