परंपराओ के रक्षक: ‘तीर्थ पुरोहित’- शून्य से नीचे के तापमान में धड़कती आस्था और सदियों पुरानी
KHULASA FIRST
संवाददाता

बाबा केदार के गर्भगृह की पौराणिक पूजा-पद्धति को जिंदा रखने वाले पंडा समाज की अनकही कहानी
कपाट खुलने से लेकर बर्फबारी के बीच कपाट बंद होने तक होता है इनका जीवन
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
ज ब भी कोई श्रद्धालु गौरीकुंड से 16 किलोमीटर की खड़ी और थका देने वाली चढ़ाई पार कर केदारनाथ धाम पहुंचता है, तो मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते ही उसे एक असीम शांति और अलौकिक ऊर्जा का अहसास होता है।
गर्भगृह के भीतर गूंजते मंत्र, त्रिकोणीय स्वयंभू ज्योतिर्लिंग का दिव्य श्रृंगार और सुव्यवस्थित पूजा-विधान इस धाम की रीढ़ हैं, लेकिन इस पूरी व्यवस्था, शुद्धता और सदियों पुरानी परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने कंधों पर संभालने वाले नायक पर्दे के पीछे ही रह जाते हैं।
ये नायक हैं केदारनाथ के तीर्थ पुरोहित (पंडा समाज)। केदारघाटी के मूल प्रहरियों की जिंदगी, उनके कड़े संघर्ष और अटूट निष्ठा पर आधारित है, जो हाड़ कंपाने वाली ठंड और आपदाओं के बीच भी बाबा केदार की सेवा में अडिग खड़े रहते हैं।
गर्भगृह का आध्यात्मिक विज्ञान और पुरोहितों की भूमिका... केदारनाथ मंदिर में पूजा का विधान बेहद कड़ा और प्राचीन है। यहां आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित नियमों के अनुसार ही आज भी पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर के मुख्य रावल (प्रधान पुजारी) के साथ मिलकर तीर्थ पुरोहित सदियों से चली आ रही परंपराओं का निर्वहन करते हैं।
भोर के चार बजे जब पूरा केदारनाथ धाम घने कोहरे और बर्फ की ठंडी चादर में लिपटा होता है, तब तीर्थ पुरोहित अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी नदी के बर्फीले पानी में स्नान कर बाबा के अभिषेक की तैयारी में जुट जाते हैं।
गर्भगृह में भगवान को चढ़ने वाले भस्म, बेलपत्र, ब्रह्मकमल और स्थानीय जड़ी-बूटियों से बने विशेष लेप को तैयार करने की जिम्मेदारी इन्हीं पुरोहितों की होती है। इनके बिना केदारनाथ की पूजा पद्धति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक कठिन आध्यात्मिक व्रत है जिसका पालन ये बचपन से करते आ रहे हैं।
भीषण बर्फबारी और शून्य से नीचे का तापमान- जहां थम जाती है जिंदगी, वहां धड़कती है आस्था.. केदारनाथ धाम समुद्र तल से लगभग 11,755 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां का मौसम पल भर में बदल जाता है।
यात्रा सीजन के दौरान भी कई बार तापमान शून्य के पास पहुंच जाता है, लेकिन तीर्थ पुरोहितों के कदम कभी डगमगाते नहीं हैं। मई से अक्टूबर के बीच जब यात्रा अपने चरम पर होती है, तब पुरोहितों की दिनचर्या बेहद कठिन हो जाती है।
देश के कोने-कोने से आने वाले लाखों जजमानों (यात्रियों) को संभालना, उनके रहने-खाने की व्यवस्था करना और उन्हें बाबा के सुगम दर्शन कराना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। कई बार पुरोहित खुद भूखे-प्यासे रहकर यात्रियों की सेवा में लगे रहते हैं।
रहने के नाम पर मंदिर के पीछे बनी छोटी-छोटी कुटिया या टेंट ही उनका आशियाना होते हैं, जहां रात को हाड़ कंपा देने वाली हवाएं चलती हैं, लेकिन उनका मानना है कि जब तक वे केदारनाथ की धरती पर हैं, बाबा खुद उन्हें हर संकट से बचाते हैं।
जब बंद होते हैं कपाट- कैसे बदलती है हिमालय के प्रहरियों की दुनिया?... भाई दूज के पावन पर्व पर जब शीतकाल के लिए केदारनाथ मंदिर के कपाट भारी बर्फबारी के बीच बंद कर दिए जाते हैं, तो केदारनाथ पूरी तरह से जनशून्य हो जाता है।
इंसान तो क्या, परिंदे भी इस घाटी को छोड़ देते हैं। ऐसे में इन तीर्थ पुरोहितों के जीवन में एक बड़ा बदलाव आता है। कपाट बंद होने के बाद बाबा केदार की पंचमुखी चल विग्रह डोली को लेकर तीर्थ पुरोहित पैदल ही नीचे ऊखीमठ के लिए रवाना होते हैं।
इस यात्रा के दौरान रास्ते भर के गांवों में उत्सव का माहौल होता है। सर्दियों के छह महीने बाबा केदार की पूजा ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में होती है। पुरोहित समाज भी अपने परिवारों के साथ नीचे के गांवों में आ जाता है।
इन छह महीनों में पुरोहितों की दिनचर्या पूरी तरह बदल जाती है। हिमालय की ऊंचाइयों की भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर, वे नीचे के गांवों में आकर अपने बच्चों की शिक्षा, खेती-बाड़ी और अपने प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन में समय बिताते हैं।
युवा पुरोहित इस दौरान आने वाले साल की यात्रा की रणनीतियां बनाते हैं और अपने यजमानों से संपर्क साधते हैं। यह समय उनके लिए शारीरिक रूप से आराम का होता है, लेकिन मानसिक रूप से उनका ध्यान हमेशा केदारघाटी की चोटियों पर ही लगा रहता है।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती निष्ठा और संघर्ष... केदारनाथ के पंडा समाज की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इनकी नई पीढ़ी, जो आज के दौर में उच्च शिक्षित है, डॉक्टर, इंजीनियर और मैनेजमेंट की पढ़ाई कर चुकी है, वह भी अपनी इस सनातनी परंपरा को छोड़ने के बजाय गर्व से इसे अपना रही है।
यात्रा सीजन शुरू होते ही ये युवा आधुनिक लिबास छोड़कर पारंपरिक धोती-कुर्ता और तिलक धारण कर बाबा के दरबार में सेवा के लिए पहुंच जाते हैं।
2013 की भीषण केदारनाथ आपदा को इस समाज ने बहुत करीब से देखा है। कई पुरोहितों के घर बह गए, अपनों को खो दिया, लेकिन आपदा के ठीक बाद जब सरकार और प्रशासन भी ऊपर जाने से कतरा रहे थे, तब यही पुरोहित समाज सबसे पहले बाबा के धाम पहुंचा था ताकि मंदिर की सफाई और पूजा फिर से शुरू की जा सके।
आस्था की अनूठी मिसाल... केदारनाथ के तीर्थ पुरोहित महज पूजा कराने वाले पंडित नहीं हैं। वे हिमालय की गोद में बसी उस आदि-संस्कृति के जीवित दस्तावेज हैं जो हजारों साल के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
जब तक केदारनाथ की चोटियों पर बर्फ गिरती रहेगी और जब तक मंदाकिनी की धारा बहती रहेगी, तब तक परंपराओं के ये रक्षक बिना थके, बिना रुके बाबा केदार के चरणों में अपनी निष्ठा का पत्र सौंपते रहेंगे।
अगली बार जब आप केदारनाथ की चौखट पर माथा टेकें, तो गर्भगृह के उस दिव्य वातावरण को बनाए रखने वाले इन पुरोहितों के संघर्ष और उनकी तपस्या को मन ही मन प्रणाम करना न भूलें।
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