सुख-दुःख के प्रकटीकरण के लिए क्या: राजवाड़ा प्रतिबंधित; इंदौर में है कोई राष्ट्रवादी नेता, जो राष्ट्र की जीत के उत्सव पर पुलिसिया रवैये को रोके-टोके
KHULASA FIRST
संवाददाता
क्रिकेट में भारत की जीत के जश्न में राजवाड़ा पर कल फिर वही हुआ, जिससे इंदौरी दुःखी हो गए
जिला व पुलिस प्रशासन स्पष्ट करे कि अब राजवाड़ा पर किसी भी तरह का उत्सव, जश्न, भीड़ पर रोक लगा दी गई है
परिवार सहित उत्सव मनाने राजवाड़ा आने वाले पुलिस के हाथों हर बार हो रहे दुर्व्यवहार का शिकार
पुलिस सायरन का शोर व खाकी का जोर तिरंगे को लहराने ही नहीं दे रहा, जनप्रतिनिधियों की खामोशी शर्मनाक
जनता चौक राजवाड़ा पर हर बार पुलिसिया रवैया ऐसा जैसे पाकिस्तान की पुलिस के सामने भारत के लोग हों
मुट्ठीभर लोग जमा भी नहीं हुए कि तीन-तीन वाहन सायरन बजाने लगे, वज्र वाहन के साथ पुलिसिया सीटी से भगा दिए गए देशप्रेमी
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रदेश में तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार है न? इंदौर में भी ‘9 के 9’ राष्ट्रवादी चुने हुए नेता हैं न? सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की माला जपने वाले संगठनों व नेताओं की भरमार है न? सब सवालों का जवाब अगर हां है तो क्या इस इंदौर में नेता कोई राष्ट्रवादी नेता नहीं, जो राष्ट्र की जीत पर राजवाड़ा पर होने वाले उत्सव में खीकी के जोर पर लगाम नहीं तो कम से कम सवाल-जवाब कर सके? है कोई नेता...?
जो ये कमिश्नरी सिस्टम वाली पुलिस व जिला कलेक्टर से ये पूछ सके कि हाथ में तिंरगा लेकर क्रिकेट की जीत के उल्लास-उत्साह-उमंग व जोश से आखिर क्या दिक्कत है? उत्सवप्रेमी इंदौरी के साथ ऐसा गुरुवार रात ही नहीं, बीते कुछ सालों से निरंतर जनता चौक राजबाड़ा पर हो रहा है, जैसे हिंदुस्तानी पुलिस के समक्ष जीत का जश्न मनाने पाकिस्तानी आ धमके हों।
जनता जनप्रतिनिधियों व अफसरों से जानना चाहती है कि क्या राजवाड़ा अब इस तरह के जश्न के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है? वक्त मिले तो ‘राष्ट्रवादी’ राष्ट्रहित, जनता हित में, जनता को इतना जवाब तो दें कि क्या अब जनता चौक में जुटना संगीन जुर्म है?
क्या जनता चौक कहे जाने वाले राजवाड़ा पर अब किसी भी तरह के जुलूस, जलसों, उत्सव, जश्न व भीड़ जमा होने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है? अगर राजवाड़ा जीत के उल्लास के प्रकटीकरण के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है तो इसकी विधिवत सूचना शहरवासियों को क्यों नहीं दी जा रही।
ताकि वह गम या खुशी के मौके पर राजवाड़ा पर जुटने की अपनी पुरखों के समय की रिवायत पर लगाम लगा सकें और अगर राजवाड़ा पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है तो पुलिस शहरवासियों को बताए कि आखिरकार वो मां अहिल्या के आंगन में इंदौरियों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों और किसके कहने पर कर रही है।
आखिर क्या कारण है कि अब राजवाड़ा पर क्रिकेट में भारत की जीत का जश्न इंदौर के उत्सवप्रिय बाशिंदे मना नहीं सकते? आखिर जिला व पुलिस प्रशासन आप तो कहें कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि हाथ में तिरंगा लेकर राजवाड़ा पर जुटने वाले लोगों के साथ खाकी का व्यवहार ऐसा जैसे पाकिस्तान की पुलिस के सामने हिंदुस्तानी आ गए?
कभी घंटों इंदौरी राजवाड़ा पर अपने गम-खुशी का इजहार किया करते थे। ये इस शहर के डीएनए में है कि वह जब बहुत ज्यादा खुश होता है तो राजवाड़ा आ जाता है या फिर गमजदा है तो भी राजवाड़े पर आकर खड़ा हो जाता है। ये कोई आजकल का चलन या शगल नहीं कि इंदौर के बाशिंदे तिरंगा हाथ में लिए क्रिकेट की जीत का उत्सव मनाने राजवाड़ा पर जुटने लगे हैं।
ये तो शहर की परंपरा से जुड़ा नाता है, तभी तो लोग बाल-बच्चों, परिवार सहित भी राजवाड़े तक खिंचे चले आते हैं। यशवंत रोड, खजूरी बाजार, कृष्णपुरा, इमली बाजार, तिलक पथ आदि दूर जगह वाहन पार्क कर पैदल लोग परिवार सहित राजवाड़ा आते हैं। इस उत्साह से आते हैं लोग कि जो मन की खुशी है उसे अपने इंदौरी भाइयों के साथ बांटकर दिन दूना, रात चौगुना कर लें।
उत्साह को दूना करने के लिए चौक पर पहुंचते ही औसत इंदौरी को क्या मिलता है? बैरिकेडिंग से घिरा हुआ अहिल्या का आंगन। सायरन बजाती हुई अहिल्या प्रतिमा का चक्कर लगाती पुलिस की गाड़ियां। वह भी इतनी सी जगह में एक दो नहीं, तीन चार। सायरन का शोर भी ऐसा जैसे कोई उपदेश हो गया हो, साथ ही सीटियां गुंजाती खाकी वर्दियां, दंगा रोधी वज्र वाहन।
उत्सव मनाते लोगों को धकियाते, लतियाते एक-दो-तीन सितारे बदन पर टांगें पुलिसकर्मियों की फौज। इन सबके बीच ‘चाय से गरम केटलियों’ की तर्ज पर नगर सुरक्षा समिति के सदस्यों की फौज। परिवार सहित जश्न मनाने आने वाला आम इंदौरी ये समझ ही नहीं पाता कि आखिर माजरा क्या है? वह सोचता है कि क्या कोई आसपास गड़बड़ हो गई है, जो पुलिस खड़े भी नहीं रहने दे रही और भगा रही है।
तेहरान से गमजदा व गुस्से से भरा हुजूम राजवाड़ा आ रहा था... राजवाड़ा पर हर बार पुलिस का रुख ऐसा रहता है जैसे शहर में कोई लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति निर्मित हो गई हो। लॉ एंड ऑर्डर के दौरान भी ऐसे हालात निर्मित नहीं किए जाते, जैसे इन दिनों कमिश्नरी सिस्टम वाली इंदौर पुलिस राजवाड़ा पर हर बार क्रिकेट की जीत के बाद कर रही है।
कल यानी गुरुवार को भी यही हुआ। वक्त से पहले ही राजवाड़ा के चारों तरफ से ऐसी नाकाबंदी कर दी जैसे तेहरान से कोई गुस्सा व गमजदा लोगों का हूजूम राजवाड़ा पर आने वाला हो। यशवंत रोड की तरफ से आने वालों के लिए राजवाड़ा मुख्य द्वार तक आने के रास्ते रोक दिए गए।
ऐसी ही बैरिकेडिंग गोपाल मंदिर वाले हिस्से में कर दी। खजूरी बाजार की तरफ से आने वालों के लिए दंगारोधी वज्र वाहनों की तैनाती। पुलिस चौकी के सामने बैरिकेडिंग व बगीचे के अंदर नाकाबंदी। ऐसे तगड़े बंदोबस्त तो किसी गंभीर मुद्दे पर प्रतिपक्ष या जनता द्वारा विधानसभा घेराव के वक्त राजधानी भोपाल में भी नहीं होते।
किसके आदेश हैं इंदौरियों को यूं अपमानित करने के... बीते कुछ सालों से लोग हतप्रभ होकर पुलिस के इस रवैये को देखते हैं। आखिर इंदौरी किससे पूछे कि उसने तिरंगा लेकर राजवाड़ा पर आने में ऐसा क्या गुनाह कर दिया जो उसके साथ पुलिस का रवैया अपमानजनक हो रहा है।
जबकि भीड़ पूरी तरह अनुशासित व देशभक्ति के जोश में ही डूबी रहती है। परिवार के परिवार खड़े रहते हैं। माता-बहनें, बुजुर्ग-बच्चे भी भीड़ का हिस्सा होते हैं, लेकिन सबके सब ऐसे धकियाए व लतियाए जाते हैं जैसे पाकिस्तान के सिंध या बलूचिस्तान प्रांत में कोई इंदौरी जश्न मनाने पहुंच गया हो।
शहर की जनता आखिर ये जानना चाहती है कि पुलिस हर बार जीत के जश्न में जोर क्यों दिखा रही है। घंटा-आधा घंटा भी भारत माता की जय-जयकार सहन नहीं कर पा रही। तिरंगे लहराते देखना नही चाहती? आखिर हुआ क्या है? क्या कोई अगल-बगल में दंगा हो गया, जो उत्सव मनाने आने वालों को राजवाड़ा पर रुकना तो दूर, खड़े भी रहने भी नहीं दिया जा रहा।
इंदौर की जनता को इंदौर के कलेक्टर व इंदौर पुलिस कमिश्नर कम से कम जवाब तो दें कि ऐसा क्यों हो रहा है? जनता सीधे आपसे जवाब ही इसलिए मांग रही है कि जिन जनप्रतिनिधियों को उन्होंने चुना था वे गूंगे-बहरे-अंधे बनकर बैठे हुए हैं।
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