सुपर पॉवर का सरेंडर: झुकता है अमेरिका, झुकाने वाला ईरान-सा चाहिए
KHULASA FIRST
संवाददाता

‘जगत चौधरी’ का सरेंडर, ट्रंप की हार, मोजतबा की जीत
ईरान को कमजोर आंकना बड़ी भूल हुई साबित, पूरी दुनिया में हुई ट्रंप की किरकिरी
युद्धविराम होते ही अमेरिका में उठे सवाल- आखिर ट्रंप ने इस युद्ध से क्या हासिल किया
विध्वंसक हमलों से भी न डरा, न झुका ईरान, नागरिकों ने पेश की देशभक्ति की मिसाल
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
हमारे हिंदुस्तान की कहावत जगत का चौधरी बन रहे अमेरिका पर एकदम सटीक बैठी-‘चौबेजी छब्बे बनने चले थे, दुबेजी बनकर लौटे’। ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध का परिणाम अमेरिका के लिए इसी कहावत के अनुरूप रहा। कुछ घंटों की लड़ाई लड़ने दुनिया के मिडिल ईस्ट इलाके पहुंचा अमेरिका एक-दो नहीं, 40 दिन बाद भी ईरान से जीत नहीं पाया।
‘बड़े बे-आबरू होकर तेरे कूचे से निकले' वाले अंदाज में ‘अंकल सेम’ खाली हाथ मिडिल ईस्ट से वॉशिंगटन लौट आए। अब भले ही लुटे-पिटे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे अपनी जीत मुकर्रर कर रहे हैं, लेकिन जीत के जुलूस तो ईरान की सड़कों पर निकल रहे हैं।
ईरानी ध्वज लिए लाखों लोग अपने मुल्क की जीत पर नाच रहे हैं, जश्न मना रहे हैं। दूसरी तरफ इस युद्ध से बमुश्किल दुम दबाकर भागे अमेरिका में बवाल मचा हुआ है। अमेरिकी सांसद उद्वेलित हैं और पूरे मुल्क में ये सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर इस युद्ध से अमेरिका ने क्या खोया-क्या पाया?
टॉप लीडरशिप के खात्मे के बाद भी ईरान के तख्त पर खामनेई परिवार का कब्जा बरकरार है। ईरान की एटमी ताकत भी जस की तस है और मिसाइलों का जखीरा भी बरकरार है। उलटा अब वर्ल्ड ऑर्डर बदल गया।
झु कता है अमेरिका, झुकाने वाला ईरान जैसा चाहिए। बस, ये ही हुआ 28 फरवरी से 8 अप्रैल तक चले इस महाविध्वंसकारी युद्ध में। कहने को दो सप्ताह का ये युद्धविराम हुआ है, लेकिन हकीकत में ये सुपर पॉवर का एक तरह का सरेंडर है। ये एक तरह की जगत चौधरी बने घूम रहे अमेरिका व ट्रंप की हार तथा खामनेई के उत्तराधिकारी मोजतबा की जीत मानी जा रही है।
ईरान को कमजोर आंकने की अमेरिका की सोच धूलधूसरित हो गई। पूरी दुनिया में ट्रंप की किरकिरी हो गई। इस किरकिरी में जबरदस्त इजाफा पाकिस्तान जैसे मुल्क का साथ लेने में और हो गया। जो मुल्क लश्कर-जैश-हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों का रहनुमा है, उसका अमेरिका के पक्ष में पैरवी करना पूरी कायनात के लिए हास्यास्पद साबित हुआ।
40 दिन के इस युद्ध ने अमेरिका की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचाया। ये आघात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान व हरकतों से लगा। कभी ट्रंप एक सभ्यता को नष्ट करने की धमकी देते रहे, कभी ईरान को पाषाण युग में पहुंचाने के लिए गुर्राते रहे, लेकिन हकीकत में चीन व पाकिस्तान का दामन थाम युद्ध के मैदान से भाग खड़े हुए। पूरी दुनिया ने देखा, इन 40 दिनों में एक मर्तबा भी ईरान ने युद्धविराम की पेशकश नहीं की।
ट्रंप ही बार-बार सीजफायर का राग अलापते रहे। कभी 48 घंटे का सीजफायर तो कभी 5 दिन और कभी 10 दिन। अब दो सप्ताह का युद्धविराम कर ट्रंप घर लौट गए।
दर्जनभर अमेरिकी सैनिकों की मौत, आधा दर्जन उन्नत तकनीक के विमानों के खात्मे व खाड़ी देशों में अमेरिका के मित्र देशों की ईरान के हाथों मिट्टीपलीत कर ट्रंप युद्ध के मैदान से लौट गए।
जिन्हें खत्म करने निकला था, अब उनसे ही बात करने को मजबूर है अमेरिका
अमेरिका ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क को भी नहीं तोड़ पाया। ईरान की तरफ से युद्ध के मैदान में अंतिम समय तक हिजबुल्लाह, हूती व हमास जैसे संगठन लड़ते रहे। युद्धविराम के बाद भी इजरायल का लेबनान पर हमला इसी खीझ का नतीज़ा है।
अमेरिका होरमुज जलडमरूमध्य पर कब्जा तो दूर इसे खुलवा भी नहीं पाया, जब तक कि युद्धविराम न हुआ। ईरान की युद्धनीति के आगे ट्रंप टिक नहीं पाए। अमेरिका की तुलना में छोटे-से मुल्क ईरान की युद्ध रणनीति ज्यादा कारगर रही। ईरान ने होरमुज पर कब्जा कर मिडिल ईस्ट की इस लड़ाई के दायरे में समूची दुनिया को ले लिया।
ईरान को नेस्तनाबूद करने का ट्रंप का सपना चकनाचूर हो गया और उसे अब उसी खामनेई परिवार के सहयोगियों के साथ वार्ता की टेबल पर बैठना पड़ेगा, जिसके खात्मे के लिए अमेरिका युद्ध में उतरा था।
मजे की बात तो ये है कि बातचीत की ये टेबल-मेज पाकिस्तान जैसे मुल्क में लग रही है। ये है ईरान से लड़ने गए अमेरिका की युद्ध के बाद की औकात...!
खामनेई परिवार की हुकूमत खत्म न कर पाए ट्रंप, मोजतबा तख्तनशीन
न ट्रंप ईरान में तख्तापलट कर पाए, न मोजतबा को तख्तनशीन होने से रोक पाए। खामनेई सहित ईरान की टॉप लीडरशिप के खात्मे के बाद भी वे ईरान को झुका नहीं पाए। न ईरान की एटमी ताकत का बाल भी बांका कर पाए। जिस 440 किलो यूरेनियम को कब्जाने का ट्रंप ने मंसूबा पाला था, वह ईरान के पास जस का तस है।
यूरेनियम की ये मात्रा आज भी ईरान को दर्जन परमाणु बम बनाने की ताकत देती है। ईरान की मिसाइल शक्ति को भी मिटाने के अमेरिकी मंसूबे धूलधूसरित हो गए। युद्ध के अंतिम दिन, यानी 8 अप्रैल तक ईरान की मिसाइलें बरस रही थीं। मिसाइल का ईरानी जखीरा अब भी बरकरार है। अमेरिका ईरानी मिसाइलों का तोड़ नहीं निकाल पाया।
उलटे ईरान ने अमेरिका के हर विध्वंसक हथियार का बड़ी दमदारी से सामना किया। उसके फाइटर प्लेन तक मार गिराए। वह भी तब, जब अमेरिका दावा करता फिर रहा था कि हमने ईरान की एयर पूरी तरह खत्म कर दी।
ईरानी नागरिकों ने भी देश की हुकूमत से तमाम मतभेद के बाद भी इस युद्ध में देशभक्ति की बेहतरीन मिसाल पेश की कि सत्ता आएगी, जाएगी... राष्ट्र रहना चाहिए।
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