वीडियो देखिये, विश्व प्रसिद्ध मंदिर से हुआ दीपोत्सव का आगाज: नंदी हॉल में एक घंटे तक चला पूजन; कलेक्टर-एसपी सहित प्रशासनिक अधिकारी हुए शामिल
KHULASA FIRST
संवाददाता
खुलासा फर्स्ट, उज्जैन।
धर्मनगरी उज्जैन में धनतेरस के साथ ही पांच दिवसीय दीपोत्सव का शुभारंभ हो गया। विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में शुक्रवार को धनतेरस के अवसर पर भगवान धन्वंतरि, बाबा महाकाल और धन के देवता भगवान कुबेर की विशेष पूजा-अर्चना की गई। मंदिर की परंपरा के अनुसार पुजारी-पुरोहितों ने नंदी हॉल में विधि-विधान से महापूजा संपन्न कराई।
इस दौरान भगवान गणेश, माता महालक्ष्मी और भगवान महाकाल का पूजन-अभिषेक किया गया। वैभव, आरोग्य, सुख-समृद्धि और विश्व कल्याण की कामना के साथ हुए इस धार्मिक अनुष्ठान में संभागायुक्त, कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और मंदिर प्रशासक सहित प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे।
धनतेरस पर महाकाल मंदिर में सुबह से ही धार्मिक उल्लास का वातावरण रहा। पुजारी-पुरोहितों ने परंपरागत तरीके से पूजन की शुरुआत की। सबसे पहले गणपति और महालक्ष्मी का पूजन किया गया।
इसके बाद बाबा महाकाल का पंचामृत अभिषेक और रुद्राभिषेक संपन्न हुआ। भगवान को चांदी का सिक्का अर्पित कर धन-धान्य और सुख-समृद्धि की मंगल कामना की गई। करीब एक घंटे तक चले इस विशेष पूजन में पुरोहित समिति के सदस्यों के साथ लगभग दो दर्जन पंडे-पुजारी शामिल हुए।
महाकाल मंदिर के नंदी हॉल में आयोजित विशेष पूजा में उज्जैन कलेक्टर रोशन सिंह, पुलिस अधीक्षक प्रदीप शर्मा सहित प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे। पुरोहित समिति के सदस्य लोकेश व्यास ने बताया कि धनतेरस पर होने वाली यह पूजा मंदिर की वार्षिक परंपरा का हिस्सा है। इसमें जनकल्याण और विश्व कल्याण की भावना से भगवान का अभिषेक और पूजन किया जाता है।
इस अवसर पर भगवान धन्वंतरि की आराधना भी की गई। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है। धनतेरस पर उनकी पूजा करने से निरोगी जीवन और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसी भावना के साथ महाकाल मंदिर में आरोग्य और सुख-समृद्धि के लिए विशेष अनुष्ठान किया गया।
धनतेरस के साथ शुरू हुए दीपोत्सव के दौरान महाकालेश्वर मंदिर में पांच दिनों तक विशेष सजावट और धार्मिक आयोजन होंगे। मंदिर परिसर को दीपों, फूलों, रंगोली और आकर्षक विद्युत रोशनी से सजाया जाएगा। मंदिर की परंपरा के अनुसार दीपोत्सव के पांचों दिनों में भगवान महाकाल की आरती के दौरान फुलझड़ी भी जलाई जाएगी।
इस बार तिथियों की घट-बढ़ के कारण दीपोत्सव के प्रमुख पर्वों के बीच एक-एक दिन का अंतर रहेगा। 6 नवंबर को धनतेरस, 8 नवंबर को दीपावली और 10 नवंबर को गोवर्धन पूजा मनाई जाएगी। महाकाल मंदिर में धार्मिक आयोजन और पूजन ग्वालियर पंचांग के अनुसार संपन्न किए जाते हैं।
दीपावली के अवसर पर बाबा महाकाल की आरती के दौरान विशेष परंपरा का निर्वहन किया जाएगा। मंदिर समिति के अनुसार प्रत्येक आरती में केवल एक फुलझड़ी जलाई जाएगी। यह क्रम सुबह होने वाली भस्म आरती, अभ्यंग स्नान के बाद की आरती, संध्या आरती और शयन आरती में रहेगा।
मंदिर प्रबंधन के अनुसार धार्मिक परंपराओं और मर्यादाओं का पालन करते हुए सभी आयोजन संपन्न किए जाएंगे। दीपों की रोशनी और फूलों की सजावट के बीच महाकाल का दरबार दीपोत्सव के पांचों दिनों में विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगा।
धनतेरस पर उज्जैन के सांदीपनि आश्रम स्थित कुंडेश्वर महादेव मंदिर में भी भगवान कुबेर का विशेष पूजन किया गया। यह मंदिर उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों में 40वें क्रम पर आता है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान कुबेर की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को गुरु दक्षिणा देने के लिए भगवान कुबेर धन की पोटली लेकर यहां पहुंचे थे और बाद में इसी स्थान पर विराजमान हो गए।
मंदिर के पुजारी शिवांश व्यास के अनुसार धनतेरस पर सुबह 7 बजे मंदिर के पट खोले गए। भगवान कुबेर का पंचामृत पूजन किया गया और उन्हें भोग अर्पित किया गया। आरती के बाद श्रद्धालुओं के लिए दर्शन की व्यवस्था शुरू की गई। मंदिर के पट रात 9 बजे तक खुले रहने की जानकारी दी गई।
कुंडेश्वर महादेव मंदिर की एक खास परंपरा धनतेरस के दिन निभाई जाती है। इस दिन भगवान कुबेर का विशेष रूप से आभूषणों से श्रृंगार किया जाता है। पुजारी शिवांश व्यास के अनुसार साल में एक बार धनतेरस पर होने वाले इस अनुष्ठान में श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान कुबेर की प्रतिमा की नाभि में इत्र लगाने से उन्हें राहत मिलती है और प्रसन्न होकर वे भक्तों को धन-धान्य तथा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। इसी मान्यता के चलते श्रद्धालु अपने साथ इत्र लेकर पहुंचते हैं और भगवान कुबेर की प्रतिमा की नाभि में इत्र अर्पित कर मनोकामना मांगते हैं।
कुंडेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित भगवान कुबेर की प्रतिमा करीब 1400 साल पुरानी मानी जाती है। प्रतिमा में भगवान कुबेर के एक हाथ में सोम पात्र और दूसरा हाथ वर मुद्रा में है। उनके कंधे पर धन की पोटली दिखाई देती है। तीखी नाक, उभरा हुआ पेट और आभूषणों से सजा स्वरूप इस प्राचीन प्रतिमा को विशिष्ट बनाता है।
गर्भगृह में भगवान कुबेर के अलावा बालाजी, वामन देव और भगवान नारायण की प्राचीन प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। धनतेरस पर यहां विशेष पूजा और श्रृंगार के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की आस्था देखने को मिलती है।
कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी से दीपोत्सव की धार्मिक परंपराएं शुरू होती हैं। इस दौरान यम के निमित्त दीपदान, गोसेवा, धनतेरस पर धातुओं और घरेलू उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी, भगवान धन्वंतरि का पूजन और नरक चतुर्दशी पर पितरों के निमित्त दीपदान जैसे धार्मिक विधान किए जाते हैं। इसके बाद दीपावली पर माता महालक्ष्मी की पूजा, गोवर्धन पूजा और भाई दूज के साथ दीपोत्सव का समापन होता है।
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