आस्था का टिकट: महाकाल मंदिर में नई व्यवस्था पर सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

शरद गुप्ता 96177-77331 खुलासा फर्स्ट, उज्जैन।
विश्वविख्यात महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में अब संध्या और शयन आरती के लिए 251 रुपए शुल्क तय किया गया है। नई व्यवस्था गुरुवार से तत्काल प्रभाव से लागू हो चुकी है। बुकिंग अब भस्म आरती और शीघ्र दर्शन की तर्ज पर ऑनलाइन होगी और प्रत्येक आरती के लिए 1200 स्लॉट निर्धारित किए गए हैं। जो ऑनलाइन बुकिंग नहीं करा पाएंगे, वे चलित दर्शन में निःशुल्क आरती का लाभ ले सकेंगे।
पहली नजर में यह व्यवस्था सुविधा और प्रबंधन के नाम पर उचित ठहराई जा सकती है, लेकिन असली सवाल सुविधा का नहीं, सिद्धांत का है। क्या आस्था का अनुभव अब डिजिटल भुगतान और स्लॉट बुकिंग पर निर्भर करेगा? क्या ईश्वर के दरबार में भी प्रवेश की प्राथमिकता जेब की क्षमता और इंटरनेट की पहुंच से तय होगी?
मंदिर प्रबंधन का तर्क हो सकता है कि भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा और सुव्यवस्था के लिए शुल्क और ऑनलाइन प्रणाली आवश्यक है। परंतु जब आरती के लिए भी टिकट व्यवस्था लागू हो, तो यह स्वाभाविक है कि श्रद्धालुओं के मन में व्यवसायीकरण की आशंका जन्म ले।
1200 स्लॉट तय करना प्रशासनिक दृष्टि से व्यावहारिक हो सकता है, लेकिन क्या यह सुनिश्चित किया गया है कि ग्रामीण, बुजुर्ग या डिजिटल साक्षरता से दूर श्रद्धालु समान अवसर पा सकें? क्या यह व्यवस्था पारदर्शी है? क्या शुल्क का स्पष्ट लेखा-जोखा सार्वजनिक होगा?
मामला केवल 251 रुपए का नहीं, उस भाव का है जिसमें भक्त यह महसूस न करे कि उसकी आस्था को श्रेणियों में बांटा जा रहा है। जब आस्था पर मूल्य-टैग लगता है, तो भरोसे पर प्रश्नचिह्न लग जाते हैं। यह विषय केवल मंदिर समिति तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि धार्मिक संस्थानों में लिए जा रहे निर्णयों की पारदर्शिता और जनसंवेदनशीलता सुनिश्चित करें। यदि व्यवस्था सुधार के नाम पर ऐसा मॉडल तैयार होता है, जो आम श्रद्धालु को हाशिए पर धकेले, तो सरकार को हस्तक्षेप कर संतुलन बनाना चाहिए।
धर्म सेवा का विषय है, राजस्व का नहीं... यदि प्रबंधन आवश्यक है, तो वह समानता और संवेदनशीलता के साथ हो, क्योंकि महाकाल केवल एक मंदिर नहीं, विश्वास का केंद्र हैं और विश्वास, शुल्क की रसीद से नहीं, सम्मान से चलता है।
आस्था पर कारोबार मत कीजिए साहब... आस्था कोई ब्रांड नहीं है, जिसे प्रचार की चमकदार पैकिंग में बेच दिया जाए। यह किसी कंपनी की बैलेंस शीट नहीं, जहां मुनाफा/नुकसान देखा जाए। आस्था तो आम आदमी के भरोसे, डर और उम्मीद से जुड़ी होती है।
लेकिन आज यही आस्था सबसे सस्ता और सबसे असरदार राजनीतिक व्यावसायिक औजार बना दी गई है। सवाल यह नहीं है कि लोग पूजा क्यों करते हैं। सवाल यह है कि लोगों की आस्था के नाम पर कौन और क्यों कमाई कर रहा है?
कभी दान पेटियों के नाम पर, कभी भव्य आयोजनों के नाम पर तो कभी धर्म की रक्षा के नाम पर आस्था से जुड़ा हर भाव अब किसी न किसी के लिए आय का साधन बन चुका है।
धार्मिक आयोजनों में करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं, लेकिन उसी जगह पर अव्यवस्था, अवैध वसूली, वीआईपी कल्चर और आम श्रद्धालुओं की दुर्दशा साफ दिखाई देती है। आस्था समान होती है, पर सुविधाएं वर्ग देखकर बांटी जाती हैं।
यह कैसा धर्म है, जहां ईश्वर के दरबार में भी अमीर-गरीब की पंक्ति अलग हो?
राजनीति जब आस्था के कंधे पर बंदूक रखकर चलने लगे, तब लोकतंत्र घायल होता है। धर्म को मुद्दा बनाकर सवालों से ध्यान भटकाया जाता है। महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे असली मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं। भीड़ भावनाओं से संचालित होती है और फैसले कुछ गिने-चुने लोग मुनाफे के लिए लेते हैं।
आस्था जोड़ने का काम करती है, लेकिन उसका व्यापार समाज को बांटता है। धर्म का इस्तेमाल सेवा के लिए होना चाहिए, सत्ता और संपत्ति के लिए नहीं। आम भक्तों के विश्वास के लिए खुलासा फर्स्ट ये विश्वास करता है कि व्यवस्था चंद लोगों की मर्जी से नहीं, अवाम की सहमति से ग्राउंड पर आना चाहिए। बाकी आप सरकार हाे...! ये निर्लज्जता आप पर ही भारी पड़ सकती है।
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