बच्चों की मौत के दावे पर हाई कोर्ट सख्त: फोटो-वीडियो रोक का आदेश वापस; बच्चों की मौत के बीच रिकॉर्डिंग पर प्रतिबंध से मचा विवाद
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, जबलपुर/बालाघाट।
बालाघाट में बच्चों की मौत को लेकर चल रही चर्चा के बीच मामला हाई कोर्ट तक पहुंच गया है। 30 बच्चों की मौत के दावे से जुड़ी जनहित याचिका पर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पहले प्रभावित क्षेत्रों में जाकर वास्तविक स्थिति की जांच करने के निर्देश दिए हैं।
वहीं, इसी बीच बालाघाट प्रशासन की ओर से सार्वजनिक स्थानों, अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों में बिना अनुमति फोटो-वीडियो और रील बनाने पर लगाया गया प्रतिबंध करीब पांच घंटे में वापस ले लिया गया।
इन दोनों घटनाओं के बाद बालाघाट में बच्चों की बीमारी, मौत और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर उठ रहे सवालों के बीच प्रशासन की कार्रवाई भी चर्चा में है।
हाई कोर्ट ने कहा- पहले मौके पर जाकर तथ्य जुटाएं
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि केवल समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के आधार पर जनहित याचिका दाखिल करना उचित नहीं है। इतने गंभीर मामले में वास्तविक स्थिति और तथ्यों की पुष्टि जरूरी है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता अंशुल तिवारी को बालाघाट के बैहर और बिरसा क्षेत्र में जाकर स्थिति का प्रत्यक्ष जायजा लेने और बच्चों की मौत, बीमारी, कुपोषण तथा चिकित्सा सुविधाओं से जुड़े दावों की पड़ताल करने के निर्देश दिए हैं।
मलेरिया, खसरा और कुपोषण से 30 मौतों का दावा
नरसिंहपुर के करेली निवासी अधिवक्ता अंशुल तिवारी ने याचिका में दावा किया है कि बैहर और बिरसा क्षेत्रों में हाल में मलेरिया, खसरा और कुपोषण के कारण करीब 30 बच्चों की मौत हुई है। याचिका में प्रभावित बच्चों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिलने का भी आरोप लगाया गया है।
सुनवाई के दौरान यह भी दावा किया गया कि 50 बिस्तरों की क्षमता वाले अस्पताल में करीब 400 बच्चों का इलाज किया जा रहा है।
हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दावों पर तत्काल कोई आदेश देने के बजाय पहले मौके पर जाकर तथ्यों की पुष्टि को प्राथमिकता दी।
फोटो-वीडियो पर प्रतिबंध लगाया, पांच घंटे में वापस लिया
इसी बीच गुरुवार को बालाघाट प्रशासन ने जिले की पूरी सीमा में सार्वजनिक स्थानों, अस्पतालों और स्कूल-कॉलेजों में बिना अनुमति फोटो, वीडियो और रील बनाने पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया था।
अपर कलेक्टर डीपी बर्मन ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 के तहत यह आदेश जारी किया था। प्रतिबंध 3 सितंबर से 3 नवंबर 2026 तक लागू किया जाना था। उल्लंघन की स्थिति में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत कार्रवाई का प्रावधान रखा गया था।
अस्पताल और स्कूल भी प्रतिबंध के दायरे में
आदेश के मुताबिक अस्पतालों में बिना अनुमति मरीजों, उनके परिजनों, डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की फोटो-वीडियो या रील बनाने पर रोक थी।
ऐसी सामग्री सोशल मीडिया पर प्रसारित करने पर भी कार्रवाई की बात कही गई थी, यदि इससे मरीज की निजता, सम्मान या इलाज प्रभावित होता हो।
इसी तरह स्कूल-कॉलेजों में विद्यार्थियों, खासकर नाबालिगों, शिक्षकों और शैक्षणिक गतिविधियों की बिना अनुमति रिकॉर्डिंग पर भी रोक लगाई गई थी। प्रशासन ने इसके पीछे मरीजों और विद्यार्थियों की निजता व सुरक्षा का हवाला दिया था।
बच्चों की मौत के मुद्दे के बीच आदेश पर उठे सवाल
रिकॉर्डिंग पर प्रतिबंध का आदेश ऐसे समय आया, जब आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों की बीमारी और करीब ढाई महीने में 30 बच्चों की मौत के दावे पहले से चर्चा में थे। इसके चलते पत्रकारों व आम लोगों ने आदेश पर सवाल उठाए।
वरिष्ठ पत्रकार कैलाश साहू ने आरोप लगाया कि बैगा आदिवासी बच्चों की बीमारी और मौत से जुड़ी वास्तविक स्थिति सामने आने से रोकने के लिए प्रशासन ने जल्दबाजी में आदेश जारी किया। हालांकि, यह आरोप पत्रकार की ओर से लगाए गए हैं।
विरोध के बाद प्रशासन ने वापस लिया आदेश
आदेश जारी होने के बाद इसका विरोध शुरू हो गया। पत्रकारों और आम लोगों की आपत्तियों के बीच प्रशासन ने आदेश की समीक्षा की और करीब पांच घंटे बाद इसे वापस ले लिया।
अब एक तरफ हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता से मौके पर जाकर तथ्यों की रिपोर्ट मांगी गई है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासन द्वारा फोटो-वीडियो प्रतिबंध लगाने और फिर उसे वापस लेने के घटनाक्रम ने मामले को और चर्चा में ला दिया है।
9 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
हाई कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर 2026 को तय की है। उस दिन याचिकाकर्ता की ओर से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर जुटाई गई जानकारी और रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।
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