मुख्यधारा की रफ्तार में छूटा बद्रीनाथ मार्ग का गया तीर्थ: वैतरणी कुंड की अनकही मोक्ष गाथा
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
स्कंद पुराण की वह चौखट, जहां का सिर्फ एक अंजलि जल काट देता है यमलोक की वैतरणी का खौफ; गयाजी जाने की बाध्यता मिटाता है चमोली का यह जाग्रत कोना, सात पीढ़ियों के उद्धार की है अटूट मान्यता, चारधाम की चकाचौंध से दूर पहाड़ों की ओट में सुरक्षित है पितृ-ऋण से मुक्ति का सबसे रहस्यमयी जलस्रोत
उत्तराखंड की पावन और पथरीली धरती पर कदम रखते ही ऐसा महसूस होता है मानो हर कंकड़ में शंकर और हर नदी के मोड़ पर इतिहास का एक नया अध्याय छुपा हुआ है।
देश के कोने-कोने से हर साल लाखों श्रद्धालु चार धाम यात्रा के तहत भगवान बद्रीविशाल के दर्शन के लिए अलकनंदा के किनारे-किनारे मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग से होकर आगे बढ़ते हैं।
लेकिन रफ्तार की इस आधुनिक अंधी दौड़ में ज्यादातर तीर्थयात्री चमोली जिले के उन शांत और रहस्यमयी पड़ावों को अनजाने में ही पीछे छोड़ देते हैं, जिनकी आध्यात्मिक शक्ति और पौराणिक महत्व सनातन धर्म के बड़े-बड़े स्थापित तीर्थों के बराबर माना गया है।
अलकनंदा और बालखिला नदी के प्राचीन संगम के समीप, पहाड़ों की ओट में छिपा एक ऐसा ही विस्मयकारी और परम पवित्र जलस्रोत है- वैतरणी कुंड। यह वो पावन स्थल है, जिसके बारे में स्कंद पुराण के केदारखंड में साफ तौर पर लिखा गया है कि यहां किया गया एक अंजलि तर्पण भी मनुष्य को पितृऋण से हमेशा के लिए मुक्त कर देता है।
सनातन धर्म की स्थापित परंपरा में यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि पूर्वजों और पितरों की आत्मा की शांति तथा मोक्ष के लिए बिहार के ‘गयाजी’ जाकर पिंडदान करना अनिवार्य है, लेकिन देवभूमि के इस वैतरणी कुंड की महिमा इतनी अलौकिक है कि यहां आने के बाद किसी भी व्यक्ति को अपने पितरों के
तर्पण के लिए गया जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस कुंड के जल में साक्षात मोक्षदायिनी शक्तियां वास करती हैं।
यही कारण है कि स्थानीय लोग और इस रहस्य से वाकिफ देश भर के चुनिंदा साधक अपने पूर्वजों की अकाल मृत्यु या अटकी हुई आत्माओं की शांति के लिए इसी कुंड के किनारे आकर पिंडदान और श्राद्ध कर्म की रस्में पूरी करते हैं।
मान्यता है कि यहां श्रद्धापूर्वक किया गया तर्पण सीधे पितरों तक पहुंचता है और उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाकर सीधे बैकुंठ धाम भेज देता है। बिना किसी प्रचार और तामझाम के, पहाड़ों के बीच पिंडदान की यह परंपरा आज भी उतनी ही जागृत है।
इस कुंड का नाम ‘वैतरणी’ होना अपने आप में गरुड़ पुराण के उस खौफनाक प्रसंग की याद दिलाता है, जिसमें मृत्यु के बाद आत्मा को यमलोक जाते समय पार की जाने वाली भयानक वैतरणी नदी का जिक्र है। गरुड़ पुराण के अनुसार, पाप कर्मों से भरी आत्माओं के लिए उस उफनती रक्त-मज्जा की नदी को पार करना नामुमकिन होता है, लेकिन इस धरती पर चमोली का यह वैतरणी कुंड साक्षात उस डरावनी नदी के प्रभाव को शून्य करने की ताकत रखता है।
जब कोई जीवित व्यक्ति अपने पूर्वजों के नाम का पिंड इस कुंड के पवित्र जल में विसर्जित करता है, तो माना जाता है कि मृत आत्मा को उस अदृश्य वैतरणी नदी को आसानी से पार करने का संबल मिल जाता है। कड़ाके की ठंड और ऊंचे पहाड़ों के बीच स्थित इस कुंड के आसपास पसरा सन्नाटा और वहां बहने वाली ठंडी हवाएं इस स्थान को एक अजीब सी रहस्यमयी और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती हैं, जहां आकर नास्तिक से नास्तिक व्यक्ति का सिर भी श्रद्धा से झुक जाता है।
हम अक्सर विकास, सड़कों के चौड़ीकरण और व्यावसायिक पर्यटन के बड़े-बड़े दावों को सुनते हैं, लेकिन वैतरणी कुंड जैसी उपेक्षित धरोहरें यह साबित करती हैं कि उत्तराखंड का असली वैभव उसकी मुख्यधारा के शोर-शराबे में नहीं, बल्कि इन शांत और जागृत कोनों में सुरक्षित है। आज के इस व्यस्त दौर में, जहां इंसान कंक्रीट के जंगलों में खोकर अपनी जड़ों और पूर्वजों को भूलता जा रहा है, बद्रीनाथ मार्ग का यह रहस्यमयी कुंड हर सनातनी को उसकी प्राचीन परंपराओं और पितृ-धर्म की याद दिलाता है। चार धाम यात्रा पर जाने वाले यात्रियों के लिए यह स्थान सिर्फ एक दर्शनीय स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसा आध्यात्मिक विश्राम गृह है, जहां आकर भागती हुई इंसानी आत्मा को परम शांति मिलती है और सात पीढ़ियों के पितरों का अदृश्य आशीर्वाद पूरे परिवार के भविष्य को सुरक्षित रखता है।
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