मृत व्यक्ति को ही बना दिया विक्रेता: जमीन घोटाले के बड़े खेल का खुलासा; रजिस्ट्रार कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
ई-रजिस्ट्री व्यवस्था की खामियों को लेकर वर्षों से उठ रही आशंकाएं अब हकीकत में बदलती दिखाई दे रही हैं। शहर के महालक्ष्मी नगर क्षेत्र के खुलासे ने एक कथित जमीन घोटाले ने नगर निगम, पंजीयन विभाग और प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आरोप है कि फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर पहले नगर निगम में संपत्ति कर का खाता खुलवाया गया और फिर उसी खाते को आधार बनाकर करोड़ों की संपत्ति की रजिस्ट्री तक कर दी गई।
मामला पिपल्या कुमार गांव स्थित महालक्ष्मी नगर कॉलोनी का है, जहां सभी भूखंड विधिवत पंजीकृत दस्तावेजों के आधार पर दर्ज हैं। जानकारी के अनुसार, बृजेंद्रनाथ पांडेय ने वर्ष 2006 में पंजीकृत विक्रय पत्र के माध्यम से भूखंड खरीदा था। बाद में उन्होंने अपनी पुत्री सत्यवती मिश्रा के पक्ष में पंजीकृत वसीयत की। पांडेय का निधन वर्ष 2010 में हो चुका है।
आरोप है कि इसके बावजूद मृतक पांडेय को विक्रेता दर्शाते हुए एक कथित फर्जी दस्तावेज तैयार किया गया। यह दस्तावेज न तो विधिवत पंजीकृत था और न ही उसमें किसी वैध रजिस्ट्री का उल्लेख था। इसके बावजूद इसे नगर निगम में प्रस्तुत कर संपत्ति कर का खाता खुलवा लिया गया।
कूटरचित दस्तावेजों की जांच किए बिना संपत्ति कर खाता खुलवाया- स्वीकृत जानकारी के अनुसार 25 मई 2010 को नगर निगम के जोन क्रमांक-8 में तत्कालीन राजस्व विभाग के मस्टर कर्मचारी अमन दुबे के माध्यम से कथित रूप से यह खाता खोला गया।
आरोप है कि कूटरचित दस्तावेजों की जांच किए बिना संपत्ति कर खाता स्वीकृत कर दिया गया। सवाल यह है कि जब कॉलोनी की सभी संपत्तियां पंजीकृत दस्तावेजों के आधार पर दर्ज हैं, तो बिना वैध रजिस्ट्री के खाता कैसे खोल दिया गया?
उप पंजीयक कार्यालय ने दस्तावेजों का सत्यापन नहीं किया
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि निगम के इसी खाते को आधार बनाकर प्रकाशिनी मिश्रा द्वारा 15 अप्रैल 2026 को उप-पंजीयक कार्यालय क्रमांक-3 में सिमरन महेंद्र पाल के पक्ष में संपत्ति की रजिस्ट्री कर दी।
बताया जाता है इस सौदे में 39 लाख रुपये से अधिक राशि चेक से अदा की गई। आरोप है कि उप-पंजीयक कार्यालय ने भी मूल दस्तावेजों और पूर्व रजिस्ट्री का सत्यापन नहीं किया तथा केवल नगर निगम के खाते को पर्याप्त मानते हुए रजिस्ट्री संपन्न कर दी।
नामांतरण के दौरान खुली पोल, फर्जीवाड़ा आया सामने- रजिस्ट्री के बाद नामांतरण प्रक्रिया शुरू हुई, इसी दौरान सत्यवती मिश्रा ने मूल रजिस्ट्री, पंजीकृत वसीयत और मृतक का मृत्यु प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर दिया। दस्तावेजों की जांच में अनियमितताएं सामने आने से प्रकाशिनी मिश्रा का संपत्ति कर खाता सीज कर दिया गया।
आयुक्त और पंजीयन विभाग की निष्क्रियता पर सवाल
पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। दस्तावेज फर्जी थे तो निगम ने उनके आधार पर खाता कैसे खोल दिया? मृत व्यक्ति को विक्रेता दिखाया था तो जांच क्यों नहीं हुई? यदि कॉलोनी की पूर्व रजिस्ट्री थी तो उप-पंजीयक कार्यालय ने सत्यापन क्यों नहीं किया? जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते मूल दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जाते तो करोड़ों की संपत्ति का स्वामित्व फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बदल जाता। मामले में निगम आयुक्त ने संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ केस दर्ज कराने तथा पंजीयन विभाग द्वारा जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है।
ई-रजिस्ट्री की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न
यह मामला केवल एक भूखंड तक सीमित नहीं, बल्कि ई-रजिस्ट्री और संपदा प्रणाली की सुरक्षा एवं सत्यापन प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दस्तावेजों का मूल सत्यापन अनिवार्य नहीं किया तो भविष्य में ऐसे फर्जीवाड़े और बड़े स्तर पर सामने आ सकते हैं। सवाल यह है फर्जी दस्तावेज से खाता किसने खुलवाया, रजिस्ट्री किसने मंजूर की और इस पूरे खेल का जिम्मेदार कौन है?
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