कब सुधरेगी कांग्रेस: इंदौर लोकसभा चुनाव से भी नहीं सीखा सबक; फिर पिट गई भद्द
KHULASA FIRST
संवाददाता

सुप्रीम कोर्ट पहुंची कांग्रेस ने देर रात लगाई याचिका, आयोग से उम्मीद बरकरार
भाजपा की तीसरी सीट की तैयारियों के बावजूद चौकन्ना नहीं हुई कांग्रेस
दिग्गज नेताओं व लीगल सेल की मौजूदगी के बाद भी नामांकन में कैसे हो गई चूक?
गलतियों से सबक क्यों नहीं लेती कांग्रेस, भाजपा को दोषी ठहराने से पार्टी की नाकामी कम नहीं होती
पार्टी सुप्रीमो की पसंद के उम्मीदवार को भी संभाल नहीं पाई प्रदेश कांग्रेस, अध्यक्ष के एक कार्यकाल में दो बड़ी चूक
2024 के लोकसभा चुनाव में लुटी-पिटी कांग्रेस 2026 के राज्यसभा चुनाव में भी हंसी का पात्र बन गई
कांग्रेस राज्य से लेकर दिल्ली तक अब जाकर हुई लामबंद, राष्ट्रपति से मिलने की भी तैयारी
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कांग्रेस एक बार फिर जगहंसाई का पात्र बन गई। अब वो चुनाव आयोग के समक्ष गुहार लगा रही है। राष्ट्रपति के समक्ष विधायकों की परेड कराने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगा रही है, लेकिन सच्चाई तो सिर्फ एक है- कांग्रेस पार्टी अपने चुनावी कैंडिडेट को सहेज नहीं पाई।
न राजनीतिक रूप से, न चुनावी कानून-कायदों के मुताबिक। नतीजे में पार्टी की बुरी तरह भद् पिट गई। वह राज्यसभा चुनाव जैसा अहम मुकाबला बिना लड़े ही हार गई। वह भी महज एक चूक से।
ये चूक नामांकन-पत्र में एक जानकारी नहीं देने की थी, जो पार्टी के तपे-तपाए नेता, नेतृत्व व लीगल सेल की मौजूदगी में हुई। देश की सबसे पुरानी पार्टी के ये हाल हैं? वह भी तब, जब पार्टी अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।
सामने छल, बल, कपट, षड्यंत्र से लैस बाहुबली भाजपा होने के बावजूद कांग्रेस की राज्यसभा चुनाव की लचर तैयारियां कई सवाल खड़े कर रही हैं। सबसे पहला व बड़ा सवाल तो एक ही है- आखिर कांग्रेस कब सुधरेगी?
क्या मध्य प्रदेश के राज्यसभा चुनाव में जो घटा, उसकी दोषी सिर्फ और सिर्फ भाजपा ही है? इस पराजय में कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं? पार्टी हर बार भाजपा पर ऐसे ही दोष मढ़कर पाक-साफ हो जाएगी? दूसरे पर उंगली उठाने से कांग्रेस के ‘पाप’ कम हो जाएंगे?
जो पार्टी देश के आमचुनाव में देश के सबसे साफ शहर में अपना उम्मीदवार बचा नहीं पाई, वही पार्टी लोकसभा चुनाव में हुई गफलत को राज्यसभा चुनाव में भी दोहराए तो क्या कहें?
वह भी उस राज्य में, जहां दिग्विजय सिंह जैसे कुशल राजनीतिज्ञ व कमलनाथ जैसे बेहतरीन राजनीतिक प्रबंधक मौजूद हैं।
जिस राज्य में पार्टी सुप्रीमो राहुल गांधी के बेहद करीबी नेता जीतू पटवारी प्रदेश अध्यक्ष हों, वहां पार्टी अपने ही आलाकमान की पसंद के कैंडिडेट को राज्यसभा का चुनाव तक जिता नहीं पाई तो सवाल सिर्फ भाजपा के इर्द-गिर्द ही रहेंगे?
कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व इस आसान विजय वाले चुनाव में जिम्मेदारी से अब तक कैसे दूर है? पार्टी के पास मीनाक्षी नटराजन की जीत के पर्याप्त वोट थे, बल्कि उससे 4 वोट ज्यादा थे। बावजूद इसके कांग्रेस पूरे देश मे जगहंसाई का कैसे केंद्र बन गई?
‘घर का भेदिया’ के शोर में क्या इस ‘ब्लंडर मिस्टेक’ को छिपाया जा सकता है? अगर कांग्रेस भेदिया तक ही सीमित रहती है तो ये तय है कि उसे आगे भी ऐसे ही मात के लिए तैयार रहना होगा।
ये केवल ‘घर की मुखबिरी’ तक सीमित मामला नहीं है।
ये कांग्रेस जैसे देश के सबसे बड़े व पुराने राजनीतिक दल की लचर चुनावी तैयारियों से जुड़ा बेहद महत्वपूर्ण मसला भी है। बावजूद इसके पार्टी हर चुनावी मुकाबला उन्हीं घिसे-पिटे तौर-तरीकों से लड़ रही है, जब वह अटक से कटक व कश्मीर से कन्याकुमारी तक सत्तासीन थी।
पूरे देश में एकछत्र राज कर रही भाजपा के चुनावी प्रबंधन से वह कुछ भी सीखना नहीं चाह रही। तब भी नहीं, जब पार्टी देश के एक बड़े हिस्से में राजनीतिक रूप से वनवास के कगार तक पहुंच गई।
हर चुनावी हार के बाद सत्तारूढ़ भाजपा के कथित छल-कपट व सिस्टम के दुरुपयोग पर शोर मचाने से क्या कांग्रेस की पराजय टल रही है?
2024 के महत्वपूर्ण चुनावी मुकाबले में जिस राज्य में कांग्रेस, एक शहर में उम्मीदवारविहीन हो जाती है, उसी राज्य में दो साल बाद पार्टी फिर उम्मीदवारविहीन हो गई।
तब लोकसभा का चुनाव था, अब राज्यसभा का। क्या फर्क पड़ा पार्टी को इन दो सालों में?
राहुल गांधी की खामोशी से प्रदेश कांग्रेस भयभीत
प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की सदारत में कांग्रेस के समक्ष दो बार ऐसी स्थिति निर्मित हुई। बावजूद इसके पटवारी की बॉडी लैंग्वेज व नेता प्रतिपक्ष की भाव-भंगिमा ये नहीं बता रही कि ये दोनों नेता गहरे सदमे में हैं।
पार्टी सुप्रीमो राहुल गांधी ने पार्टी के पुराने व निष्ठावान नेताओं को दरकिनार कर पूरे सूबे की कमान युवा नेतृत्व के हाथ में क्या इस दिन के लिए दे रखी है कि उन्हें अपनी पसंद की उम्मीदवार मीनाक्षी को इस हालत में देखना पड़े?
कल्पना कर सकते हैं कि मध्य प्रदेश में जो हुआ, जो घटा, जो ‘अंटागाफिली’ हुई, उसे लेकर राहुल गांधी की क्या दशा हो रही होगी? नामांकन निरस्ती के तीसरे दिन भी वे अब तक निःशब्द हैं।
एक ऐसा नेता, जो केंद्र की मोदी सरकार व चुनावी प्रक्रिया पर देशभर में सबसे ज्यादा मुखर है, वह तीन दिन से मौन है। आखिर ऐसा क्यों? उनकी मुखरता सोशल मीडिया पर भी नहीं, जबकि पार्टी चुनाव आयोग से लेकर राष्ट्रपति की चौखट तक जा रही है, सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दे रही है।
इससे साफ समझा जा सकता है कि राहुल गांधी को मध्य प्रदेश कांग्रेस से कितना गहरा सदमा लगा है और वे कितने क्रोध में हैं। वे तमाम दिग्गजों को धता बताकर एक साफ-सुथरी छवि वाली गांधीवादी नेता, वह भी महिला का चयन कर उच्च सदन को कितना गहरा संदेश देने जा रहे थे? इतनी गहराई से मध्य प्रदेश कांग्रेस के राजनीतिक नेतृत्व ने नटराजन का ये राज्यसभा चुनाव लिया?
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