लोकेशन बदलने का था दबाव: निलंबित टीआई का कोर्ट में दावा
KHULASA FIRST
संवाददाता

जुआ प्रकरण में सस्पेंशन को चुनौती, छुट्टी पर रही एएसआई पर कार्रवाई को लेकर भी सवाल
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मानपुर के चर्चित फार्म हाउस जुआ प्रकरण में कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है। निलंबित थाना प्रभारी लोकेंद्रसिंह हिहोरे ने सस्पेंशन को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कई गंभीर आरोप लगाए हैं। सबसे बड़ा दावा यह किया है जुआ पकड़े जाने के बाद उन पर घटनास्थल बदलने और फार्महाउस की पहचान छिपाने का दबाव बनाया गया। कल इस मामले में सुनवाई हुई, जहां शासन की ओर से जवाब भी पेश कर दिया गया। अगली सुनवाई 1 अप्रैल को होगी।
10 मार्च की रात मानपुर स्थित फार्महाउस पर पुलिस कार्रवाई ने प्रशासन और पुलिस महकमे में हलचल मचा दी थी। कार्रवाई के कुछ ही घंटों में तीन पुलिसकर्मियों पर निलंबन की कार्रवाई कर दी गई थी।
विवाद का कारण आईएएस का फार्म हाउस:मामला उस समय सुर्खियों में आया था, जब मानपुर क्षेत्र के एक फार्म हाउस पर पुलिस ने जुआ खेलते लोगों को पकड़ा। बाद में सामने आया फार्म हाउस मप्र वित्त निगम की एमडी और 2009 बैच की आईएएस वंदना वैद्य का है।
कार्रवाई के अगले दिन एसपी यांगचेन डोलकर भूटिया ने थाना प्रभारी लोकेंद्रसिंह हिहोरे के साथ एसआई मिथुन ओसारी और एएसआई रेशम गिरवाल को निलंबित कर दिया था।
लोकेशन बदलने के दबाव में नहीं आए टीआई
हाईकोर्ट में दायर याचिका में टीआई हिहोरे ने दावा किया है कि जब उन्होंने जुआ पकड़ा, तब उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि संबंधित फार्महाउस किसी प्रभावशाली अधिकारी का है। याचिका के अनुसार, घटना के बाद उन पर लगातार फोन कॉल और मैसेज के जरिए दबाव डाला गया एफआईआर में फार्म हाउस का नाम और सही लोकेशन दर्ज न की जाए।
उन्होंने अदालत में कहा उनसे अपेक्षा की जा रही थी प्रकरण का स्थान बदल दिया जाए, ताकि वास्तविक जगह का उल्लेख रिकॉर्ड में न आए। उन्होंने इस दबाव के बावजूद एफआईआर में सही तथ्य, सही आरोपी और सही घटनास्थल का उल्लेख किया। उनके मुताबिक, इसके बाद ही उनके खिलाफ कार्रवाई की जमीन तैयार हुई।
मिली सच लिखने की सजा
याचिका का सबसे अहम हिस्सा यही माना जा रहा है निलंबित टीआई ने कार्रवाई को सामान्य विभागीय दंड नहीं, बल्कि ‘दबाव में न आने की सजा’ बताया है। उन्होंने आरोप लगाया है उनके खिलाफ उठाया गया कदम प्रशासनिक निष्पक्षता से ज्यादा प्रभावशाली हस्तक्षेप का परिणाम प्रतीत होता है। याचिका में यह भी कहा गया है पूरे घटनाक्रम में वरिष्ठ स्तर पर ऐसा माहौल बनाया गया, जिसमें तथ्यों को दर्ज करने वाले अधिकारी को ही कठघरे में खड़ा कर दिया गया।
छुट्टी पर थीं एएसआई रेशम गिरवाल
याचिका में एक और महत्वपूर्ण सवाल एएसआई रेशम गिरवाल को लेकर है। कहा गया है रेशम गिरवाल 21 फरवरी से बीमारी के कारण अवकाश पर थीं और घटना के समय भी ड्यूटी पर नहीं थीं। इसके बावजूद उन्हें भी निलंबित कर दिया गया। टीआई ने इस कार्रवाई को बिना पर्याप्त परीक्षण के लिया गया निर्णय बताया है।
अब यह पहलू भी अदालत में प्रशासनिक निर्णय की वैधता और तर्कसंगतता के संदर्भ में अहम माना जा रहा है। हाई कोर्ट ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था। कल शासन की ओर से जवाब पेश कर दिया गया है। अब अदालत अगली सुनवाई में देखेगी निलंबन आदेश और उसके पीछे की परिस्थिति कितनी न्यायसंगत थीं।
जांच की निष्पक्षता पर भी सवाल
याचिका के अनुसार जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं दिखती। टीआई का आरोप है मामला सामान्य विभागीय कार्रवाई से आगे बढ़कर प्रभाव, दबाव और संरक्षण के घेरे में चला गया। ऐसे में यह सवाल भी खड़ा हो गया है क्या पुलिस कार्रवाई के बाद जो प्रशासनिक कदम उठाए गए, वे कानून के अनुरूप थे या नहीं।
इस बहुचर्चित प्रकरण की अगली सुनवाई 1 अप्रैल को होगी। उसमें स्पष्ट होगा निलंबित टीआई के आरोपों में कितना दम है और क्या यह मामला केवल विभागीय कार्रवाई का है या इसके पीछे कोई बड़ा दबाव भी काम कर रहा था। प्रकरण प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन सकता है।
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