अंतिम संस्कार के बाद इंसाफ की लड़ाई बहू और बेटे ने प्रशासन से मांगा मुआवजा: भागीरथपुरा का जहरीला जलकांड
KHULASA FIRST
संवाददाता

पड़ोसी की खुशी में खलल न पड़े इसलिए चुपचाप पी लिए आंसू
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम के दावों और स्वास्थ्य विभाग की कागजी सक्रियता का खुलासा करते हुए भागीरथपुरा क्षेत्र में जहरीले पानी का जानलेवा सिलसिला थम नहीं रहा। इस गंभीर लापरवाही ने अब 65 वर्षीय वृद्धा संतोष रानी की जान ले ली। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंदौर में फैले संक्रमण के खौफ से बचाने के लिए परिजन अपनी मां को सागर जिले के गढ़ाकोटा ले गए थे, लेकिन दूषित पानी का असर रगों में इस कदर फैल चुका था कि वहां पहुंचने के महज तीन दिन बाद संतोष रानी ने दम तोड़ दिया। 7 फरवरी को गढ़ाकोटा में ही उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा।
मृतका की बहू मीना वर्मा और बेटे राकेश वर्मा ने व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाते हुए बताया 1 जनवरी 2026 को दूषित पानी के सेवन से संतोष रानी को उल्टी-दस्त की शिकायत हुई थी। इसके बाद उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई।
भागीरथपुरा में जहरीले पानी के कारण लोगों के बीमार होने व इससे हुई मौतों को लेकर पूरा परिवार दहशत में आ गया अपने गांव गढ़ाकोटा लेकर गया था, लेकिन वहां भी उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।
अब पीड़ित परिवार न्याय और मुआवजे के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। बहू मीना ने बताया सहायता की उम्मीद लिए जब वार्ड-11 के पार्षद कमल वाघेला के पास पहुंचे, तो उन्होंने मदद करने से साफ इनकार कर दिया।
इस पर परिवार अपनी पीड़ा लेकर कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के निवास पहुंचा, तो वहां के कर्मचारियों ने उन्हें कलेक्टर कार्यालय जाने की सलाह देकर बैरंग लौटा दिया। अब पीड़ित परिवार ने कलेक्टर कार्यालय की जनसुनवाई में आवेदन देकर मुआवजे की गुहार लगाई है।
दिव्यांग बेटी के पिता ने दिखाई धैर्य की पराकाष्ठा
स्वच्छता के शिखर पर आसीन इंदौर के दामन पर भागीरथपुरा जल त्रासदी ने ऐसा जख्म दिया है, जिसकी टीस शायद ही कभी कम हो। इस त्रासदी के बीच एक हृदय विदारक दास्तान सामने आई है, जो व्यवस्था की संवेदनहीनता और एक मजबूर पिता के धैर्य की पराकाष्ठा बयां करती है।
क्षेत्र के सतीश फुलेरिया की 22 वर्षीय दिव्यांग बेटी रिया ने, जो न बोल सकती थी न चल सकती थी, दूषित पानी के जानलेवा संक्रमण के कारण 4 फरवरी को दम तोड़ दिया। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए जिस समय पिता जवान बेटी की अर्थी सजा रहा था, उसी समय पड़ोस में शादी की शहनाई गूंज रही थी।
दुनिया को अपना दुख न दिखे और किसी की खुशी में खलल न पड़े इसलिए पिता ने अपने घर के दरवाजे बंद कर भीतर ही मातम मनाया और बिना किसी शोर-शराबे के अपने कलेजे के टुकड़े को विदा कर दिया। सतीश फुलेरिया, पेशे से ड्राइवर हैं और बरसों से गरीबी की मार झेल रहे हैं।
बताते हैं रिया बचपन से ही मानसिक और शारीरिक रूप से अक्षम थी। संक्रमण की मार इतनी घातक थी कि उसे अस्पताल ले जाने तक का समय नहीं मिला। पिता अक्सर चाचा नेहरू अस्पताल के डॉक्टरों को मोबाइल में रिया की तस्वीरें और उसकी स्थिति दिखाकर परामर्श लेते थे, लेकिन नलों से आए दूषित जहर’ ने उसे संभलने का मौका ही नहीं दिया।
भागीरथपुरा में हुई यह मौत उस सरकारी तंत्र की विफलता पर बड़ा सवालिया निशान है, जो जनता को शुद्ध पेयजल तक उपलब्ध कराने में नाकाम रहा। अब सबसे बड़ा सवाल यह है क्या प्रशासन रिया की इस खामोश मौत को इस त्रासदी का हिस्सा मानेगा या कागजों की उलझन में एक गरीब पिता की पुकार दबकर रह जाएगी? सतीश ने कलेक्टर की चौखट पर न्याय की गुहार लगाई है, ताकि इस त्रासदी में उनकी बेटी का नाम भी सहायता सूची में जुड़ सके और एक टूट चुके परिवार को इस कठिन समय में आर्थिक संबल मिल सके।
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