यूनिपोल ने कर दिया नगर निगम के भ्रष्टाचार का खुलासा: मंत्री विजयवर्गीय की नसीहत का भी असर नहीं
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भ्रष्टाचार ने नगर निगम अधिकारियों की चमड़ी इतनी मोटी कर दी है कि हाईकोर्ट के आदेश, एमआईसी सदस्य राजेंद्र राठौर के आरोप और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के जांच कराने की बात के बावजूद टस से मस नहीं हो रहे हैं। मामला यूनिपोल (विज्ञापन बोर्ड) का है।
चंद पैसों की खातिर अधिकारियों ने जनसुरक्षा और यातायात व्यवस्था को ताक पर रखकर विज्ञापन एजेंसी को शहर में विज्ञापन लगाने का काम दे दिया है। भ्रष्टाचार की पोल खुल चुकी है, लेकिन अधिकारियों की एजेंसी के लिए उदारता इतनी है कि कार्रवाई को राजी नहीं हैं।
हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि नियम विरुद्ध जितने भी पोल डिवाइडर और फुटपाथ पर लगे हैं उनकी जांच कर हटाया जाए, लेकिन नगर निगम ने किसी भी पोल की तरफ झांका तक नहीं है। खुलासा फर्स्ट की पड़ताल में पता चला है कि सौ से ज्यादा यूनिपोल डिवाइडर पर लगे हैं।
अधिकारियों की नाक के नीचे तो इतना बड़ा खेल हो नहीं सकता कि नब्बे फीसद पोल ही उस जगह खड़े हो गए जहां के लिए मप्र आउटडोर मीडिया विज्ञापन नियम 2017 मना करता है। इसके नियम 28 में साफ लिखा है कि डिवाइडर, ट्रैफिक सिग्नल और महापुरुषों की प्रतिमा के पास नहीं लगा सकते।
2022 में नियम संशोधन में फुटपाथ के लिए छूट थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ को आर्टिकल-21 के तहर आम आदमी का अधिकार बताया है। यानी यहां भी नहीं लगा सकते, लेकिन आंख उठाकर देखो तो शहर में जितने भी यूनिपोल लगे हैं सब प्रतिबंधित जगहों पर हैं।
रिंग रोड के पोल लगा दिए एमजी रोड पर
डिवाइडर पर खड़े सौ से ज्यादा यूनिपोल के अलावा नगर निगम के भ्रष्टाचार की पोल एमजी रोड के पोल भी खोल रहे हैं। टेंडर में यह जगह किसी को मिली ही नहीं है, लेकिन एजेंसी मालिक दीपक जेठवानी की मनमानी ऐसी है कि उसने एमजी रोड, गांधी प्रतिमा के पास, अहिल्या माता प्रतिमा के नजदीक भी पोल खड़े कर दिए हैं।
ट्रैफिक सिग्नल के भी यही हाल हैं। रेडिसन चौराहे पर इतने यूनिपोल लगा दिए हैं कि उसका नाम होर्डिंग चौराहा कर देना चाहिए। यही नहीं, टेंडर में जितने पोल मिल थे उनके दो गुना लगा चुका है और अब भी नए ठिकाने ढूंढ रहा है। हद तो यह है कि शहर तो ठीक बायपास और गांव की तरफ भी बढ़ गया है।
जीएसआईटीएस के नाम का गलत इस्तेमाल
दीपक जेठवानी ने बता रखा है कि उसने पोल जीएसआईटीएस की इजाजत से लगाए हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। जीएसआईटीएस से उसने डिजाइन पास करवाई थी, वो भी आठ और लगाया उन पोल को है जो जीएसआईटीएस से पास नहीं हैं। दीपक ने स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट तीसरी कंपनी से बनवाया है।
इसके अलावा नगर निगम को जिस साइज का विज्ञापन बोर्ड बताया है उससे कहीं ज्यादा साइज के लगा चुका है। हर बोर्ड में इसने खेल कर रखा है। नगर निगम इनकी नपती करा ले तो उसके खजाने में जुर्माने के ही करोड़ों आ जाएं, लेकिन जब अधिकारी ही दीमक का काम रहे हैं तो निगम कंगाल होना ही है।
टेंडर में भी हेरफेर
सात जोन का टेंडर 2019 में निकला था। तब तीन साल के लिए टेंडर हुआ था, लेकिन कंपनी से मिलीभगत कर नगर निगम ने 2022 में करार किया और टेंडर को 2029 तक बढ़ा दिया। टेंडर को कैंसिल कर नया टेंडर निकालना था, लेकिन पुराने रेट में और सात साल के लिए ठेका दे दिया।
अधिकारियों ने यहां भी निगम को राजस्व की हानि पहुंचाई है। मामला हाईकोर्ट में है। न्यायालय को जान के लिए खतरा बने पोल को हटाने के साथ भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई के लिए जांच दल भी गठित करना चाहिए।
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