लाभकारी मूल्य की मांग: किसान करेंगे देशव्यापी आंदोलन फिर उठी लागत के आधार पर
KHULASA FIRST
संवाददाता

किसानों के हित में नहीं मोदी-शिवराज की नीतियां
तहसील से संभाग स्तर तक सड़कों पर उतरेंगे किसान, कपास 1 अक्टूबर से खरीदे सरकार
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
किसान संघ की प्रमुख मांग है कि फसलों की खरीद लागत के आधार पर लाभकारी मूल्य पर की जाए। संगठन का कहना है कि जिस फसल का समर्थन मूल्य सरकार द्वारा तय किया जाता है, उसकी खरीद समर्थन मूल्य से कम पर नहीं होनी चाहिए और किसानों की संपूर्ण उपज की खरीद समर्थन मूल्य पर सुनिश्चित की जाए। इसके साथ ही ऐसी व्यवस्था बनाने की मांग भी की गई है, ताकि समर्थन मूल्य से कम पर व्यापारी किसानों की फसल न खरीद सकें।
किसानों का कहना है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और उसके कृषिमंत्री शिवराजसिंह चौहान किसानों के हित में आज तक कोई भी फैसला नहीं ले पाए। जो नीतियां हैं वे भी किसानों के साथ न्याय नहीं करतीं। इसीलिए देश के किसानों में सरकार के खिलाफ आक्रोश है। आंदोलन के दौरान तुवर, मक्का सहित अन्य फसलों की खरीद समर्थन मूल्य पर पुनः शुरू करने की मांग भी उठाई जाएगी।
इसके अलावा विद्युत वितरण से जुड़ी समस्याओं को लेकर भी किसान संघ मुखर है। संगठन ने हाई-टेंशन लाइन के लिए अधिग्रहित की जा रही किसानों की जमीन और हाईवे निर्माण के लिए अधिग्रहित भूमि के एवज में चार गुना मुआवजा दिए जाने की मांग रखी है।
भारतीय किसान संघ के अनुसार संगठन प्रति वर्ष केंद्र और राज्य सरकार के समक्ष लंबित महत्वपूर्ण कृषि मांगों को लेकर देशव्यापी स्तर पर इस प्रकार का आंदोलन करता आया है। इसी क्रम में 15 सितंबर को इंदौर सहित पूरे मालवा अंचल में ज्ञापन और आंदोलन कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। संगठन ने किसानों से अपील की है कि वे अपने-अपने क्षेत्र में इस आंदोलन को लेकर अन्य किसानों को जागरूक करें और कार्यक्रम में सहभागी बनें।
मक्का, सोयाबीन और तुअर की समर्थन मूल्य पर खरीदी... सातवीं प्रमुख मांग मक्का, सोयाबीन और तुअर की समर्थन मूल्य पर खरीदी सुनिश्चित करने की है। किसान संघ का कहना है कि किसानों को उनकी उपज का घोषित समर्थन मूल्य मिले और सरकारी खरीदी की व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू की जाए।
सरकार तक पहुंचाएंगे आवाज... भारतीय किसान संघ ने कहा है कि संगठन पिछले 47 वर्षों से किसान समाज के जनजागरण और समस्याओं के समाधान के लिए प्रयासरत है। इसी क्रम में भीकनगांव क्षेत्र के किसानों की समस्याओं को सरकार और प्रशासन तक पहुंचाने के लिए वाहन रैली, ज्ञापन और आमसभा का आयोजन किया जा रहा है।
किसान 500 ट्रैक्टर्स के साथ किसान मार्च भी करेंगे। 15 सितंबर को होने वाला यह कार्यक्रम क्षेत्र के किसानों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें सिंचाई, भूमि अधिग्रहण, बिजली, कपास खरीदी, कृषि ऋण, हाईटेंशन लाइन मुआवजा और फसलों की समर्थन मूल्य पर खरीदी जैसे सात प्रमुख मुद्दे एक साथ उठाए जाएंगे। यह प्रदर्शन खरगोन जिले की सभी तहसीलों में होगा।
परियोजना है, लेकिन सिंचाई नहीं... भीकनगांव के बिजलवाड़ा उद्वहन सिंचाई परियोजना का पानी किसानों के खेतों तक पहुंचाने, राष्ट्रीय राजमार्ग-347 बी के लिए अधिग्रहित भूमि का चार गुना मुआवजा देने सहित किसानों की विभिन्न समस्याओं को लेकर आंदोलन किया जाएगा। किसान संघ जिला अध्यक्ष सदाशिव पाटीदार और संभाग के युवा वाहिनी प्रमुख श्याम पवार ने बताया तहसील भीकनगांव-झिरन्या, जिला खरगोन के किसानों की ओर से आगामी 15 सितंबर को वाहन रैली, ज्ञापन और आमसभा आयोजित की जाएगी।
संघ के श्याम पवार के अनुसार क्षेत्र की सिंचाई परियोजना का काम 98 प्रतिशत पूर्ण हो चुका है, फिर भी खेतों तक पानी नहीं पहुंच रहा। किसान संघ का कहना है कि बिजलवाड़ा उद्वहन सिंचाई परियोजना को विभाग द्वारा लगभग 98 प्रतिशत पूर्ण बताया गया है, लेकिन वास्तविक स्थिति में परियोजना का पानी अभी भी केवल कुछ नदी-नालों तक ही पहुंच पाया है।
किसानों की मांग है कि परियोजना का निर्माण गुणवत्तापूर्ण तरीके से शीघ्र पूरा कर क्षेत्र के सभी किसानों के खेतों में लगे ओएमएस बॉक्स के माध्यम से पानी उपलब्ध कराया जाए। संगठन का आरोप है कि यदि किसान अभी जागरूक नहीं हुए तो कंपनी, ठेकेदार और प्रशासन कागजों पर परियोजना को पूर्ण दिखाकर काम समाप्त कर सकते हैं। इसी को लेकर किसानों से बड़ी संख्या में रैली में पहुंचने का आह्वान किया गया है।
चार गुना मुआवजा मांगा... किसानों की दूसरी प्रमुख मांग राष्ट्रीय राजमार्ग-347 बी के देशगांव से जुलवानिया तक प्रस्तावित फोरलेन सड़क के लिए अधिग्रहित भूमि से जुड़ी है। भारतीय किसान संघ ने जमीन का बाजार मूल्य के आधार पर पुनर्मूल्यांकन कर चार गुना मुआवजा देने की मांग उठाई है।
ट्रांसफार्मर और बिजली व्यवस्था सुधार की मांग...किसान संघ ने ग्रामीण बिजली व्यवस्था को लेकर भी नाराजगी जताई है। संगठन की मांग है कि ओवरलोड ट्रांसफार्मरों को अंडरलोड किया जाए और जले हुए ट्रांसफार्मर 24 घंटे के भीतर उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही ट्रांसफार्मर से जुड़ी समस्या के समाधान के लिए सब-डिविजन स्तर पर एंबुलेंस जैसी त्वरित सेवा शुरू करने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऐसी सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की गई है।
कपास खरीदी 1 अक्टूबर से शुरू हो...कपास किसानों के लिए संगठन ने भारतीय कपास निगम (सीसीआई) से 1 अक्टूबर से तत्काल खरीदी शुरू करने की मांग की है। किसान संघ के अनुसार कपास की ए, बी और सी ग्रेड के रूप में खरीदी की जाए और 25 प्रतिशत तक नमी वाले कपास की खरीदी हो, ताकि किसानों को अपनी उपज बेचने में परेशानी न आए।
कर्ज पर राहत देने की मांग फिर दोहराई...किसानों की एक अन्य मांग राष्ट्रीयकृत बैंकों की तर्ज पर आदिम जाति सहकारी सोसायटियों के लिए भी एकमुश्त समझौता योजना लागू करने की है। संगठन ने किसानों की ऋण सीमा 3 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपए करने और शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराने की मांग रखी है।
हाईटेंशन लाइन के टॉवर पर 10 लाख मुआवजा मिले...किसानों ने हाईटेंशन टॉवर लाइन को लेकर भी स्पष्ट नीति की मांग की है। संगठन का कहना है कि किसानों की सहमति के बिना खेतों में हाईटेंशन लाइन के पोल और तार नहीं लगाए जाएं तथा प्रत्येक टॉवर के लिए किसान को 10 लाख रुपए मुआवजा दिया जाए।
शिवराज के होते हुए भी बार-बार आंदोलन को मजबूर किसान
पांच वर्ष बाद भी रिपोर्ट का अता-पता नहीं...किसान संघ द्वारा प्रस्तावित विशाल आंदोलन के बीच किसान संगठनों ने एक बार फिर केंद्र सरकार से सीधा सवाल पूछा है कि समर्थन मूल्य पर पूरी उपज की खरीद, लागत आधारित लाभकारी मूल्य और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने जैसी मांगें बरसों से लंबित क्यों हैं। संगठन का कहना है कि ये सभी मांगें सीधे तौर पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के दायरे में आती हैं, जिसकी कमान वर्तमान में केंद्रीय मंत्री शिवराजसिंह चौहान के पास है।
किसान नेताओं का सवाल है कि जब मंत्रालय और सरकार बार-बार ज्ञापन और मांगपत्र मिलने के बावजूद इन विषयों पर ठोस निर्णय नहीं ले पा रहे, इसलिए किसानों को सड़क पर उतरकर आंदोलन करना पड़ता है। गौरतलब है स्वामीनाथन आयोग ने फसल की लागत (सी2) पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की सिफारिश की थी, जिसे किसान संगठन लंबे समय से कानूनी गारंटी के रूप में लागू करने की मांग कर रहे हैं।
किसान संघ के अनुसार तुवर, मक्का जैसी फसलों की समर्थन मूल्य पर खरीद रुकना भी इसी नीतिगत उदासीनता का उदाहरण है। सवालों के बीच केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराजसिंह चौहान और सरकार का पक्ष भी सामने आता रहा है।
संसद में कई मौकों पर चौहान यह दावा कर चुके हैं कि मोदी सरकार ने वर्ष 2018-19 से ही सभी अधिसूचित फसलों का समर्थन मूल्य उत्पादन लागत पर कम से कम 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर तय करने की नीति अपनाई है। उन्होंने संसद में यह भी कहा था कि पूर्ववर्ती संप्रग सरकार इस मामले में गंभीर नहीं थी।
एमएसपी की कानूनी गारंटी को लेकर उठ रही मांगों पर सरकार ने वर्ष 2021 के किसान आंदोलन के बाद एक समिति गठित की थी, जिसे व्यवस्था को अधिक प्रभावी व पारदर्शी बनाने और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) को अधिक स्वायत्तता देने के उपाय सुझाने का जिम्मा सौंपा गया है।
सरकार का कहना रहा है कि समिति की रिपोर्ट आने पर उस पर विचार किया जाएगा। हालांकि संयुक्त किसान मोर्चा सहित भारतीय किसान संघ और कई किसान संगठनों का कहना है कि सरकार जिस फॉर्मूले को सी2 प्लस 50 प्रतिशत बताती है, वह वास्तव में स्वामीनाथन आयोग द्वारा सुझाए गए व्यापक लागत (सी2) फॉर्मूले के बजाय उससे संकुचित फॉर्मूले पर आधारित है और अब तक किसी फसल पर एमएसपी की कानूनी गारंटी नहीं दी गई है। संगठनों का यह भी कहना है कि गठित समिति से अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है, जिसके चलते किसानों को बार-बार आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ रहा है।
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