हादसे दर हादसे, मौत दर मौत: कार्रवाई का पैटर्न वही; हर बार छोटे अफसर सस्पेंड, लेकिन नहीं चेत रही सरकार
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्यप्रदेश में बीते करीब डेढ़ साल में सामने आई कई बड़ी घटनाओं ने सरकारी व्यवस्थाओं और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कहीं जहरीली शराब ने जानें लीं, कहीं दूषित पानी मौत का कारण बना, कहीं बच्चों की मौतें कुपोषण और संक्रमण से हुईं तो कहीं जहरीले कफ सिरप ने मासूमों की जान ले ली।
छोटे अफसर सस्पेंड
इन घटनाओं के बाद सरकारों ने कार्रवाई भी की सस्पेंशन, तबादले, अटैचमेंट, एफआईआर और जांच आयोग तक बनाए गए। लेकिन इन मामलों को एक साथ देखने पर एक बड़ा सवाल उभरता है: क्या हर बार कार्रवाई की शुरुआत सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों और अधिकारियों से ही होती है? और क्या बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी जांच रिपोर्ट के इंतजार में टलती रहती है?
सागर: जहरीली शराब ने खोली निगरानी व्यवस्था की पोल
सितंबर 2026 में सागर जिले के बंडा क्षेत्र के गांवों में कथित जहरीली शराब पीने के बाद मौतों का सिलसिला शुरू हुआ। सरकारी आंकड़ों में मृतकों की संख्या बढ़ती रही, जबकि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इससे कहीं ज्यादा मौतों का दावा किया।
मामले में शराब ठेकेदार समेत 30 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई और 14 आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई। आबकारी विभाग और स्थानीय प्रशासन के स्तर पर भी कार्रवाई हुई।
सहायक आबकारी आयुक्त, सहायक जिला आबकारी अधिकारी और आबकारी सब-इंस्पेक्टर समेत अधिकारियों को निलंबित किया गया। बंडा चौकी प्रभारी पर भी कार्रवाई हुई। आबकारी उपायुक्त को मुख्यालय अटैच किया गया, जबकि बंडा एसडीएम को भी हटाकर कलेक्टर कार्यालय से संबद्ध किया गया।
लेकिन अब सवाल यह है कि जिला प्रशासन और पुलिस की ऊपरी जवाबदेही कहां तक तय होगी? फिलहाल मजिस्ट्रियल जांच जारी है और अंतिम रिपोर्ट का इंतजार है।
बालाघाट: बच्चों की मौत, पोषण और स्वास्थ्य व्यवस्था सवालों में
बालाघाट के बैगा आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों की मौतों ने स्वास्थ्य और पोषण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। शुरुआत में सरकारी आंकड़ों में मौतों की संख्या कम रही, जबकि बाद में आंकड़ा बढ़ा।
विपक्ष की ओर से इससे भी ज्यादा मौतों का दावा किया गया। मामले में कुपोषण, मलेरिया और अन्य संक्रमण के साथ पोषण आहार वितरण तथा स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर सवाल उठे।
इसके बाद सीएमएचओ डॉ. परेश उपलव को पद से हटाया गया और स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर अन्य कार्रवाई भी हुई। आईसीएमआर की रिपोर्ट के बाद जांच आगे बढ़ी। हाईकोर्ट में भी मामला पहुंचा और अदालत ने स्थिति की वास्तविकता जांचने पर जोर दिया।
लेकिन यहां भी बड़ा सवाल यही रहा क्या सिर्फ एक अधिकारी को हटाने से उस पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी तय हो जाती है, जिसमें महीनों तक पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी होनी थी?
जबलपुर क्रूज हादसा: पायलट-हेल्पर पर कार्रवाई, फिटनेस मंजूरी देने वाले?
30 अप्रैल 2026 को बरगी बांध के नर्मदा बैकवाटर में क्रूज पलटने से 13 लोगों की मौत हुई। शुरुआती जांच में क्रूज की फिटनेस, इंजन की खराबी, सुरक्षा मानकों और संचालन व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठे।
हादसे के बाद क्रूज पायलट, हेल्पर और टिकट काउंटर इंचार्ज को नौकरी से हटाया गया, जबकि एक मैनेजर पर निलंबन की कार्रवाई हुई। साथ ही हाईकोर्ट के निर्देश और सरकार की ओर से न्यायिक जांच आयोग का गठन किया गया।
सभी नौकाओं और क्रूज के ऑडिट तथा सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश भी दिए गए। लेकिन सवाल अभी भी कायम है अगर फिटनेस प्रमाणित करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में थी, तो उनकी जवाबदेही का क्या हुआ?
सरकार की ओर से यह कहा गया कि अंतिम जिम्मेदारी जांच रिपोर्ट के बाद तय होगी। यानी यहां भी निर्णायक कार्रवाई की गेंद जांच आयोग के पाले में चली गई।
भागीरथपुरा: दूषित पानी से मौतें, रिपोर्ट में प्रशासनिक चूक
इंदौर के भागीरथपुरा में सीवेज के दूषित पानी के मुख्य पेयजल पाइपलाइन में मिल जाने से 36 लोगों की मौत हो गई। बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए। जांच में पाइपलाइन और तकनीकी व्यवस्था की खामियां सामने आईं।
जांच में कुछ नगर निगम अधिकारियों की जिम्मेदारी तय किए जाने की बात सामने आई, जबकि वरिष्ठ अधिकारियों और एमआईसी को राहत मिली। यही मामला सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा करता है अगर व्यवस्था की निगरानी में ऊपर से नीचे तक कई स्तर शामिल हैं, तो जवाबदेही तय करते समय बड़े पदों तक कार्रवाई क्यों नहीं पहुंचती?
मामले की जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश हो चुकी है, लेकिन रिपोर्ट को सार्वजनिक करने को लेकर न्यायिक प्रक्रिया जारी है। इसलिए अंतिम निष्कर्षों पर अभी पूरी तरह टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी।
कोल्ड्रिफ कफ सिरप: बच्चों की मौत और सिस्टम की चूक
2025 में मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और बैतूल क्षेत्रों में बच्चों की मौतों ने देशभर में चिंता पैदा की। जांच में डायथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) की खतरनाक मात्रा वाले कफ सिरप का मामला सामने आया। इस मामले में डॉक्टर समेत कई लोगों को आरोपी बनाया गया।
एसआईटी गठित हुई, मेडिकल दुकानों पर कार्रवाई हुई और दवा की जांच कराई गई। पुलिस ने मामले में चार्जशीट भी पेश की। यहां कार्रवाई का बड़ा हिस्सा उन लोगों पर केंद्रित रहा जो सिरप की सप्लाई, बिक्री या प्रिस्क्रिप्शन से जुड़े थे।
लेकिन इससे एक बड़ा सवाल भी सामने आया ऐसी खतरनाक दवा बाजार तक पहुंचने से पहले नियामक तंत्र कहां था?
हर मामले में जांच, लेकिन जवाबदेही कब?
सागर, बालाघाट, जबलपुर, इंदौर और कफ सिरप कांड इन सभी मामलों की परिस्थितियां अलग हैं। किसी एक घटना को दूसरे के बराबर रखना भी सही नहीं होगा। लेकिन इन घटनाओं में एक साझा सवाल जरूर दिखाई देता है। क्या सरकारी तंत्र में जवाबदेही तय करने का पैमाना पद के साथ बदल जाता है?
घटना होती है।
एफआईआर दर्ज होती है।
कुछ अधिकारी सस्पेंड होते हैं।
कुछ का तबादला या अटैचमेंट होता है।
जांच आयोग बनता है।
और फिर शुरू होता है, रिपोर्ट आने दीजिए।
जांच जरूरी है और निष्पक्ष जांच के बिना किसी को दोषी ठहराना भी उचित नहीं। लेकिन जांच की प्रक्रिया अनिश्चित समय तक चलती रहे तो पीड़ित परिवारों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि आखिर अंतिम जवाबदेही तय कब होगी?
सवाल सिर्फ कार्रवाई का नहीं, सिस्टम की जवाबदेही का है
हर हादसे के बाद तत्काल कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि उन व्यवस्थागत कमियों को चिन्हित किया जाए जिनके कारण हादसा हुआ। अगर अवैध शराब महीनों तक बिकती रही, पोषण आहार का वितरण बाधित रहा, खराब इंजन के बावजूद क्रूज चलता रहा, दूषित पानी की पाइपलाइन समय पर नहीं बदली गई या खतरनाक दवा बाजार तक पहुंच गई तो सवाल सिर्फ उस कर्मचारी का नहीं होना चाहिए जिसने आखिरी स्तर पर गलती की।
सवाल उस पूरी चेन का होना चाहिए, जहां निगरानी, अनुमति, निरीक्षण और जवाबदेही की कई सीढ़ियां मौजूद होती हैं। मध्यप्रदेश में अब चुनौती सिर्फ दोषियों को सजा देने की नहीं, बल्कि ऐसा सिस्टम बनाने की है जिसमें हादसे के बाद कार्रवाई से पहले हादसे को रोकने की जिम्मेदारी तय हो।
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