तो इन कारणों से कटा नरोत्तम का पत्ता: अब मुख्यधारा में वापसी मुश्किल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इस समय मप्र में सबसे गर्म राजनीतिक लड़ाई दतिया उपचुनाव की है। यहां भाजपा ने पूर्व गृहमंत्री, कद्दावर नेता और शिवराजसिंह सरकार के दौरान सत्ता और संगठन की धुरी बने रहे नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट दिया है।
खुलासा फर्स्ट को पता चला है कि नरोत्तम ने पिछले वर्षों में जो कारस्तानियां की उनके कारण उनका पत्ता पार्टी ने काट दिया। कहा जा रहा है कि अब उनकी भाजपा की मुख्यधारा में वापसी मुश्किल है, क्योंकि जो कारण टिकट कटने के हैं, वो आगे उन्हें कोई जिम्मेदारी देने में भी बाधक बनेंगे।
टिकट कटने के जो कारण सामने आए हैं उनमें उन पर भ्रष्टाचार और शोषण के संगीन आरोप भी हैं। सूत्रों ने बताया कि मिश्रा दतिया में लगातार कई बार विधायक और मप्र में कद्दावर नेता बनने के बाद खुद को बहुत शक्तिशाली और दमदार नेता मानने लगे थे और यही अहंकार उन्हें ले डूबा। अपने अहंकार में उन्होंने कई नेताओं से बदतमीजी की, पार्टी निर्देशों की अवहेलना की और बड़े नेताओं को किनारे करने की कोशिश की, जिसे पार्टी ने गंभीरता से लिया।
पार्टी के पास पहुंची सप्रमाण शिकायत...दूसरा कारण, उनके द्वारा बनवाए गए मंदिर में करोड़ों रुपए का चंदा एकत्र करना भी बताया जा रहा है। पार्टी के पास पहुंची सप्रमाण शिकायतों में कहा गया कि मिश्रा ने ग्वालियर के समीप डबरा में फरवरी माह में नवगृह देवताओं का मंदिर बनाया, जिसमें वे पत्नियों, वाहनोंं के साथ विराजित हैं, जिसके लिए करोड़ों रुपए की चंदा वसूली की गई।
न केवल भाजपा नेताओं से बल्कि मिश्रा ने पूर्व गृहमंत्री होने का दबाव बनाकर पुलिस अधिकारियों से भी वसूली की। करोड़ों रुपए का चंदा किया गया, जबकि मंदिर पर राशि कम खर्च की गई और बाकी पैसा गोलमाल हो गया। तब उन्होंने खबर उड़वाई कि वे ग्वालियर से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, पार्टी ने भरोसा दिया है, लेकिन बाद में साफ हो गया कि ये मिश्रा का ही प्रोपेगंडा था।
काम करने के बदले में भारी भरकम राशि ली... मिश्रा को टिकट न मिलने का एक और कारण ये भी है कि गृहमंत्री रहने के दौरान उन्होंने या तो कार्यकर्ताओं का कोई काम नहीं किया और किया तो उसके बदले में भारी भरकम राशि ली।
यानी उन्होंने आर्थिक शोषण करने में किसी को नहीं छोड़ा। अपनी पार्टी के उन नेता-कार्यकर्ताओं को भी नहीं जिन्होंने उन्हें इतना बड़ा नेता बनाया था। शोषण के मामले में मिश्रा का रिकॉर्ड उनके निकटस्थ ही खराब बताते रहे हैं।
ये भी पता चला है कि मिश्रा ने अपने कई साथियों-समर्थकों को बंदूक का लाइसेंस दिलवाया, लेकिन इसके बदले में उनसे अच्छी-खासी रकम वसूली। ये शिकायत भी उनके बारे में नेताओं ने पार्टी को की थी।
पेनल में नाम ही नहीं गया था...सूत्रों से ये भी पता चला है कि दतिया भाजपा ने इस उपचुनाव के लिए नामों की जो पेनल भोपाल भेजी थी, उसमें नरोत्तम मिश्रा का नाम ही नहीं था। उन्हें उनके अहंकारी, भ्रष्ट, शोषणकर्ता रवैये के कारण दरकिनार कर दिया गया था।
इसी से साफ हो गया था कि मिश्रा का राजनीतिक भविष्य डावाडोल हो गया है। खबर तो ये भी है कि वे पार्टी से बगावत कर चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन उन्हें समझाया गया कि उनके कारनामों की सूची लंबी है। इसके बाद वे चुप हो गए और चुनाव में जुट गए।
पार्टीके किसी नेता को कुछ नहीं समझते थे... एक समय ऐसी स्थिति थी कि भोपाल में वे पार्टी के ही किसी नेता को कुछ नहीं समझते थे और बदतमीजी से पेश आते थे। उनके बोलचाल, व्यवहार में अहंकार झलकने लगा था।
इस बात की शिकायत पार्टी के पास लगातार पहुंच रही थी। इसलिए ये भी तय किया गया था कि यदि वे चुनाव जीते तो सरकार में कोई पद नहीं दिया जाएगा। हालांकि वे दतिया विधानसभा चुनाव कांग्रेस के राजेंद्र भारती से हार गए थे।
हार के बाद उन्होंने दतिया-भोपाल एक कर दिया और अक्सर दिल्ली जाकर गृहमंत्री अमित शाह से संबंधों की गुहार लगाकर पद मांगा, लेकिन उन्हें कह दिया गया कि कोई पद नहीं मिलेगा। बाद में पार्टी उनके बारे में विचार करेगी।
इसलिए नरोत्तम मिश्रा को कोई पद नहीं दिया गया, जबकि विधानसभा चुनाव के वक्त वे कांग्रेस से आने वाले नेताओं को भाजपा में शामिल कराने की टोली के प्रमुख बनाए गए थे और उनका खुद का दावा है कि उन्होंने चार लाख कांग्रेसियों को भाजपा में प्रवेश दिलाया। हालांकि इसकी पुष्टि भाजपा के किसी नेता ने नहीं की।
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