सरकारी फाइलों और कंप्यूटर स्क्रीन से उड़े जमीनों के असली हकदार: नामांतरण घोटाले से पूरे शहर में मचा हड़कंप
KHULASA FIRST
संवाददाता

सिस्टम पर कलंक, दांव पर जनता की गाढ़ी कमाई, नगर निगम बना कागजी भूमाफिया
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम का नामांतरण घोटाला एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि आम नागरिक के उस भरोसे की हत्या है, जिसके दम पर वह अपनी जिंदगी की सारी कमाई एक जमीन या मकान पर लगा देता है।
मगर नगर निगम में सरकारी रिकॉर्ड ही बदल गए। जिन लोगों की संपत्तियां दूसरे के नाम हुईं, उन्हें इसकी खबर तक नहीं लगी, और जिनके नाम पर संपत्तियां चढ़ीं, उनमें से कई कह रहे हैं कि उन्हें भी नहीं पता यह सब कैसे हुआ।
आखिर इस खेल का सूत्रधार कौन है? जांच में ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहां केवल नोटरी के आधार पर नामांतरण कर दिए गए, जबकि नियम इसकी अनुमति ही नहीं देते। यह मामला केवल 354 नोटिसों या 60 जवाबों का नहीं, बल्कि उन लाखों नागरिकों के विश्वास का है जो आज भी यह मानकर निश्चिंत हैं कि सरकारी रिकॉर्ड उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा हैं।
लोग डरे-सहमे सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे
इस खुलासे के बाद कि फर्जी तरीके से नाम चढ़वाने के बाद संपत्तियों को बाजार में बेच भी दिया गया है, पूरे शहर में हड़कंप की स्थिति है। नगर निगम मुख्यालय से लेकर विभिन्न जोनल कार्यालयों में अपने मकान और प्लॉट की जानकारी लेने के लिए नागरिकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है।
सैकड़ों लोग नगर निगम के कार्यालय पर पहुंचे और उन्होंने अपनी संपत्ति के स्वामित्व की जानकारी ली। लोग डरे-सहमे सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि उनके आशियाने पर किसी ‘कागजी जादूगर' की नजर तो नहीं पड़ी। इस बीच, बदहवास पहुंचे नागरिकों के सवालों का जवाब देने के लिए निगम के कर्मचारी तैयार नहीं थे, जिसके कारण जनता में गहरा आक्रोश व्याप्त है।
घोटाले की जड़ तक पहुंचने के लिए गठित तीन सदस्यीय जांच कमेटी के सदस्य और अपर आयुक्त आकाश सिंह ने अब उन लाभार्थियों से पूछताछ शुरू कर दी है, जिनके नाम पर दूसरों की संपत्तियां अवैध रूप से ट्रांसफर की गईं। निगम के जोन क्रमांक 10 साकेत नगर क्षेत्र में सबसे ज्यादा 61 संपत्तियों के फर्जी नामांतरण का मामला सामने आया है।
किसी भी जोनल कार्यालय के क्षेत्र की इस घोटाले में शामिल यह सबसे ज्यादा संपत्ति है। आकाश सिंह ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इस जोनल कार्यालय के क्षेत्र की नामांतरित की गई संपत्ति के फर्जी मालिक बने लोगों में से संदिग्धों को व्यक्तिगत पूछताछ के लिए मुख्यालय बुलाया है। सहायक राजस्व अधिकारी और बिल कलेक्टर के माध्यम से इन सभी को अपर आयुक्त कार्यालय में उपस्थित होने के निर्देश देते हुए नोटिस तामील कराए गए हैं।
हर 10 व्यक्तियों के लिए एक घंटे का समय तय
जांच कमेटी ने पूछताछ के लिए एक विशेष रणनीति तैयार की है, जिसके तहत हर 10 व्यक्तियों के लिए एक घंटे का समय तय किया गया है, यानी प्रत्येक लाभार्थी से औसतन 6 मिनट तक तीखे सवाल-जवाब किए जाएंगे। इस पूछताछ के बारे में अधिकारियों ने बताया कि इन लोगों से यह पूछा जाएगा कि आखिर यह संपत्ति उनके नाम पर कैसे हुई।
क्या संपत्ति को अपने नाम पर करवाने के लिए इन्होंने किसी से संपर्क किया था या फिर इस संपत्ति को उनके नाम पर करने के लिए किसी के द्वारा इनसे संपर्क किया गया था। यह महत्वपूर्ण जानकारी इन लोगों से प्राप्त की जाएगी।
कंप्यूटर डेटाबेस में की गई यह डिजिटल हेराफेरी यह साबित करती है कि नगर निगम का सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र बेहद असुरक्षित है और इसे भीतर बैठे लोगों ने ही पूरी तरह से हैक कर लिया था। जब तक आईटी विभाग के उन तकनीकी विशेषज्ञों और पासवर्ड धारकों की भूमिका की जांच नहीं होगी, तब तक इस घोटाले की परतों को खोल पाना नामुमकिन है।
साकेत नगर जैसे पॉश इलाके में इतनी बड़ी संख्या में संपत्तियों का ट्रांसफर हो जाना और किसी भी उच्च अधिकारी को इसकी भनक न लगना, व्यवस्था की पूरी नाकामी को दर्शाता है।
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