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इस मंदिर में नहीं होता चंद्रग्रहण का असर: खुले रहते हैं कपाट; शयन आरती तक श्रद्धालु कर सकेंगे दर्शन

KHULASA FIRST

संवाददाता

03 मार्च 2026, 1:33 pm
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इस मंदिर में नहीं होता चंद्रग्रहण का असर

खुलासा फर्स्ट, उज्जैन।
विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में हर उत्सव बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस बार फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर होली के साथ चंद्रग्रहण का साया भी देखने को मिल रहा है, जिससे कई जगह पर रंगों का त्योहार फीका पड़ गया है। 3 मार्च यानी आज साल का पहला चंद्रग्रहण लगने जा रहा है।

मंदिरों के द्वार बंद
आमतौर पर ग्रहण के समय देशभर के मंदिरों के द्वार बंद कर दिए जाते हैं, घरों में भी पूजा-अर्चना रोक दी जाती है और सूतक काल का पालन किया जाता है। ग्रहण समाप्त होने के बाद ही शुद्धि के साथ दोबारा पूजा शुरू होती है लेकिन उज्जैन स्थित बाबा महाकाल की नगरी में परंपरा कुछ अलग है।

ग्रहण के दौरान भी नियमित रूप से दर्शन
श्री महाकालेश्वर मंदिर में ग्रहण के दौरान भी नियमित रूप से दर्शन होते हैं. मान्यता है कि स्वयंभू ज्योतिर्लिंग होने के कारण बाबा महाकाल पर ग्रहण का प्रभाव नहीं पड़ता, इसलिए मंदिर के पट बंद नहीं किए जाते और भक्त निर्बाध रूप से दर्शन कर पाते हैं। श्री महाकालेश्वर मंदिर में चंद्रग्रहण पर भी व्यवस्थाएं सामान्य रहेंगी।हर रोज की तरह आज सुबह भी भस्म आरती हुई।

शयन आरती तक श्रद्धालु दर्शन कर सकेंगे
रात की शयन आरती तक श्रद्धालु दर्शन कर सकेंगे। मंदिर के पुजारी रमन गुरु के अनुसार, यह ज्योतिर्लिंग दक्षिणमुखी है। दक्षिण दिशा काल की मानी जाती है और जो काल पर भी अधिपति हों, वही महाकाल कहलाते हैं। ऐसी मान्यता है कि जहां स्वयं महाकाल विराजमान हों, वहां ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है। इसी कारण ग्रहण काल में भी यहां पूजा-अर्चना और आरती का क्रम निर्बाध जारी रहता है।

हर रोज की तरह हुई भस्म आरती
दरअसल मंगलवार को ग्रहण होने से उज्जैन में कई मंदिरों के पट नहीं खुलेंगे ओर कुछ में खुलेंगे, तो भगवान का स्पर्श नहीं किया जा सकेगा। हालांकि महाकाल मंदिर के पट मंगलवार तड़के चार बजे ही खुले। प्रतिदिन अनुसार भस्म आरती हुई। इसके बाद ग्रहण होने के कारण आम श्रद्धालु बाबा के दूर से दर्शन तो करते हुए नजर आए, लेकिन गर्भगृह में मंदिर के पुजारी भी नहीं जा सके। वजह ग्रहण के कारण सूतक लगना है, इसलिए ग्रहण खत्म होने के बाद ही बाबा को जल अर्पित किया जा सकेगा। इस दौरान बाबा भक्तों को दर्शन देंगे.

केवल शक्कर का भोग
श्री महाकालेश्वर मंदिर की प्राचीन परंपरा के अनुसार, चंद्रग्रहण के कारण पूजा पद्धति में परिवर्तन रहेगाकेवल शक्कर का भोग शासकीय पुजारी पंडित घनश्याम शर्मा ने लोकल 18 को बताया कि शाम 6:32 से 6:46 बजे तक रहने वाले 14 मिनट के इस ग्रहण का वेध काल सूर्योदय से ही प्रारंभ हो गया है। वेध काल के कारण सुबह की दद्योदक और भोग आरती में भगवान को केवल शक्कर का भोग अर्पित किया गया।

ठंडे जल से होगा स्नान
महाकाल मंदिर में साल में दो बार भगवान की दैनिक व्यवस्था बदली जाती है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से सर्दियों के अनुरूप आरती के समय निर्धारित होते हैं जबकि चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से गर्मी की दिनचर्या लागू की जाती है। इस साल चार मार्च से चैत्र कृष्ण प्रतिपदा प्रारंभ हो रही है। इसके साथ ही मंदिर में ग्रीष्मकालीन समय-सारणी प्रभावी होगी।

मौसम में बदलाव
मान्यता के अनुसार, इसी दिन से मौसम में बदलाव माना जाता है और बाबा महाकाल का अभिषेक शीतल जल से किया जाता है। यह व्यवस्था शरद पूर्णिमा तक जारी रहेगी। इस अवधि में प्रतिदिन होने वाली पांच आरतियों में से तीन के समय में परिवर्तन किया जाएगा ताकि पूजा-विधि मौसम के अनुरूप संपन्न हो सके।

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