उस्ताद अमजद अली: ग्वालियर के होते हुए भी कुछ न दे सके अपने शहर को
Khulasa First
संवाददाता

राकेश अचल वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
यकीन मानिये कि मैं सरोद के जादूगर उस्ताद अमजद अली खान के सरोद वादन का ठीक वैसा ही मुरीद हूं जैसा कि पंडित रविशंकर के सितार और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का हूं, लेकिन ग्वालियर के प्रति उस्ताद अमजद अली खान ने अपनी जिम्मेदारी जिस ढंग से निभाई है, उस वजह से उस्ताद अमजद अली खान मुझे शोले फिल्म के गब्बर सिंह जैसे लगने लगे हैं।
अमजद अली खान ग्वालियर के बेटे हैं। मै उन्हें सपूत या कपूत नहीं लिख रहा। उनका जन्म ग्वालियर में उसी महीने में हुआ है, जिसमें उस्ताद लोग पैदा होते हैं। राजनी के उस्ताद पंडित अटल बिहारी बाजपेयी भी अक्टूबर की पैदाइश थे। अमजद अली 9 अक्टूबर 1945 को जन्मे। इस लिहाज से वे पूरे 80 साल के हो गए हैं।
अमजद अली ग्वालियर संगीत के ‹सेनिया बंगश› घराने की छठी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। उस्ताद अमजद अली खान को संगीत विरासत में ठीक वैसे ही मिला, जैसे राहुल गांधी को राजनीति मिली। अमजद अली के पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली खान ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नामकरण किया। उनका घराना अपने आपको तानसेन से जोड़कर चलता है।
बात ग्वालियर और उस्ताद अमजद अली के रिश्तों की है। मात्र बारह वर्ष की आयु में एकल सरोद-वादन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाले उस्ताद अमजद अली पिछले 68 साल में दुनियाभर में अपनी कला का प्रदर्शन कर सब कुछ हासिल कर चुके हैं, लेकिन उन्हें अपने शहर में भी गाने-बजाने के पैसे चाहिए होते हैं।
उस्ताद अमजद अली खान से मैंने पहला साक्षात्कार 1983 में करंट पत्रिका के लिए किया था। तभी से मैं उन्हें जानता हूं, यानी कोई 43 साल से। ग्वालियर में उनके पुश्तैनी घर को सरोदघर के लिए खाली कराने से लेकर नगर निगम से उसके संधारण तक का मैं साक्षी हूं, किंतु मुझे औरों की तरह तकलीफ भी है और शिकायत भी कि उस्ताद ने ग्वालियर से सब कुछ हासिल करने के बावजूद ग्वालियर को कुछ नहीं दिया। वे 9 साल बाद तानसेन समारोह में अपने बच्चों के साथ आए भी तो 16 लाख रुपए का मेहनताना वसूल करने के बाद।
उस्ताद अमजद अली खान को मप्र से हमेशा यही शिकायत रही कि मप्र की सरकार उनकी उपेक्षा करती है। यानी वे अपेक्षा और उपेक्षा से ऊपर उठ ही नहीं पाए। उस्ताद ने अपने सरोदघर के लिए केंद्र सरकार से भी इमदाद ली और मप्र सरकार से भी, किंतु बदले में ग्वालियर को दिया कुछ नहीं। कभी नियम से यहां सरोद की तालीम देने का वक्त उनके या उनके बच्चों के पास नहीं रहा।
मुझे अफसोस है ये लिखते हुए कि उस्ताद अमजद अली ने कभी भी तानसेन समारोह के लिए अपनी ओर से प्रस्तुति नहीं दी, उलटे एक बार अपने पिता उस्ताद हाफिज अली खान की स्मृति में एक समानांतर संगीत समारोह ग्वालियर में कर तानसेन समारोह को कमतर बनाने का पाप भी किया। सरकार को नीचा दिखाने के लिए उन्होंने उस वक्त असगरी बाई को एक लाख का पुरस्कार भी दिया, लेकिन ये एक बार का होकर रह गया। यह सिलसिला जारी नहीं रख पाए उस्ताद।
अमजद अली खान अब भी चाहते हैं कि उनके पिता की स्मृति में मप्र सरकार ही कोई आयोजन करे। वे न ग्वालियर के लिए कुछ करना चाहते हैं, न अपने पिता के लिए। तानसेन के लिए तो उनसे हो भी क्या सकता है? मेरा आरोप नहीं है, लेकिन मुझे भनक लगी है कि इस बार भी तानसेन समारोह का न्योता पाने के लिए उस्ताद ने मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से ऊपर से सिफारिश कराई थी। मुमकिन है ये अफवाह हो।
बहरहाल ग्वालियर के प्रति उस्ताद का समर्पण नगण्य है। उस्ताद से ग्वालियर भी निराश है और ग्वालियर वाले भी। कितना अच्छा होता कि उस्ताद अपने उत्तरार्ध में दिल्ली छोड़कर ग्वालियर में अपने सरोदघर को आबाद करते। उसे संगीत का तीर्थ बनाते। यहां से नए उस्ताद पैदा करते अपने बेटों जैसे, पर ये हो न सका।
ग्वालियर का दुर्भाग्य है कि ग्वालियर ने देश को राजनीति के शिखर पुरुष पंडित अटल बिहारी बाजपेयी दिए, किंतु वे भी उस्ताद अमजद अली की तरह दिल्ली के होकर रह गए।
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