जिस नतीजे पर परीक्षार्थियों को ही भरोसा न हो, उसका क्या औचित्य है?
KHULASA FIRST
संवाददाता

अजय बोकिल स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट।
देश में मेडिकल में प्रवेश के लिए ‘नीट’ परीक्षा में पेपर लीक का विवाद थमा भी नहीं था कि अब सीबीएसई की नई आॅन स्क्रीन मार्किंग (अोएसम) प्रणाली संदेह के घेरे में आ गई है।
िजस भारी संख्या में असंतुष्ट परीक्षार्थी पुनर्मूल्यांकन, स्कैन काॅपी और मार्क्स वेरीफिकेशन की मांग कर रहे हैं, उससे तो इस परीक्षा की प्रामाणिकता पर ही प्रश्न चिन्ह लग रहा है।
परीक्षार्थियों के अलावा उनके अभिभावक भी परेशान हैं। नतीजों में गड़बड़ी का यह सबसे बड़ा घोटाला होता दिख रहा है। क्योंकि सीबीएसई की 12 वीं बोर्ड परीक्षा में देश भर के 17 लाख 68 हजार परीक्षार्थी बैठे थे।
इनमें से 4 लाख से ज्यादा परीक्षार्थियों ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की जांच और मार्किंग पर संदेह जताते हुए पुनर्मूल्यांकन और स्कैन काॅपी की मांग की है।
हालांकि रिवेल्युएशन के आवेदन आना कोई नई बात नहीं है, लेकिन उनकी संख्या तुलनात्मक रूप से काफी कम होती है।
इस बार तो उत्तर पुस्तिकाअों की मार्किंग में गड़बड़ी और गलत काॅपी स्कैनिंग ने लाखों बच्चों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है।
जिनके मार्क्स अपेक्षा से बहुत कम आए हैं, वो सबसे ज्यादा परेशान हैं। शिकायतों का आलम यह है िक सीबीएसई का पोर्टल बार-बार क्रैश हो रहा है।
शिकायतकर्ता परीक्षार्थियों का कहना है कि कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग (अोएसएम) के कारण उनके नंबर अपेक्षा से बहुत कम आए हैं। दरअसल अोएसएम एक डिजिटल इवैल्यूएशन प्रोसेस है। इसमें कॉपी को स्कैन करके कंप्यूटर स्क्रीन पर चेक किया जाता है।
सबसे पहले आंसर शीट को हाई-स्पीड स्कैनर से स्कैन किया जाता है फिर डिजिटल फॉर्मेट यानी पीडीएफ अथवा इमेज में बदला जाता है। स्कैन्ड काॅपियों को सिक्योर सॉफ्टवेयर पर अपलोड किया जाता है।
कॉपी चेक करने वाले टीचर लैपटॉप या टैबलेट पर लॉगिन करके स्क्रीन पर ही आंसर देखते हैं और डिजिटल पेन या माउस से मार्क्स देते हैं। सिस्टम खुद ही मार्क्स जोड़ता है और दावा है कि इसमें टोटलिंग एरर नहीं होता।
बताया जाता है कि आॅन लाइन काॅपी जांचने वाले कई शिक्षकों ने स्कैन की गई आंसर शीट्स के ब्लर (अस्पष्ट) होने और तकनीकी समस्याओं को लेकर शिकायते की थीं। लगता है कि ब्लर काॅपियों को पढ़े बिना ही अंदाज से नंबर दे दिए गए।
नुकसान मेधावी विद्यार्थियों का हो गया। परीक्षार्थियों ने बड़े पैमाने पर भुगतान संबंधी दिक्कतों, धुंधली स्कैन कॉपियों, गायब पन्नों और यहां तक कि गलत उत्तर पुस्तिकाएं अपलोड होने जैसी समस्याओं की शिकायत की है।
हालांकि सीबीएसई का दावा है कि ओएसएम तकनीक पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी है। लेकिन जिस बड़े पैमाने पर इसमें गड़बड़ियां सामने आ रही हैं, उससे कुछ गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
पहला तो यह कि जब काॅपी की डिजीटल चेकिंग की व्यवस्था की विश्वसनीयता पूरी तरह से प्रमाणित नहीं हो जाती, तब इसे इतनी जल्दबाजी में लागू करने का मकसद क्या था?
शिक्षा व्यवस्था का आधुनिकीकरण हो, इसमें दो राय नहीं, लेकिन नई व्यवस्था लागू करने के पहले उसकी प्रामाणिकता की पुष्टि कर लेने की जिम्मेदारी किसकी है?
और यह व्यवस्था सीधे 12 बोर्ड में लागू करने का तुगलकी िनर्णय लेने का क्या मतलब है? यह सिस्टम भी परीक्षा के एक महीने पहले ही लागू किया गया। समझदारी तो इसी में थी कि पहले इसे पायलेट प्रोजेक्ट के तौर पर किसी एक झोन में बिना बोर्ड परीक्षा वाली किसी क्लास की लोकल परीक्षा में लागू कर इसकी खामियों को समझकर उन्हें दूर किया जाता और फिर धीरे-धीरे उसे समूची बोर्ड परीक्षा में लागू किया जाता।
हैरानी की बात तो यह है कि वेदांत श्रीवास्तव जैसे 12 वीं के परीक्षार्थी ने अपनी स्कैन काॅपी ही गलत बताई और सीबीएसई ने अपनी गलती मान ली तो भी उसे सोशल मीडिया में ‘पाकिस्तानी’ कह कर ट्रोल किया गया।
इस मामले ने राजनीतिक तूल भी पकड़ लिया। राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं ने आरोप लगाया है कि इस सिस्टम में गड़बड़ी की वजह से 12 बोर्ड की उत्तीर्ण दर में 3.19% की गिरावट आई है।
गौरतलब है कि स्कूली शिक्षा में 12 की बोर्ड परीक्षाएं बच्चों के भविष्य की दिशा और नींव तैयार करती हैं। अगर उसी में भारी धांधली हो और उस धांधली का घुमा-फिराकर बचाव किया जाए तो लोग किस पर भरोसा करें?
भारत में अभी तक हाथ से लिखी उत्तर पुस्तिकाएं परीक्षकों द्वारा मैनुअली जांचने की ही परंपरा रही है। खामियां उसमें भी रही हैं, फिर भी तुलनात्मक रूप से यह व्यवस्था सर्वमान्य रही है, क्योंकि उसमें मनुष्य का विवेक केन्द्र में रहता है।
सीबीएसई ने उत्तर पुस्तिकाअों की तेजी से, ज्यादा तकनीकी और कथित रूप से पारदर्शी तरीके से कराने के नाम पर जो कुछ किया है, उससे तो पूरे सिस्टम की प्रामाणिकता और निष्पक्षता पर ही सवालों के घेरे में है।
शिक्षा प्रणाली में बदलते जमाने के हिसाब से आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल हो, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। आज दुनिया के सौ देशों में डिजीटल वेल्युएशन सिस्टम लागू है।
लेकिन उसे लागू करते समय पूरी सावधानियां बरती जाती हैं और उसे फुलप्रूफ बनाया जाता है। लेकिन लगता है कि सीबीएसई ने इसे तुगलकी अंदाज में और वो भी सीधे और 12 बोर्ड जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण परीक्षा में लागू कर दिया।
जबकि केन्द्रीय विद्यालयों के शिक्षकसंघों ने पहले ही आगाह कर दिया था कि नए सिस्टम को लेकर शिक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। नई व्यवस्था को हडबड़ी में लागू करने का नतीजा है कि इस बार सीबीएसई की 98 लाख 60 हजार उत्तर पुस्तिकाओं में से 11 लाख 31 हजार काॅपियों के मार्क्स वेरिफिकेशन के आवेदन आ चुके हैं।
यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। जिस नतीजे पर परीक्षार्थी को ही भरोसा नहीं है, उसका क्या औचित्य है? सीबीएसई नतीजों पर मचे देशव्यापी बवाल के बाद केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने इसे गंभीरता से लेते हुए अोएमएस सिस्टम की प्रामाणिकता की जांच आईआईटी मद्रास और कानपुर के विशेषज्ञों से कराने की घोषणा की है, व्यवस्था को सुधारने, तेज और पारदर्शी बनाने के नाम पर सीबीएसई ने लाखों बच्चों के भविष्य के साथ जो खिलवाड़ किया है, उसका जिम्मेदार कौन है? (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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