मालवा में मत शुरू करो पत्थरबाजी की परिपाटी: राजनीतिक सौजन्यता के लिए जाना जाता है अपना इंदौर
KHULASA FIRST
संवाददाता

कांग्रेस-भाजपा विचारों से लड़े, जुबान चलाए-हाथ नहीं, आपस में न हो गुत्थमगुत्था, शर्मनाक है हिंसा
मध्यप्रदेश को पश्चिम बंगाल व केरल न बनाएं राजनीतिक दल-कार्यकर्ता, शांत राज्य की ये परंपरा कभी नहीं रही
इंदौर ही नहीं, उज्जैन, भोपाल सहित अन्य जिलों में भी हुए हिंसक प्रदर्शन चिंता का विषय
‘टोरी कॉर्नर’ के ठिये व राजवाड़ा के ‘पटिये’ को याद करो युवा नेताओं, भूलो मत इंदौर एक अलग रिवायत का शहर
मोहन सरकार हलके में न ले हिंसा को, पुलिस प्रशासन निष्पक्ष करे जांच, दोषियों को चिह्नित कर हो कड़ी कार्रवाई
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर, अपनी राजनीतिक सौजन्यता के लिए जाना जाता है। इस शहर की राजनीति में मतभेद चलते हैं, मनभेद कभी स्वीकार नहीं हुए। राजनीति में तेजी से उभर रहे व नेतृत्व कर रहे नेता अपने पुराने नेताओं से कुछ जानकारी लें। पुराने नेता भी जरा अपने युवा नेतृत्व को समझाइश दे।
बताए इन युवा नेतृत्व को कि इंदौर में राजनीतिक दल के नेता-कार्यकर्ता आपस में खून नहीं बहाते। टोरी कॉर्नर के ‘ठिये’ और राजवाड़ा के ‘पटिये’ को भूले नहीं पुराने नेता। इन ‘ठियों’ और ‘पटियों’ पर होने वाली शहर की राजनीति देशभर में अपने आप में मिसाल रही है। ये किस्से नहीं, आंखन देखी है कि कैसे वैचारिक मतभेद व दिनभर की राजनीतिक तू-तू, मैं-मैं के बाद दोनों दलों से जुड़े बड़े नेता एक जाजम पर जमा होते थे।
कांग्रेसी, समाजवादी, जनसंघी, कम्युनिस्ट एक साथ ठहाके लगाते थे, गलतियां स्वीकारते थे, ‘चाय-चुग्गा’ साथ करते थे और कल सुबह फिर आमने सामने होने और रात को फिर ठिये पर मिलने के वादे के साथ लौटते थे। न कि एक-दूसरे का सिर फोड़कर...!!
ज्या दा समय नहीं हुआ। भूले तो नहीं न? चंद महीने ही तो हुए, जब मोहन सरकार के वरिष्ठ मंत्री व प्रदेश भाजपा के कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय गांधी भवन की सीढ़ियां चढ़े थे। गांधी भवन यानी शहर कांग्रेस का कार्यालय और वहां भाजपा नेता का आगमन। भावभीनी अगवानी ही नहीं होती है, बल्कि मंत्रीजी का अल्पाहार के साथ गुलाब जामुन से मुंह भी मीठा करवाया जाता है।
खूब ठहाके भी गांधी भवन में गूंजे। पं. दीनदयाल उपाध्यायजी की विचारधारा से जुड़े एक नेता का मोहनदास करमचंद गांधी के विचार से जुड़े दल के दफ्तर पर क्यां यूं ही सहज आना-जाना हो गया? नहीं, ये अकस्मात या किसी राजनीतिक गुणा-भाग के तहत नहीं था। ये प्रवास इंदौर की उस राजनीति का उत्कृष्ट उदाहरण था, जहां विरोधी दल होने के बावजूद परस्पर वैमनस्यता व कटुता नहीं।
ये ही इंदौर की दशकों की रिवायत है और इसी भरोसे कैलाश विजयवर्गीय गांधी भवन की सीढ़ियां चढ़ जाते हैं। उसी गांधी भवन के सामने शनिवार को जो कल हुआ, क्या वह अहिल्या नगरी में होने वाली राजनीति का चित्र है?
शनिवार को जो गांधी भवन से मच्छी बाजार चौराहे के बीच घटा वह इंदौर की पहचान नहीं है, न ये पहचान बनना चाहिए। जो हुआ उसे पहली व अंतिम घटना मान यहीं थामना होगा। दोनों दलों को इसे भूलना होगा। ये शहरहित में भी है और दोनों दलों की युवा होती राजनीति के हित में भी है। दो विरोधी विचारों वाले दलों के बीच इस तरह की हिंसक परिपाटी अहिल्या नगरी की नहीं रही है।
अहिल्या नगरी ही नहीं, मालवा-निमाड़ की भी नहीं रही और न मध्यप्रदेश की। लिहाजा ये पत्थरबाजी की परिपाटी यहां दोनों दल शुरू न करें। कांग्रेस-भाजपा विचारों से लड़ें, जुबान चलाएं, हाथ-पैर नहीं। आपस में गुत्थमगुत्था होना शर्मनाक है।
ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ था कि कांग्रेस, भाजपा आमने-सामने हुए। पहले भी कभी कांग्रेस, भाजपा के दफ्तर तो कभी भाजपा, कांग्रेस कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन करने पहुचीं। गर्मागर्मी के बीच धरने-प्रदर्शन पहले भी हुए हैं, लेकिन सिर कल पहली बार फूटे हैं।
नेता-कार्यकर्ता का खून पहली बार बहा है। ऐसे हिंसक प्रदर्शन इंदौर की परंपरा नहीं। लिहाजा दोनों दल प्रदेश की राजनीतिक राजधानी इंदौर को ही नहीं, मध्यप्रदेश को पश्चिम बंगाल व केरल न बनाएं। वहां बात-बात में हिंसा ही नहीं, हत्या तक होती है। हमारे प्रदेश में ऐसा आज तक नहीं हुआ। मध्यप्रदेश की राजनीति में मतभेद स्वीकार्य हैं, मनभेद नहीं।
ताजा मामला मध्यप्रदेश में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार व उन्हीं कैलाश विजयवर्गीय के बीच का है, जो गांधी भवन आए थे। सदन की तल्खी कुछ घंटों बाद ही माफी के साथ खत्म हुई और विजयवर्गीय ने सिंघार को पुत्रवत बताकर मामले का पटाक्षेप किया।
उसी सूबे में कांग्रेस-भाजपा आपस में हिंसक क्यों? शनिवार के दुःखद प्रसंग का सुखद अंत कैसे हो? इसकी चिंता दोनों दल के युवा नेताओं को करना ही होगी अन्यथा एक गलत परंपरा की शुरुआत हो जाएगी, जो प्रदेश हित में नहीं है।
अनेक शहरों में हुए हिंसक प्रदर्शन को हलके में न ले मोहन सरकार... भविष्य में शनिवार जैसी घटना फिर इंदौर में न हो, इसके लिए पुलिस प्रशासन को निष्पक्ष रवैया अपनाना होगा। पुलिस पूरे मामले की निष्पक्ष न सिर्फ जांच करे, बल्कि दोषियों को चिह्नित कर कड़ी कार्रवाई भी करे ताकि भविष्य में ऐसी हरकतों की पुनरावृत्ति न हो।
प्रदेश की मोहन सरकार भी इस तरह की राजनीतिक हिंसा को हलके में न ले, क्योंकि हिंसा सिर्फ इंदौर में ही नहीं हुई है। सूबे की राजधानी भोपाल में भी हुई है और मुख्यमंत्री के गृह जिले व नगर उज्जैन में भी हुई है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में हुए ये हिंसक प्रदर्शन चिंता का विषय हैं।
खासकर तब, जब कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व टकराव की राजनीति पर आगे बढ़ रहा है और भाजपा टक्कर देने के मूड में नजर आ रही है। अंतरराष्ट्रीय एआई समिट से शुरू हुई ये राजनीति कम से कम मध्यप्रदेश में तो हिंसक रूप न ले।
समय रहते इसके लिए सिर्फ सरकार ही नहीं, दोनों राजनीतिक दल के संगठनों को भी इसकी चिंता करना होगी। ये हिंसक प्रदर्शन मध्यप्रदेश, इंदौर की पहचान नहीं है।
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