150 करोड़ का कैंसर इंस्टीट्यूट: फिर भी मरीजों का इंतजार खत्म नहीं; मशीन और सुविधाएं लापता, बेहतर इलाज का सपना अधूरा
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, जबलपुर।
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में इलाज शुरू होने में होने वाली देरी मरीज की मुश्किल बढ़ा सकती है। लेकिन नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के अंतर्गत संचालित स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (SCI) में इलाज की उम्मीद लेकर पहुंच रहे मरीजों को अब भी संसाधनों की कमी और लंबी प्रतीक्षा का सामना करना पड़ रहा है।
पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो पा रहा
करीब 150 करोड़ रुपए की लागत से 2023 में शुरू हुए संस्थान से उम्मीद थी कि जबलपुर समेत आसपास के आठ जिलों के मरीजों को कैंसर का समुचित इलाज एक ही जगह मिल सकेगा। हालांकि तीन साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी संस्थान पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो पा रहा है।
लीनियर एक्सीलरेटर के बिना रेडिएशन इलाज अधूरा
कैंसर के रेडिएशन उपचार के लिए जरूरी लीनियर एक्सीलरेटर अब तक संस्थान को नहीं मिल सकी है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन के अनुसार इस मशीन के इस साल दिसंबर तक उपलब्ध होने की उम्मीद है।
प्रस्तावित करीब 42 करोड़ रुपए की मशीन जर्मनी से खरीदी जानी है और इसके बजट को विभागीय स्तर पर मंजूरी मिलने की बात कही गई है। मशीन आने तक रेडिएशन उपचार की सुविधा पूरी क्षमता से शुरू नहीं हो पाएगी।
16 विशेषज्ञों की जरूरत, चार आन्कोलॉजिस्ट ही पदस्थ
एससीआई में करीब 12 विभागों के संचालन के लिए विशेषज्ञों की कमी भी बड़ी चुनौती है। संस्थान में स्वीकृत जरूरत के मुकाबले महज चार आन्कोलॉजिस्ट पदस्थ बताए जा रहे हैं, जबकि तत्काल करीब आठ और विशेषज्ञों की जरूरत है।
कुल मिलाकर संस्थान को करीब 16 विशेषज्ञों की आवश्यकता बताई गई है। स्टाफ की कमी के कारण मेडिकल कॉलेज के कर्मचारियों के सहयोग से कई व्यवस्थाएं संचालित करनी पड़ रही हैं।
एक नर्स के जिम्मे 15 मरीज
नर्सिंग स्टाफ की कमी का सीधा असर मरीजों की देखभाल पर पड़ रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यहां नर्सिंग स्टाफ करीब 40 प्रतिशत कम है। कीमो वार्ड में कई बार एक नर्स को करीब 15 मरीजों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है।
ऐसी स्थिति में गंभीर मरीजों की निगरानी और समय पर देखभाल स्वास्थ्यकर्मियों के लिए भी चुनौती बन जाती है।
6400 मरीजों का पंजीयन, 2100 को ही पूरा इलाज
संस्थान की क्षमता और उपलब्ध संसाधनों के बीच अंतर का असर मरीजों की संख्या में भी दिखाई देता है। पिछले साल करीब 6400 मरीजों ने यहां पंजीयन कराया, लेकिन इनमें से सिर्फ 2100 मरीजों को पूरा इलाज मिल सका।
करीब 4300 मरीजों को इलाज के लिए दूसरे शहरों या निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ा। ऐसे मरीजों पर अतिरिक्त यात्रा, जांच और उपचार का आर्थिक बोझ भी बढ़ जाता है।
कीमो की जरूरी दवाएं भी हो जाती हैं खत्म
सिर्फ मशीन और डॉक्टर ही नहीं, जरूरी दवाओं की उपलब्धता भी सवालों के घेरे में है। रिपोर्ट के अनुसार कुछ आवश्यक कीमोथेरेपी दवाएं 15 से 20 दिन तक स्टॉक से बाहर हो जाती हैं।
कैंसर मरीजों के लिए उपचार का निर्धारित चक्र समय पर पूरा होना महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में दवाओं की अनुपलब्धता इलाज की निरंतरता को प्रभावित कर सकती है।
कई अहम मशीनें और उपकरण अब भी जरूरी
एससीआई को लीनियर एक्सीलरेटर के अलावा फ्लो साइटोमीटर, सीटी सिम्युलेटर, क्यूए टूल्स, मेमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड और आन्को-सर्जरी उपकरणों की भी जरूरत बताई जा रही है। इनकी खरीदी के लिए टेंडर प्रक्रिया कई बार शुरू हुई, लेकिन तीन बार टेंडर निरस्त होने और प्रशासनिक स्तर पर हुए बदलावों के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
घोषणा 2014-15 में, शुरुआत 2023 में
स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट की घोषणा 2014-15 में हुई थी। भवन का काम करीब तीन साल में पूरा किया जाना था, लेकिन निर्माण प्रक्रिया 2020-21 तक चली। इसके बाद 2023 में संस्थान शुरू हुआ, लेकिन पर्याप्त मशीनों और विशेषज्ञों की उपलब्धता नहीं होने से यह अभी तक पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहा है।
बड़ा सवाल: कब मिलेगा मरीजों को एक छत के नीचे पूरा इलाज?
एससीआई का उद्देश्य जबलपुर और आसपास के जिलों के कैंसर मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराना था। लेकिन मौजूदा स्थिति में विशेषज्ञों, नर्सिंग स्टाफ, दवाओं और महत्वपूर्ण जांच व उपचार उपकरणों की कमी के कारण मरीजों को अलग-अलग सुविधाओं के लिए दूसरे अस्पतालों पर निर्भर होना पड़ रहा है।
दिसंबर तक लीनियर एक्सीलरेटर आने की उम्मीद है, लेकिन बाकी संसाधनों की कमी कब दूर होगी और एससीआई कब पूरी क्षमता से संचालित होगा, यह अब भी बड़ा सवाल बना हुआ है।
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