ब्रह्मपुत्र पर चीन का मेगा बांध विकास की परियोजना या भारत पर रणनीतिक दबाव
KHULASA FIRST
संवाददाता

नीरज कुमार दुबे स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दरअसल ब्रह्मपुत्र केवल एक नदी नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की जीवनरेखा है। इसका कुल प्रवाह मार्ग लगभग 2880 किलोमीटर लंबा है, जिसमें करीब 1625 किलोमीटर तिब्बत, लगभग 918 किलोमीटर भारत और करीब 337 किलोमीटर बांग्लादेश में बहता है।
यह दुनिया की सबसे अधिक जलप्रवाह वाली नदियों में से एक है और मानसून के समय इसका औसत जल प्रवाह लगभग 19,800 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच जाता है। असम और अरुणाचल प्रदेश की कृषि, मत्स्य पालन, जल परिवहन और पारिस्थितिकी इस नदी पर काफी हद तक निर्भर है।
हिमालय से निकलने वाली नदियां केवल जलधाराएं नहीं होतीं, वह राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के समीकरणों को भी प्रभावित करती हैं। इन्हीं नदियों में से एक है ब्रह्मपुत्र, जो तिब्बत से निकलकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और फिर बांग्लादेश तक जीवनदायिनी धारा के रूप में बहती है।
हाल के वर्षों में तिब्बत क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र पर चीन द्वारा बनाई जा रही विशाल जलविद्युत परियोजना ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह परियोजना केवल ऊर्जा उत्पादन की जरूरत से प्रेरित है या इसके पीछे भारत पर रणनीतिक दबाव बनाने की योजना भी छिपी हुई है?
उल्लेखनीय है कि चीन जिस परियोजना पर काम कर रहा है, उसे दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक माना जा रहा है। इसकी अनुमानित उत्पादन क्षमता लगभग 60,000 मेगावाट बताई जाती है, जो वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े जलविद्युत संयंत्र ‘थ्री गॉर्जेस डैम’ से भी कई गुना अधिक है। इस परियोजना पर करीब 1.2 ट्रिलियन युआन, यानी लगभग 140 से 170 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है। योजना के अनुसार इसमें पांच बड़े कैस्केड बांध बनाए जाएंगे और इससे हर साल लगभग 300 अरब यूनिट बिजली पैदा की जा सकेगी। यह बिजली उत्पादन कई देशों की कुल वार्षिक खपत के बराबर माना जाता है।
यह परियोजना तिब्बत में उस स्थान के पास बनाई जा रही है जहां ब्रह्मपुत्र नदी नामचा बरवा पर्वत के आसपास एक विशाल मोड़ बनाकर भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। भूगोल की दृष्टि से यह स्थान बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ नदी का प्रवाह बहुत तीव्र हो जाता है और गहरी घाटियाँ बनती हैं। इसी कारण इसे जलविद्युत उत्पादन के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है। लेकिन यही भौगोलिक स्थिति भारत और बांग्लादेश के लिए चिंता का कारण भी बन गई है।
दरअसल ब्रह्मपुत्र केवल एक नदी नहीं बल्कि पूर्वोत्तर भारत की जीवनरेखा है। इसका कुल प्रवाह मार्ग लगभग 2880 किलोमीटर लंबा है, जिसमें करीब 1625 किलोमीटर तिब्बत, लगभग 918 किलोमीटर भारत और करीब 337 किलोमीटर बांग्लादेश में बहता है। यह दुनिया की सबसे अधिक जलप्रवाह वाली नदियों में से एक है और मानसून के समय इसका औसत जल प्रवाह लगभग 19,800 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच जाता है। असम और अरुणाचल प्रदेश की कृषि, मत्स्य पालन, जल परिवहन और पारिस्थितिकी इस नदी पर काफी हद तक निर्भर हैं।
हालांकि एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि ब्रह्मपुत्र का अधिकांश जल भारत में ही बनता है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार नदी के कुल प्रवाह का लगभग 65 से 70 प्रतिशत हिस्सा भारत में उत्पन्न होता है, जो मुख्यतः मानसूनी वर्षा और सहायक नदियों से आता है। चीन के हिस्से से आने वाला जल लगभग 22 से 35 प्रतिशत के बीच माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि चीन भले ही नदी के ऊपरी हिस्से में स्थित हो, लेकिन पूरे नदी तंत्र के जल पर उसका पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं है।
इसके बावजूद भारत की चिंताएं पूरी तरह निराधार नहीं कही जा सकतीं। यदि चीन नदी के ऊपरी हिस्से में बड़े पैमाने पर जल संरचनाएं बनाता है, तो उसे पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने की एक हद तक क्षमता मिल सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार यह नियंत्रण कई प्रकार की परिस्थितियां पैदा कर सकता है। उदाहरण के लिए, यदि गैर-मानसून के समय पानी रोक लिया जाए तो नीचे के क्षेत्रों में जल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। वहीं यदि अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा जाए तो असम और बांग्लादेश में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण पहलू डेटा नियंत्रण का है। अंतरराष्ट्रीय नदियों के मामले में जल प्रवाह और मौसम से जुड़ा हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। अतीत में भारत और चीन के बीच ऐसे समझौते हुए हैं जिनके तहत चीन मानसून के समय ब्रह्मपुत्र के जल स्तर की जानकारी भारत को देता है। लेकिन जब दोनों देशों के बीच सीमा तनाव बढ़ा, तब कुछ समय के लिए यह डेटा साझा करना भी बाधित हुआ। इससे यह आशंका मजबूत हुई कि जल संसाधन भी भविष्य में कूटनीतिक दबाव का साधन बन सकते हैं।
इस परियोजना से जुड़ी पर्यावरणीय चिंताएं भी कम नहीं हैं। हिमालय का यह क्षेत्र भूकंप और भूस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। यदि किसी बड़े भूकंप या प्राकृतिक आपदा के कारण बांध को नुकसान होता है तो उसके परिणाम नीचे के देशों के लिए विनाशकारी हो सकते हैं। इतनी बड़ी जलराशि का अचानक बहाव असम और बांग्लादेश में गंभीर तबाही ला सकता है।
दूसरी ओर, चीन इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहता है कि यह परियोजना ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ तकनीक पर आधारित है, जिससे नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। उसका तर्क है कि यह परियोजना स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के माध्यम से कार्बन उत्सर्जन कम करने और तिब्बत क्षेत्र के आर्थिक विकास में मदद करेगी। दूसरी ओर भारत भी पूरी तरह निष्क्रिय नहीं है। ब्रह्मपुत्र बेसिन में भारत लगभग 76 गीगावाट जलविद्युत क्षमता विकसित करने की योजना बना रहा है, जिसमें से करीब 52 गीगावाट क्षमता केवल अरुणाचल प्रदेश में संभावित मानी जाती है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ नदी के जल प्रबंधन में संतुलन बनाए रखना भी है।
स्पष्ट है कि ब्रह्मपुत्र पर चीन का यह मेगा बांध केवल एक ऊर्जा परियोजना नहीं है। यह आधुनिक दौर की ‘जल भू-राजनीति’ का उदाहरण भी है, जहां नदी के स्रोत पर स्थित देश को स्वाभाविक रणनीतिक बढ़त मिल जाती है। चीन इसे विकास और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से देखता है, जबकि भारत इसे जल सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों से जोड़कर समझता है।
बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि ब्रह्मपुत्र भविष्य में सहयोग का माध्यम भी बन सकती है और तनाव का कारण भी। यदि भारत, चीन और बांग्लादेश पारदर्शी जल प्रबंधन, डेटा साझेदारी और पर्यावरणीय सुरक्षा के साझा ढांचे पर सहमत हो जाएँ, तो यह नदी संघर्ष की धारा नहीं बल्कि क्षेत्रीय सहयोग और समृद्धि की धारा बन सकती है। हालांकि लेकिन इसके लिए विश्वास, पारदर्शिता और दूरदर्शी कूटनीति की आवश्यकता होगी। (इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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