ये इंदौर में हो क्या रहा है: थम नहीं रहा हत्याओं का दौर; लाठी नहीं, गोली की भाषा
KHULASA FIRST
संवाददाता

8 साल के मासूम बेटे के सामने पिता की निर्मम हत्या... उफ्! कितना दर्दनाक
मामूली बात पर शहर में हो रही चाकूबाजी की घटनाएं, आए दिन हमले, पथराव, आगजनी
‘डॉन’ बनने का शौक पालने वाले ‘छपरियों’ व ‘बारीकों’ से तंग आ चुका इंदौर, अब तो इलाज हो
‘हाथ-पांव में दम नहीं, हम किसी से कम नहीं’ वाले ‘पहलवानों’ से आमजन के साथ अब पुलिस भी परेशान
कुख्यात गुंडे, दादा बहादुर तो ‘सूम काटकर’ बैठे हैं, ये नए ‘पेलवानों’ का कड़क इलाज जरूरी
गुंडई का शौक पालने वालों के अब सिर्फ हाथ-पैर ही नहीं, कमर भी तोड़ना जरूरी
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आखिर ये इंदौर में हो क्या रहा है? ऐसा कोई दिन नहीं बीत रहा, जब कोई चाकूबाजी की घटना नहीं हो रही। ऐसी कोई रात नहीं बीत रही, जब घर के बाहर खड़े वाहनों पर पत्थर न बरसाए जा रहे हों या आगजनी न हो। ऐसा कोई सप्ताह नहीं बीत रहा, जब कोई हत्या नहीं हो रही? ऐसी हरकतें करने वालों के पुलिस चमड़े भी जमकर उधेड़ रही है।
बावजूद इसके घटनाएं थम ही नहीं रहीं। पुलिस हरकत करने वालों के हाथ-पैर भी तोड़ रही है। गुंडागर्दी करने वाले इलाकों व सड़कों पर ले जाकर उठक-बैठक भी लगवा रही है। फिर भी शहर से ये गुंडई खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही? क्या ये लाठी के बेअसर होने का इशारा है या ये डिमांड है कि अब लाठी नहीं, ये छुटभैये गुंडों की आए दिन की गुंडई गोली की भाषा मांग रही है?
हीरा नगर में मासूम बालक के सामने पिता की हत्या का मामला भी तो छुटभैये गुंडों की हरकत हैं। ये छटांकभर के बदमाशों ने शहर का अमन-चैन छीन लिया है। इनके हाथ-पैर में दम नहीं, लेकिन ये किसी से कम नहीं का मुजाहिरा आए दिन इंदौर के किसी न किसी इलाके में कर गुजर रहे हैं।
8 साल के बालक के सामने उसके पिता की हत्या करने वालों की कद-काठी देखी? कसकर एक ‘चनकट’ में चक्करघिन्नी होकर जमीन सूंघ लें, ऐसी तो इनकी हालत। बस, नशा ही इनका दुस्साहस बढ़ा रहा है। हत्या करने वाले सबके सब नशे में ही तो नजर आ रहे हैं। लेकिन जो मौके पर होश में थे, वे होश में होकर भी बेहोश बने हुए थे।
तब भी, जब बदमाश एक बेबस बाप पर चाकू बरसा रहे थे और तब भी, जब वे हत्या कर चाकू लहराते हुए गलियों से निकल रहे थे। अगर मौजूद लोग ऐसी हर घटना पर एकजुट होकर अपने होश में होने का मुजाहिरा कर दें तो ये चवन्नीछाप गुंडे गुंडई कर पाएंगे?
डॉन बनने का शौक पालने वाले इन छपरियों से ही अब ये शहर आजिज होता जा रहा है। शहर के तमाम सघन बस्ती, आबादी इलाकों में ऐसे छपरियों की भरमार हो चली है। ये नाइट्रा, शराब, एमडी ड्रग्स आदि नशे के साथ शहर के लिए इतने खतरनाक हो चले हैं कि इन्हें पुलिस का वो खौफ भी नहीं डरा रहा, जिसमें रोज ऐसे गुंडों के हाथ-पैर तोड़ने के नजारे सामने आते हैं।
शहर के तमाम कुख्यात गुंडे-बदमाश, दादा-बहादुर से शहर के आम आदमी को सीधे कोई खतरा नहीं। ये सब तो ‘सूम’ यानी खामोशी को अख्तियार कर बैठे हैं, लेकिन इनकी सरपरस्ती में पल रहे या इनके जैसा बनने का शौक व सपना पाले बैठे छुटभैये गुंडों ने आम शहरी ही नहीं, पुलिस की भी नाक में दम कर रखा है।
इनमें बड़ी संख्या में नाबालिग भी हैं। अब ऐसे गुंडों का इलाज सिर्फ लाठियां नहीं कर पा रहीं। इनकी गुंडई अब गोली मांग रही है। सीने पर नहीं तो पैर-पुट्ठों पर ही। पर अब गोली ही इन नशेड़ी गुंडों का इलाज हो, ताकि कोई मासूम अपने पिता की निर्मम हत्या का दृश्य देख-देख बड़ा न हो और न बड़ा होकर हाथ में चाकू ले।
क्या बीती होगी उस मासूम पर, जिसकी आंखों के सामने उसके पिता की चाकू घोंपकर निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी गई? उस मासूम की आंखों के सामने से क्या वह दृश्य ताजिंदगी ओझल हो पाएगा, जिसमें उसका बेकसूर पिता जान बचाने के लिए बदहवास भाग रहा है और गुंडे उसे दौड़ा-दौड़ाकर चाकू मार रहे हैं?
8 साल के मासूम के मन से वह टीस कभी खत्म होगी, जो सैकड़ों लोगों की मौजूदगी के बावजूद कोई भी उसके बेबस पिता को बचाने आगे नहीं आने पर उसके अंतस में गहरे समा गई? इतने लोगों में से कोई एक भी अगर साहस कर लेता तो उन ‘छटांकभर’ के बदमाशों से उसके पिता की जान बच जाती और वह अनाथ न होता।
आखिर वह बड़ा होकर अब क्या करेगा, क्या बनेगा? पिता की हत्या का बदला लेने का भाव अगर उसके बालमन में अभी से समा गया तो..? तो इसी समाज को एक नया चाकूबाज नहीं मिलेगा, जो जान बचाने की भीख मांगते एक निर्दोष व निरीह व्यक्ति की जान नहीं बचा पाया? एक जागरूक समाज की नपुंसकता-कायरता व सिस्टम की नाकामियां ही तो समाज में एक नया असामाजिक तत्व खड़ा करती हैं। है न..?
थानेवार चिह्नित, निगरानी में क्यों नहीं होते ऐसे छपरी
आखिर इन छटांकभर के छपरियों पर पुलिस का सख्त पहरा क्यों नहीं हो रहा? थानावार इन्हें चिह्नित कर निगरानी में क्यों नहीं रखा जा रहा? इन्हें नाबालिग मानकर बख्शा क्यों जा रहा है? जब ये छुटभैये ही आए दिन पुलिस कमिश्नरी सिस्टम पर सवाल खड़ा कर रहे हैं तो इनका स्थायी इलाज करने में वही घिसे-पिटे, काल-कवलित हो गए नुस्खे क्यों आजमाए जा रहे हैं?
हर थाने को मालूम है कि ये किस इलाके में हैं और कौन हैं। फिर भी इन्हें सिर्फ इसलिए छोड़ देना कि नाबालिग हैं, पुलिस का ये रवैया इनका दुस्साहस नहीं बढ़ा रहा? आखिर ये बालिग होकर भी तो गुंडे ही बनने का सपना लिए हुए हैं। तभी तो कभी पथराव कर रहे, कभी वाहनों में आगजनी कर रहे हैं।
सामूहिक हमला-लूट करने और हत्याएं करने से भी नहीं डर रहे। तो फिर इनका इलाजा अभी इसी नाबालिग दौर में क्यों नहीं किया जा रहा? बालिग होकर गुंडा बनने का वक्त आखिर दिया ही क्यों जाए? सिर्फ हाथ-पैर नहीं, इनकी कमर भी तोड़िए। याद है न, मासूम बालक के पिता की हत्या करने वाले 6 गुंडों में 3 नाबालिग थे। ये न भूलना चाहिए..!
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