इंदौर की ‘गूंज’ में गूंजते सवाल: परीक्षा छात्रों की नहीं राहुल की है
KHULASA FIRST
संवाददाता

इंदौर में राहुल गांधी का 'गूंज' संवाद: चुनावी मंच या युवाओं के सवालों की गूंज?
सी-वोटर सर्वे का संकेत: 58% युवाओं को लगता है राजनीति उनकी चिंताएं नहीं समझती
16.2% बेरोजगारी दर और पेपर लीक: केवल सरकारी योजनाओं से नहीं मिटेगा युवा असंतोष
शिक्षा, कौशल और नौकरी: किसी पार्टी के समर्थक नहीं, समाधान के आकांक्षी हैं आज के युवा
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर में 19 सितंबर को होने वाला राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम केवल एक राजनीतिक सभा नहीं, बल्कि देश की बदलती युवा राजनीति की परीक्षा भी बन सकता है। कांग्रेस इसे छात्रों की शिक्षा, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों का मंच बता रही है। राहुल की यह मुहिम पहले ही कोटा, प्रयागराज और पुणे सहित कई शहरों तक पहुंच चुकी है।
इंदौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी छात्रों से संवाद करेंगे। इस आयोजन का नाम गूंज है। देश में छात्रों का विषय बेहद गंभीर, संवेदनशील और नीतिगत सवालों से जूझ रहा है। युवाओं से जुड़े अनेक सवाल ओझल किए जा रहे हैं। युवा पूरी तरह उपेक्षित महसूस कर रहे हैं, क्योंकि सामाजिक हालात और परिस्थितियों में संकट कम होने की जगह बढ़ते जा रहे हैं।
तथाकथित सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अजीरण और राजनीतिक प्रभुत्व हमेशा के लिए बनाए रखने की मनमानी से समाज भीतर ही भीतर उद्वेलित है। इस गंभीरता को समझने के बजाय इंदौर में अभी इस कार्यक्रम को लेकर किसी बहस के बजाय जुमलेबाजी का नाम दिया जा रहा है।
जैसे राहुल गांधी के मंच पर कितने लोग बैठेंगे, कितने बाहर रहेंगे, कितने बड़े नेता आएंगे, यह खबर का एक हिस्सा है, लेकिन मूल विषय के बजाय यही सब कुछ प्रचारित करवाया जा रहा है। कांग्रेस के मीडिया मैनेजमेंट मैनेजर और राहुल के सलाहकार इसीलिए पहचाने जाते हैं कि वह जो करें सो कम है।
सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि कार्यक्रम के माध्यम से उठने वाले सवाल इंदौर से दिल्ली तक कितनी दूर जाते हैं। अगर ‘छात्रों की गूंज’ केवल कांग्रेस का चुनावी मंच बनकर रह गई तो उसका असर सीमित रहेगा, लेकिन अगर यह मंच युवाओं के वास्तविक सवाल रोजगार, पेपर लीक, परीक्षा की विश्वसनीयता, महंगी शिक्षा, कौशल और अवसर की समानता को राजनीतिक एजेंडा के केंद्र में ला देता है, तो इंदौर का कार्यक्रम कांग्रेस से कहीं बड़ा हो सकता है, क्योंकि युवा पीढ़ी का सवाल किसी पार्टी से नहीं है।
सवाल सत्ता से है और लोकतंत्र में सत्ता से सवाल करने वाली पीढ़ी को केवल राजनीतिक समर्थक या विरोधी मानकर नहीं देखा जा सकता। इंदौर में 19 सितंबर को राहुल गांधी बोलेंगे, लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि उसके बाद सरकारें युवाओं की आवाज कितनी सुनती हैं।
बीते डेढ़ दशक में देश में एक और महत्वपूर्ण बदलाव सामने है। जेन-जी आज राजनीति को प्रभावित कर रही है, जबकि जेन अल्फा अभी बड़े हिस्से में मतदान की उम्र तक नहीं पहुंची है, लेकिन यही पीढ़ी सोशल मीडिया, डिजिटल शिक्षा, एआई और वैश्विक रोजगार बाजार के वातावरण में बड़ी हो रही है। इस पीढ़ी की अपेक्षा पारंपरिक राजनीतिक वादों से अलग हो सकती है। उसके अपने सवाल हैं और इसके जवाब उसे चाहिए। जैसे-
मेरी शिक्षा कितनी अच्छी है?
मेरे कौशल की बाजार में कीमत क्या है?
मेरी नौकरी कहां है?
मेरी परीक्षा निष्पक्ष होगी या नहीं?
मेरी डिग्री मुझे रोजगार देगी या सिर्फ प्रमाण-पत्र?
क्या युवा चुनाव में सरकारों को जवाब दे सकता है?
इसकी संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे अभी निश्चित चुनावी परिणाम मानना भी गलत होगा। 2026 के सी-वोटर सर्वे का सबसे महत्वपूर्ण संकेत यही है कि युवा स्वयं को किसी एक राजनीतिक खांचे में बंद नहीं मान रहे।
यहां तक कि भाजपा/एनडीए समर्थक युवाओं में भी 54% ने माना कि राजनीतिक दल जेन-जी की चिंताओं को नहीं समझते। इसका मतलब यह नहीं कि युवा भाजपा के खिलाफ हो गया है। बीते 12 वर्षों की तरह युवा किसी भी सरकार को स्थायी समर्थन की गारंटी देने के मूड में नहीं दिखता।
क्या भाजपा और संघ इसे रोक पाएंगे? इसे ‘रोकने’ की राजनीति शायद संभव नहीं और लोकतांत्रिक रूप से उचित भी नहीं होगी। किसी भी संगठन के लिए युवा असंतोष को दबाने के बजाय उसका कारण समझना ज्यादा जरूरी है।
यदि रोजगार, परीक्षा और शिक्षा के सवालों का वास्तविक समाधान होता है, तो राजनीतिक नैरेटिव अपने आप कमजोर पड़ सकता है। लेकिन यदि समस्या बनी रहती है और जवाब केवल विपक्षी राजनीति को दोष देने तक सीमित रहता है, तो वही मुद्दा और बड़ा हो सकता है। इंदौर की ‘गूंज’ का सवाल कांग्रेस से भी बड़ा है- क्या देश की युवा पीढ़ी अब सरकारों से भावनात्मक भाषण नहीं, बल्कि शिक्षा और रोजगार के ठोस परिणाम मांग रही है?
जेन-जी का सवाल- पार्टी नहीं, समस्या का समाधान
अगस्त 2026 के एक सी-वोटर सर्वे में 58.7% युवाओं ने कहा कि राजनीतिक दल जेन-जी की चिंताओं को नहीं समझते। केवल 20.7% ने माना कि पार्टियां उनकी समस्याओं को समझती हैं। इसी सर्वे में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य को 53% युवाओं ने सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बताया।
करीब 33% युवाओं ने कहा कि वे वोट का फैसला मुद्दों के आधार पर करेंगे, जबकि केवल 13.9% ने पार्टी को प्राथमिक आधार बताया। यही आंकड़ा भारतीय राजनीति के लिए सबसे बड़ा संकेत है। युवा यदि पार्टी से ऊपर मुद्दे को रखने लगे तो चुनावी राजनीति का गणित बदल सकता है। रोजगार का सवाल सबसे बड़ा राजनीतिक बारूद
रोजगार का सवाल सबसे बड़ा राजनीतिक बारूद
युवा असंतोष का सबसे ठोस आधार रोजगार है। अगस्त 2026 में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार 15-29 आयु वर्ग की बेरोजगारी दर जून 2026 में 16.2% तक पहुंची थी। शहरी युवाओं में यह 18.2% और युवा महिलाओं में 20.7% बताई गई। दूसरी ओर सरकार रोजगार सृजन के लिए रोजगार मेले और सरकारी नियुक्तियों को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करती रही है।
मई 2026 के रोजगार मेले में 51 हजार से अधिक नियुक्ति-पत्र बांटे जाने की सरकारी जानकारी दी गई थी। यहीं से राजनीतिक बहस शुरू होती है, क्या कुछ लाख सरकारी नियुक्तियां करोड़ों युवाओं की रोजगार आकांक्षा का जवाब हैं? युवा केवल सरकारी नौकरी नहीं मांग रहा। वह गुणवत्तापूर्ण निजी रोजगार, उद्यमिता, कौशल, निष्पक्ष प्रतियोगी परीक्षाएं और डिग्री के बाद सम्मानजनक अवसर चाहता है।
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