मेट्रोपॉलिटन अधिसूचना पर हाईकोर्ट सख्त: शासन नहीं दे सका जवाब; कोर्ट ने इतने दिन का दिया समय
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र को लेकर जारी अधिसूचना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर मंगलवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई।
शासन को करना था यह स्पष्ट
सुनवाई के दौरान शासन को यह स्पष्ट करना था कि मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के गठन के बाद नगर निगमों के अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ेगा और अथॉरिटी बनने के बाद नगर निगम की भूमिका क्या रहेगी।
चार सप्ताह बाद दोबारा सुनवाई होगी
हालांकि, शासन इस पर जवाब पेश नहीं कर सका और सरकारी वकील ने समय मांग लिया। अब मामले में चार सप्ताह बाद दोबारा सुनवाई होगी।
नगर निगम के अधिकार सीमित होने का आरोप
यह जनहित याचिका एडवोकेट अक्षत पहाड़िया ने दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के गठन के बाद नगर निगम और स्थानीय निकायों के अधिकार सीमित हो जाएंगे।
इन कार्यों की रह जाएगी जिम्मेदारी
याचिकाकर्ता का कहना है कि मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में शामिल इलाकों के विकास, निगरानी और रखरखाव से जुड़े कई महत्वपूर्ण अधिकार अथॉरिटी के पास चले जाएंगे। नगर निगम के पास केवल सफाई और छोटे स्तर के कार्यों की जिम्मेदारी रह जाएगी।
अधिसूचना और प्रक्रिया पर उठाए सवाल
याचिका में मेट्रोपॉलिटन परियोजना और एक्ट की धारा-3 को चुनौती दी गई है। इसमें कहा गया है कि नियमों के अनुसार मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र तय करने से पहले संबंधित नगर निगम, नगरीय निकाय, ग्राम पंचायत और जिला पंचायतों से चर्चा एवं सहमति लेना जरूरी था, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों से सुझाव और आपत्तियां लिए बिना अधिसूचना जारी कर दी गई, जिससे उनके संवैधानिक अधिकार प्रभावित होंगे।
संविधान के 74वें संशोधन का हवाला
याचिका में कहा गया है कि यह अधिसूचना संविधान के 74वें संशोधन की मूल भावना के विपरीत है। मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में शामिल किए गए उज्जैन और इंदौर की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन इस पहलू पर भी पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
याचिका में यह भी कहा गया कि कानून के अनुसार मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के लिए बनने वाली कमेटी में दो-तिहाई सदस्य क्षेत्र के जनप्रतिनिधि होने चाहिए, जबकि सरकार द्वारा बनाई गई अथॉरिटी में मुख्यमंत्री, मंत्री और प्रशासनिक अधिकारियों को प्रमुख भूमिका दी गई है।
अथॉरिटी को पूरी शक्तियां देने पर आपत्ति
याचिका में दावा किया गया है कि सरकार ने मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी को व्यापक अधिकार दे दिए हैं, जबकि प्रस्तावित मेट्रोपॉलिटन कमेटी को कोई प्रभावी शक्ति नहीं दी गई।
याचिकाकर्ता के अनुसार, पहले मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र की सीमा और स्वरूप तय किया जाना चाहिए था, इसके बाद अधिसूचना जारी होनी चाहिए थी, लेकिन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
शासन से मांगा गया जवाब
हाईकोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद शासन से इस मामले में जवाब मांगा था। मंगलवार को सरकार की ओर से जवाब पेश नहीं किया जा सका, जिसके बाद समय मांगा गया। अदालत ने चार सप्ताह बाद फिर सुनवाई तय की है।
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