स्टीयरिंग पर सालों से कब्जा: डीजीपी का आदेश; ड्राइवरों पर क्यों बेअसर
KHULASA FIRST
संवाददाता

थानों में आरक्षक से लेकर थानेदार तक बदले, लेकिन नहीं बदले स्थायी चालक...
चार साल में पुलिसकर्मी आउट, तो वर्षों से जमे ड्राइवरों पर कब चलेगी तबादले की कैंची?
इंदौर के कई थानों में वर्षों से जमे ड्राइवरों के नेटवर्क की चर्चा, निजी चालकों की भूमिका भी घेरे में
रविश राजेंद्र सिंह 79870-55743 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय द्वारा चार वर्ष से एक ही थाने में पदस्थ पुलिसकर्मियों के तबादले की कवायद शुरू होते ही पुलिस महकमे के भीतर एक नया सवाल तेजी से उठने लगा है।
सवाल यह कि डीजीपी कैलाश मकवाना के आदेश के बाद जब लंबे समय से एक ही जगह जमे पुलिसकर्मियों को हटाकर व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने की बात कही जा रही है, तब वर्षों से एक ही थाने और अधिकारियों के साथ जमे ड्राइवरों पर यह नियम क्यों लागू नहीं हो रहा?
ये कैसे तबादले के नियम
इंदौर के कई प्रमुख थानों और पुलिस अधिकारियों के कार्यालयों में ऐसे सरकारी और निजी ड्राइवर मौजूद हैं, जो वर्षों से एक ही स्थान पर बने हुए हैं। कुछ जगहों पर थाना प्रभारी बदल गए, अधिकारी बदल गए, लेकिन उनके ड्राइवर नहीं बदले। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पुलिस विभाग में तबादले के नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं?
इन थानों में पकड़ मजबूत
पुलिस महकमे में चर्चा है कि द्वारकापुरी, लसूड़िया, विजय नगर, खजराना राजेंद्र नगर, चंदन नगर, राऊ, भंवरकुआं, खजराना, तेजाजी नगर, कनाड़िया, गांधी नगर, एरोड्रम और बाणगंगा सहित कई थानों में वर्षों से जमे ड्राइवरों की मजबूत पकड़ बनी हुई है। वहीं डीसीपी, एडीसीपी और एसीपी कार्यालयों में भी कई ड्राइवर लंबे समय से पदस्थ बताए जा रहे हैं।
इन्हें हटाना आसान नहीं
सूत्रों के मुताबिक लंबे समय तक एक ही जगह रहने के कारण इन ड्राइवरों (इनमें होमगार्ड भी शामिल है) को न केवल थाने की आंतरिक व्यवस्था की पूरी जानकारी रहती है, बल्कि क्षेत्र की गतिविधियों, स्थानीय नेटवर्क और संवेदनशील मामलों की भी गहरी समझ हो जाती है। यही वजह है कि इन्हें हटाना आसान नहीं होता है। चर्चा का एक बड़ा विषय थानों में निजी ड्राइवरों की मौजूदगी भी है।
कई मामलों में फैसलों तक को प्रभावित करते हैं: सूत्रों के मुताबिक कुछ थानों में निजी ड्राइवर वर्षों से पुलिस वाहनों का संचालन कर रहे हैं। बताया जाता है कि कई जगह सरकारी ड्राइवर केवल दिन की ड्यूटी करते हैं, जबकि अन्य समय निजी चालक वाहनों की जिम्मेदारी संभालते हैं।
कुछ ही थानों को जोड़कर सभी थानों में थाना प्रभारी की गाड़ी से लेकर डायल-112 तक निजी चालकों द्वारा चलाई जा रही है। पुलिस विभाग के सूत्रों का कहना है कि कुछ स्थानों पर सरकारी ड्राइवर केवल वाहन चालक की भूमिका तक सीमित नहीं हैं।
उन पर थाने की गतिविधियों पर प्रभाव रखने, आने-जाने वालों की जानकारी रखने और कई मामलों में फैसलों तक को प्रभावित करने के आरोप लगते रहे हैं। कुछ सरकारी और निजी ड्राइवर स्थानीय स्तर पर इतना प्रभाव रखते हैं कि वे खुद को थाने की व्यवस्था का अहम हिस्सा समझने लगे हैं।
जैसे चंदन नगर, द्वारकापुरी, राजेंद्र नगर, लसूड़िया, कनाड़िया, खजराना आदि थानों की स्थित ऐसी ही है। जहां सरकारी ड्राइवरों तो ठीक निजी ड्राइवरों का भी अपना अलग रुतबा है।
अन्नपूर्णा थाने में सरकारी ड्राइवर नहीं : वहीं जानकारी लगी है कि शहर के अन्नपूर्णा थाने में तो सरकारी ड्राइवर ही नही है वहां निजी ड्राइवरों को रखा गया है। क्योंकि सरकारी ड्राइवर शराब पीने का आदी था, जिसके चलते उसे हटा दिया गया। बताया जा रहा है कि उसका भी अपना अलग ही रुतबा था।
सिपाही से लेकर डीसीपी का तबादला फिर ड्राइवर का क्यों नही?
पुलिस कमिश्नरेट में शहर के कई पुलिसकर्मियों के बीच यह चर्चा है कि यदि किसी कर्मचारी को लंबे समय तक एक ही जगह रखने से प्रभाव और नेटवर्क मजबूत होता है, तो सिर्फ ड्राइवरों को वर्षों तक एक ही स्थान पर क्यों रखा जाता है?
थाने के खुफिया के जवानों को क्यों नही रखा जा सकता। पुलिस मुख्यालय का तर्क है कि लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने से निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। इसी सोच के तहत चार वर्ष से अधिक समय से जमे पुलिसकर्मियों के तबादलों की प्रक्रिया शुरू की गई है।
लेकिन अब पुलिस महकमे के भीतर और बाहर यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या यही तर्क ड्राइवरों पर लागू नहीं होता? यदि आरक्षक, प्रधान आरक्षक या अन्य कर्मचारी का तबादला जरूरी है, तो फिर वर्षों से एक ही थाना और एक ही अधिकारी के साथ जुड़े ड्राइवरों का स्थानांतरण क्यों नहीं।
निजी ड्राइवरों की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
सूत्रों के अनुसार कुछ स्थानों पर निजी ड्राइवरों की भूमिका केवल वाहन संचालन तक सीमित नहीं रह गई है। उनके स्थानीय संपर्क, क्षेत्रीय जानकारी और थाने के कामकाज में बढ़ती भागीदारी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है क्षेत्र में चलने वाली गतिविधियों में इनका सीधा हाथ रहता हैं।
ड्राइवरों की तनख्वाह का जुगाड़, थानों में भंगार और वसूली का खेल!: इंदौर के कई थानों में सरकारी ड्राइवरों की कमी के कारण होमगार्ड और निजी ड्राइवरों के सहारे पुलिस वाहनों का संचालन किया जा रहा है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार इन निजी ड्राइवरों के भुगतान की कोई नियमित व्यवस्था नहीं होने से उनकी सैलरी थाना स्तर पर जुटाई जाती है। इसके लिए थानों में पड़े भंगार की बिक्री, अवैध बोरिंग वाहनों से वसूली और निपटारे वाले मामलों में तोड़बट्टे जैसी गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।
सूत्रों का दावा है कि कुछ मामलों में सरकारी , होमगार्ड और निजी ड्राइवरों का सीधा हस्तक्षेप भी रहता है, जिससे व्यवस्था बिगड़ती हैं ।
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