यह पुलिस केस है: इलाज नहीं करेंगे; बेहोश युवती का इलाज न करने वाले डॉक्टर पर गिरेगी गाज, डीसीपी ने मांगा जवाब
KHULASA FIRST
संवाददाता
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सड़क हादसों और आपात स्थिति में घायल व्यक्ति को तुरंत उपचार देने के लिए सरकार लगातार अभियान चला रही है, लेकिन शहर के निजी अस्पतालों में संवेदनहीनता की तस्वीर अब भी नहीं बदल रही। ताजा मामला इंदौर के गीत भवन अस्पताल से सामने आया है, जहां बेहोश युवती को लेकर पहुंचीं महिला पुलिसकर्मियों को डॉक्टर ने प्राथमिक उपचार देने से साफ इंकार कर दिया। घटना सामने आने के बाद पुलिस प्रशासन ने सख्त कार्रवाई के संकेत दिए हैं।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी द्वारा शुरू की गई राहवीर योजना के तहत सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने वाले को 25 हजार रुपए प्रोत्साहन राशि देने की व्यवस्था की गई है, ताकि लोग मदद के लिए आगे आएं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राहगीर और पुलिस अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, जबकि कुछ अस्पताल मरीज को हाथ लगाने से भी बचते नजर आ रहे हैं। डॉक्टरों का रवैया ऐसा बनता जा रहा है कि एक्सीडेंट या गंभीर केस को सीधे सरकारी अस्पताल भेज देना ही आसान रास्ता समझ लिया गया है, जिससे मरीज की जान जोखिम में पड़ जाती है।
ड्यूटी पर तैनात महिला पुलिसकर्मियों ने दिखाई मानवता
बुधवार को पलासिया चौराहे पर ड्यूटी कर रही सूबेदार लक्ष्मी और आरक्षक सोनाली सोनी ने सड़क पर जा रही एक युवती को अचानक बेहोश होकर गिरते देखा। दोनों यातायात पुलिसकर्मियों ने बिना देर किए मानवता दिखाते हुए युवती को ऑटो में बैठाकर तत्काल गीत भवन अस्पताल पहुंचाया।
आरोप है कि अस्पताल पहुंचते ही डॉ. गजेंद्र सोनी (एमडी) ने मरीज को देखने से इंकार कर दिया और साफ शब्दों में कहा कि यह पुलिस केस है, इसे दूसरे अस्पताल ले जाओ। पुलिसकर्मियों ने बार-बार प्राथमिक उपचार देने की गुहार लगाई, लेकिन डॉक्टर अपने फैसले पर अड़े रहे। मजबूरन पुलिसकर्मी युवती को एमवाय अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उसका उपचार शुरू कराया गया। घटना का वीडियो भी सामने आया है।
डॉक्टर से मांगा जाएगा जवाब
डीसीपी राजेश त्रिपाठी के अनुसार मामले की जानकारी जुटाकर संबंधित डॉक्टर को पत्र जारी किया जाएगा और पूछा जाएगा कि उन्होंने अपने पेशेगत कर्तव्य का पालन क्यों नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि डॉक्टर का पहला दायित्व मरीज की जान बचाना है, न कि यह तय करना कि मामला पुलिस से जुड़ा है या नहीं। खास बात यह रही कि मरीज को अस्पताल लाने वाली दोनों महिला पुलिस अधिकारी वर्दी में थीं, इसके बावजूद डॉक्टर का रवैया कठोर और असंवेदनशील बना रहा।
डीसीपी लेंगे संज्ञान
मामले को लेकर डीसीपी (यातायात) राजेश त्रिपाठी ने बताया कि महिला पुलिसकर्मियों से पूरी घटना की जानकारी ली गई है। यदि डॉक्टर द्वारा प्राथमिक उपचार देने से इंकार किया गया है तो यह चिकित्सकीय कर्तव्य की गंभीर अनदेखी मानी जाएगी। वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा के बाद डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) या उपभोक्ता न्यायालय में शिकायत की जा सकती है। दोष सिद्ध होने पर डॉक्टर का लाइसेंस निलंबित या रद्द किया जा सकता है। वहीं आपराधिक लापरवाही के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 304ए के अंतर्गत दो वर्ष तक की सजा या जुर्माने का प्रावधान भी है।
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