टिकेगी या रणछोड़ साबित होगी कांग्रेस: ऐन मौके पर जागी कांग्रेस; फिर भी हैं उम्मीदें
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी दमखम से सरकार की खिलाफत करते तो हैं, लेकिन जितनी उग्रता से हल्ला बोलते हैं, उतने ही तेजी से परिदृश्य से ओझल भी हो जाते हैं। यही स्थिति उमंग सिंगार की है। बिना हाईकमान के डंडे के प्रदेश कांग्रेस के नेता सक्रिय नहीं हो पाते।
वैसे भी प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेताओं पर प्रदेश सरकार का खौफ कई मौके पर दिखता है, यह बात अक्सर छोटे कार्यकर्ता कहते हैं। जो भी हो, भला हो कांग्रेस का कि उसने किसानों की मांगों को लेकर प्रदेशभर में एक बड़ा प्रभावी आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया।
आज कांग्रेस प्रदेशभर में किसानों के लिए मैदान में उतर रही है। हर जिले पर कलेक्टर का घेराव हो रहा है। कांग्रेस की मांग है कि गेहूं का समर्थन मूल्य 2585 रुपए बहुत कम है। यह 3000 रु. क्विंटल हो और इसी भाव से सरकार गेहूं की खरीदी करे। सरकार ऐसा नहीं कर रही है, इसलिए कांग्रेस का यह आंदोलन सरकार को किसानों के साथ न्याय करने के लिए बाध्य करेगा।
सवाल यह है कि आरोप-प्रत्यारोप की सियासत तक ही यह आंदोलन सीमित रहेगा या फिर कांग्रेस मांगे मंजूर कराने तक मैदान में डटी रहेगी? किसानों का कहना है कि गेहूं का भाव 2700 रुपया भी मिल जाए तो राहत होगी।
विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन खरीदी शुरू होने के ठीक पहले शुरू हुआ। किसानों में भी मिश्रित प्रतिक्रिया है। कई किसान मानते हैं कि 2,700-2,800 रुपए प्रति क्विंटल का भाव भी व्यावहारिक राहत होगा, और यह आंदोलन एक-दो महीने पहले शुरू होता तो ज्यादा असरदार होता।
क्या कांग्रेस का यह आंदोलन सरकार पर दबाव बना पाएगा या केवल प्रतीकात्मक विरोध बनकर रह जाएगा? फिलहाल प्रदेश के 19 लाख से अधिक किसान सरकारी मंडियों की ओर रुख कर रहे हैं, और उनकी निगाहें उस दर पर टिकी हैं।
कांग्रेस का कहना है कि डीजल, खाद, बीज और मजदूरी की बढ़ती लागत के बीच 2,600 या 2625 रुपए प्रति क्विंटल के भाव में खेती पूरी तरह घाटे का सौदा है। सरकार यदि किसानों के साथ न्याय करना चाहती है तो 3000 रुपए का भाव देना चाहिए।
पार्टी तीन हजार प्रति क्विंटल की मांग को आर्थिक आवश्यकता बता रही है। हालांकि यदि सरकार 400 रुपए अतिरिक्त बोनस देती है, तो प्रदेश सरकार पर मात्र 4000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च आएगा, जो खाद्य सुरक्षा के लिहाज से ज्यादा नहीं है।
इस समय सरकार द्वारा कहा जा रहा है कि इस बार गेहूं का प्रदेश में कुल उत्पादन अनुमानित 130-140 लाख मीट्रिक टन होगा। इस हिसाब से आर्थिक बोझ बढ़ेगा यदि 375 रुपए बोनस देते हैं तो जानकारों का कहना है कि 30 से 40 प्रतिशत किसान अपना गेहूं बाजारों में भेज चुके हैं। सरकार को बमुश्किल 80 लाख मीट्रिक टन गेहूं ही खरीदना पड़ेगा।
प्रदेश में रबी सीजन की गेहूं खरीदी आज (9 अप्रैल) से शुरू हो गई है, लेकिन इसी के साथ समर्थन मूल्य को लेकर सियासी घमासान भी तेज हो गया है। कांग्रेस 3000 रुपए प्रति क्विंटल की मांग को लेकर प्रदेशव्यापी आंदोलन पर उतर आई है।
वहीं सरकार ने समर्थन मूल्य पर 40 रुपए बड़ी मुश्किल से बोनस देने की हां करते हुए किसानों को ऊंट के मुंह में जीरा दिया है। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 1 अक्टूबर 2025 को रबी विपणन सीजन 2026-27 के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2,585 रुपए प्रति क्विंटल घोषित किया, जो पिछले सत्र के 2,425 रुपए की तुलना में 6.59प्रतिशत अधिक है।
मध्य प्रदेश सरकार ने इस एमएसपी पर 15 रुपए प्रति क्विंटल बोनस जोड़ने की घोषणा की है, जिससे प्रदेश के किसानों को कुल 2,600 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिलेगा। जबकि भारतीय किसान संघ का कहना है कि मुख्यमंत्री ने 40 रुपए प्रति क्विंटल बोनस की घोषणा की इसलिए 2625 रुपए का भाव मिलेगा।
नीति निर्माण के समय सक्रियता नहीं दिखी- इससे आंदोलन की गंभीरता पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसा हर गंभीर विषय पर देखने को मिला है जब विपक्ष पूरी तरह उदासीन नजर आया। किसानों का कहना है कि यदि यह आंदोलन एक महीने पहले शुरू होता, तो दबाव ज्यादा प्रभावी होता।
राजनीतिक टाइमिंग पर सवाल
विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का आंदोलन सरकार द्वारा गेहूं की खरीदी शुरू होने के ठीक पहले शुरू हुआ।
क्या यह आंदोलन टिकाऊ होगा?
प्रदेश की राजनीति में विपक्ष के हालात देखते हुए यह एक बड़ा प्रश्न बन गया है कि क्या कांग्रेस लंबे समय तक आंदोलन जारी रखेगी? या यह केवल प्रतीकात्मक विरोध बनकर रह जाएगा? पिछले अनुभव बताते हैं कि कई आंदोलन शुरुआती जोश के बाद ठंडे पड़ जाते हैं।
अन्य मुद्दे भी गंभीर
मध्य प्रदेश में किसानों की समस्याएं केवल समर्थन मूल्य तक सीमित नहीं हैं।
1. भूमि अधिग्रहण विवाद- निमाड़ क्षेत्र में फोरलेन और अन्य परियोजनाओं को लेकर असंतोष है। किसानों को मुआवजा बाजार मूल्य से कम से कम 4 गुना चाहिए, इसके लिए क्या कांग्रेस मैदान में आएगी?
2. गाइड लाइन दरें कम- कई गांवों में जमीन की सरकारी दरें वर्षों से नहीं बढ़ीं, इससे मुआवजा प्रभावित होता है। भूमि अधिग्रहण में 2013 के कानून का पालन सरकार नहीं करती। किसानों को कोर्ट- कचहरी के लिए मजबूर किया जाता है क्या कांग्रेस इस विषय को गंभीरता से लगी।
3. प्रशासनिक व्यवहार- किसानों ने पटवारी और अधिकारियों पर रिश्वत और असंवेदनशीलता के आरोप लगाए। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इन व्यापक मुद्दों पर भी उतनी ही मजबूती से खड़ी होगी?
(नवीनतम आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2026-27 के लिए एमएसपी 2,585 रुपए और मध्य प्रदेश सरकार का बोनस 15 (कुल 2,600 रुपए) है।
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