14,000 फीट पर धड़कती हॉर्स-इकोनॉमी: इंसानों की आस्था को कंधा देने वाले बेजुबानों का सच
KHULASA FIRST
संवाददाता

सांसों का संकट और करोड़ों का दांव: बाबा बर्फानी के ट्रैक पर दौड़ती कश्मीरी गांवों की लाइफलाइन
पथरीली चढ़ाइयों पर आस्था को कंधा: अमरनाथ यात्रा के वे ‘अनसंग हीरोज’, जिनकी जुबान नहीं सिर्फ टापें बोलती हैं
शून्य डिग्री में दहकती अंगीठियां और ‘एंटी-स्किड’ नाल: महागुनस की खतरनाक बर्फ पर टट्टुओं के सफर का विज्ञान
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
अमरनाथ यात्रा की दुर्गम और पथरीली चढ़ाइयों पर जब ऑक्सीजन की कमी से इंसानी फेफड़े जवाब देने लगते हैं, तब सन्नाटे को चीरती टापों की आवाजें केवल एक रास्ता नहीं दिखातीं, बल्कि कश्मीर की एक विशाल और अदृश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था का पहिया भी घुमाती हैं।
अमूमन अमरनाथ यात्रा को केवल धार्मिक आस्था, सरकारी सुरक्षा और लंगरों के सेवाभाव के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन इस पूरी यात्रा की असली लाइफ लाइन पहाड़ों के ये बेजुबान घोड़े और खच्चर हैं। पहलगाम के चंदनवाड़ी बेस कैंप से लेकर बालटाल की सीधी खड़ी चढ़ाई और वहां से 14,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र गुफा तक का जो भूगोल है, वह किसी आधुनिक मशीनरी के बस का नहीं है।
इस बेहद खतरनाक ट्रैक पर इंसानी आस्था को अपने कंधों पर लादकर हर साल लाखों श्रद्धालुओं को बाबा बर्फानी के द्वार तक पहुंचाने वाले इन पहाड़ी हीरोज के पीछे एक बहुत बड़ा आर्थिक, सामाजिक और वैज्ञानिक ढांचा काम करता है।
इस चंद हफ्तों के सीजन में चंदनवाड़ी और बालटाल के मैदान देश के सबसे ऊंचे ‘अश्व-बाजारों’ में तब्दील हो जाते हैं, जहां अरबों रुपयों का टर्नओवर सीधे कश्मीर के सुदूर और गरीब पहाड़ी गांवों की सालभर की आजीविका तय करता है।
इस साल प्रशासन और पशुपालन विभाग ने जानवरों की सुरक्षा और फिटनेस को लेकर सख्त रुख अपनाया है, क्योंकि इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अत्यधिक श्रम के कारण जानवरों की मौतें एक बड़ा चिंता का विषय रही हैं।
यात्रा शुरू होने से महीनों पहले अनंतनाग, गांदरबल, बडगाम, पुंछ और राजौरी जैसे जिलों से बेहतरीन नस्ल के पहाड़ी घोड़ों को यहां लाया जाता है। चंदनवाड़ी में इस बार हर जानवर का कड़ा मेडिकल टेस्ट हो रहा है, जिसमें उनकी कार्डियक हेल्थ और फेफड़ों की क्षमता की जांच की जा रही है।
बिना फिटनेस सर्टिफिकेट और यूनिक आरएफआईडी टैग के किसी भी घोड़े को ट्रैक पर जाने की इजाजत नहीं दी जा रही है। शुरुआती जांच में ही लगभग 4 प्रतिशत घोड़ों को ‘हाई एल्टीट्यूड स्ट्रेस’ और कमजोर खुरों के कारण अनफिट घोषित कर बाहर कर दिया गया है।
प्रशासन इस बार एक डिजिटल लॉग-बुक सिस्टम भी चला रहा है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी मालिक अपने घोड़े से तय सीमा से ज्यादा फेरे न लगवाए और ओवर-लोडिंग की क्रूरता को पूरी तरह रोका जा सके।
इस यात्रा का सबसे विस्मयकारी और तकनीकी रूप से कठिन पहलू है इन घोड़ों के पैरों की सुरक्षा, जिसे ‘नालबंदी’ कहा जाता है। पिस्सू टॉप, महागुनस टॉप और संगम की नुकीली चट्टानों, गीली मिट्टी और फिसलन भरी बर्फ पर साधारण समतल नाल पूरी तरह नाकाम हो जाती है। इसके लिए पुंछ और राजौरी से आए करीब दो सौ पारंपरिक नालबंदों (फरियर्स) का एक पूरा मैकेनिज्म चौबीसों घंटे काम करता है।
ये कारीगर शून्य डिग्री के तापमान में कोयले की अंगीठियां सुलगाकर लोहे को लाल करते हैं और ऑन-द-स्पॉट घोड़े के खुर के आकार के मुताबिक उसे ढालते हैं। यहां सामान्य नाल की जगह विशेष ‘रफ-नाल’ इस्तेमाल की जाती है, जिसके नीचे छोटे-छोटे खांचे या नुकीले उभार होते हैं, जो बर्फ पर एंटी-स्किड ब्रेक की तरह काम करते हैं।
पहाड़ों की तीखी रगड़ के कारण यात्रा के दौरान एक घोड़े की नाल को कम से कम तीन बार बदलना पड़ता है। एक घोड़े की नालबंदी का खर्च 500 से 800 रुपये के बीच आता है, जो इस चंद हफ्तों के सीजन में ही करोड़ों रुपये का एक बड़ा असंगठित कैश-मार्केट खड़ा कर देता है।
इंसानों से दोगुनी और लगातार कई घंटों तक चढ़ाई करने वाले इन जानवरों का डाइट चार्ट किसी अंतरराष्ट्रीय एथलीट से कम कड़ा नहीं होता। समुद्र तल से 12,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर पहाड़ों पर उगने वाली सामान्य घास में वह पोषण नहीं होता जो इनके फेफड़ों और पैरों को ताकत दे सके। इसलिए, दिनभर की हाड़-तोड़ थकावट के बाद इन घोड़ों को उबला हुआ मक्का, काला चना और जौ का भारी दलिया दिया जाता है।
कड़ाके की ठंड में जानवरों के शरीर का तापमान बनाए रखने, उनके खून को जमने से रोकने और उन्हें तुरंत ऊर्जा देने के लिए टट्टू मालिक एक पारंपरिक सीक्रेट नुस्खा अपनाते हैं, जिसमें आधा किलो गुड़ और सरसों के तेल का एक गाढ़ा मिश्रण (मसाला) हर ट्रिप के बाद जानवर को जबरन खिलाया जाता है।
कई संपन्न घोड़ा मालिक अपने जानवरों के जोड़ों को मोच और दर्द से बचाने के लिए उनके दलिए में पिसे हुए बादाम, मकई का तेल और ग्लूकोज पाउडर भी मिलाते हैं, ताकि अचानक होने वाले ‘पल्मोनरी एडीमा’ (फेफड़ों में पानी भरना) के कारण होने वाली मौतों को टाला जा सके।
यह पूरा ताना-बाना सिर्फ एक यात्रा प्रबंधन नहीं है, बल्कि यह कश्मीर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सीजनल बूस्टर है। पहलगाम और बालटाल दोनों रूटों को मिलाकर इस बार लगभग 15,000 से अधिक पंजीकृत घोड़े और खच्चर काम में लगे हैं।
यदि श्राइन बोर्ड द्वारा तय किए गए न्यूनतम सरकारी किराए और सामान के वजन के हिसाब से मिलने वाले अतिरिक्त प्रीमियम को जोड़ लिया जाए, तो यह पूरी ‘हॉर्स-इकोनॉमी’ 85 करोड़ से 100 करोड़ रुपये के सीधे टर्नओवर को छूती है।
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