सड़क पर 5 गाड़ियां नहीं: इंदौरियों का अहंकार आपस में टकराया है
KHULASA FIRST
संवाददाता

राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट।
शहर के व्यस्त रेडिसन चौराहे पर हाल ही में एक के बाद एक 5 गाड़ियां आपस में ताश के पत्तों की तरह भिड़ गईं। पहली नजर में यह सिर्फ एक हैरान कर देने वाला एक्सीडेंट लग सकता है, लेकिन सच कहें तो यह सिर्फ गाड़ियों का एक्सीडेंट नहीं है।
यह सड़क पर दौड़ते आम शहरियों के अहंकार, खत्म हो चुकी नागरिक चेतना और ट्रैफिक नियमों के प्रति ‘अरे, देख लेंगे यार...' वाली सड़ांध मारती मानसिकता की सीधी टक्कर है।
यह तो अच्छा हुआ कि इस भयावह दुर्घटना में कोई जन हानि नहीं हुई। लेकिन भविष्य में इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
खुले आम हुए इस तमाशे की पुनरावृत्ति ना हो इस मिशन के तहत 'खुलासा फर्स्ट' आज शहर के माननीय, समझदार और विद्वान वाहन चालकों से कुछ तीखे सवाल पूछ रहा है, जिसके जवाब हमें आईना दिखाएंगे और आगे ऐसे हादसे ना हों इसका मार्ग प्रशस्त करेंगे:
सवाल नं. 1: क्या गाड़ियों के बीच सुरक्षित दूरी रखने का कोई नियम है?
सच्चाई: पूछकर देख लीजिए किसी से भी, जवाब मिलेगा- नियम तो होगा, पर हमें एक्जेक्टली मालूम नहीं!
यह हमारी अज्ञानता का पहला मोड़ है जो दुर्घटना की ओर ले जाता है। दुनिया थम्ब-रूल मानती है 2-सेकंड का नियम। यानी आगे वाली गाड़ी से इतनी दूरी रखो कि अचानक ब्रेक लगने पर संभलने का टाइम मिले। लेकिन इंदौर में?
यहाँ सड़क पर खाली जगह को 'सुरक्षा का घेरा' नहीं, बल्कि 'घुसपैठ का खुला न्योता' माना जाता है। जैसे ही किसी ने आगे वाली गाड़ी से दो फीट की दूरी बनाई, पीछे वाला शूरवीर अपनी गाड़ी का मुँह उसमें घुसाने के लिए छटपटाने लगता है।
सवाल नं. 2: क्या इस हादसे में सुरक्षित दूरी का पालन हुआ था?
सच्चाई: जब 5 गाड़ियां एक के बाद एक कतार में पिचक गईं, तो जवाब साफ है— बिल्कुल नहीं!
यह किसी एक ड्राइवर की गलती नहीं, बल्कि पूरी कतार की सामूहिक लापरवाही का जीता-जागता सुबूत है। पहली गाड़ी ने किसी अनपेक्षित कारण से ब्रेक मारा, और पीछे वाले एक-दूसरे पर चढ़ते चले गए क्योंकि किसी के पास न तो दूरी थी, न सोचने का वक्त।
सवाल नं. 3: शहर की सड़कों पर स्पीड लिमिट कितनी है, पता भी है?
सच्चाई: यहां भी ज्ञान का टोटा है। कोई कहेगा 25, कोई कहेगा 40। हकीकत यह है कि शहर की आंतरिक सड़कों पर स्पीड लिमिट 40 किमी/घंटा तय है, और तंग इलाकों में इससे भी कम। लेकिन स्पीड लिमिट कागजों में लिखा एक सरकारी फरमान बनकर रह गया है, जिसका पालन करना लोग अपनी शान के खिलाफ समझते हैं।
सवाल नं. 4: क्या गति सीमा का पालन किया जा रहा था?
सच्चाई: अगर गाड़ियां 30-40 की नियंत्रित स्पीड में होतीं, तो अचानक ब्रेक लगने पर भी इतना वीभत्स कबाड़ा नहीं होता। 5 गाड़ियों का एक साथ क्षतिग्रस्त होना कह रहा है स्पीड तो सातवें आसमान पर थी ही, साथ ही चालकों का विवेक और संयम पूरी तरह गायब था।
सबसे बड़ा पाखंड: जब नियम तोड़े, तो एक्सीडेंट के बाद तमाशा क्यों?
अब आते हैं उस बेशर्मी पर जो हादसे के ठीक बाद सड़क पर शुरू होती है। जब किसी ने नियम नहीं माना, तो दुर्घटना के बाद कॉलर पकड़ने और छाती कूटने का नैतिक अधिकार आपको किसने दिया?
सड़क पर गाड़ियां भिड़ते ही लोग अपनी गलती मानने के बजाय एक-दूसरे पर ऐसे गुर्राने लगते हैं जैसे खुद दूध के धुले हों। 'मैंने तो ब्रेक लगा लिया था, पीछे वाले ने ठोका'— यह कहकर हर कोई बच निकलना चाहता है।
कोई यह स्वीकार नहीं करता कि भाईसाहब, आप खुद भी तो आगे वाली गाड़ी के पिछवाड़े से अपनी गाड़ी का मुँह सटाकर चल रहे थे! सुरक्षित दूरी न रखना भी उतनी ही बड़ी कानूनी और आपराधिक लापरवाही है, जितनी तेज गाड़ी चलाना।
खुलासा फर्स्ट स्टैंड: कानून की मजबूरी नहीं, यह '17वां संस्कार' है!
सड़कें दरअसल किसी भी शहर का एक्स-रे होती हैं। वहाँ हमारा धैर्य, हमारा अहंकार और हमारी बदतमीजी साफ दिखाई देती है। अगर हम सड़क पर साथी चालक को दो फीट की जगह नहीं दे सकते, तो यकीन मानिए, समाज में सह-अस्तित्व की हमारी सारी बातें ढोंग हैं।
यातायात कोई पुलिस का डंडा नहीं, यह सड़क पर चलने का '17वां संस्कार' है, जो भीतर से आना चाहिए। जिस प्रकार कोरोना काल में "दो गज की दूरी" जीवन की रक्षा का मंत्र थी, ठीक उसी प्रकार सड़क पर सुरक्षित दूरी आपकी और दूसरों की जिंदगी की गारंटी है।
याद रखिए, हादसे सिर्फ ब्रेक फेल होने से नहीं होते; हादसे तब होते हैं जब शहर का विवेक, अनुशासन और जिम्मेदारी एक साथ फेल हो जाते हैं। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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