आदिवासी लोकजीवन की सहजता और सहजीवन का दर्शन
KHULASA FIRST
संवाददाता

अनिल त्रिवेदी स्वतंत्र लेखक, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आदिवासी लोकजीवन केवल अभाव और गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सहजीवन, आत्मनिर्भरता और भरोसे की समृद्ध परंपरा भी है। मिट्टी-लकड़ी के घरों से लेकर पशुओं को परिवार का हिस्सा मानने और बिना दरवाजों के रहने तक, आदिवासी समाज की जीवन दृष्टि हमें बहुत कुछ सिखाती है। इसके बरअक्स आधुनिक विकास हमें सरलता से जटिलता और प्रकृति से दूरी की ओर ले जा रहा है।
सर्वोदय दर्शन को समग्रता से समझने एवं सहजता से समझाने वाले तथा स्वाधीनता आंदोलन के सैनिक दादा धर्माधिकारी अपने संस्मरणों को सहजता से अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं कि एक बार आदिवासियों के एक गांव में जाने का मौका मिला। उनके पास कोई जगह नहीं थी। मकान में एक ही कमरा था। उसमें खिड़की नहीं थी।
वहीं रोटी बनती थी। सारे मकान में धुआं था। कुछ मुर्गियां थीं, बच्चे भी इधर- उधर खेलते थे। उन्होंने सोचा कि मुझे वहां सुलाना ठीक नहीं होगा। बगल में एक झोपड़ी थी, वहां मेरी खाट बिछा दी। हमने पूछा यह जगह आपके पास कहां से आई?
वह हमारा अपमान या मजाक नहीं करना चाहता था, पर उसने वस्तुस्थिति बताई कि हम इसमें सूअर रखते हैं। हमारे पास और कोई जगह नहीं थी। हमने इसे आज साफ कर लिया। मैंने कहा -खैर साफ कर लिया तो अच्छा ही किया। थोड़ी देर में हमें लगा कि यह व्यक्ति यहां सूअर रखता था। रात को कोई घुस आए तो क्या होगा? हमने पूछा -इसमें किवाड़ नहीं है? बोला -इसमें किवाड़ों की जरूरत नहीं है। क्यों? आसपास कोई चोर नहीं है?
चोर तो बहुत है, तो फिर तुम्हारे घर में किवाड़ क्यों नहीं? बोला हम ऐसे भाग्यवान कहां कि हमारे घर में चोर आएं? अब यह बिल्कुल अनपढ़ मनुष्य कह रहा है। वह कह रहा है कि हमारा ऐसा भाग्य नहीं है। क्यों? भाग्य किसलिए चाहिए? तो कहता है -हमारे पास एक ही चीज है गरीबी और उसे चुराने वाला कोई नहीं! मैंने कहा- तब तो आपको पुलिस और फौज की जरूरत नहीं होती।
वह जवाब देता है कि पुलिस और फौज की हमें क्या जरूरत पड़ती होगी? पुलिस वाला कभी नहीं आता तुम्हारे यहां? कहता है आता है। कब आता है? आपकी घड़ी गुम हो जाए तो खोजने के लिए हमारे मकानों में आता है।
पुलिस और फौज किसलिए हैं? बोला आपकी अमीरी और हमारी गरीबी को बचाने के लिए है। वह दोनों की हिफाजत करती हैं। आदिवासी मनुष्य की अपनी मौलिक दार्शनिक समझ होती है, जिसे वे लोग ही समझ पाते हैं जो प्राकृतिक मानस के होते हैं। सदा जीवंत और भय मुक्त। अपने मन और शरीर की ताकत से जीवन की हर चुनौती को हल करने की सहजता से ओतप्रोत।
इसी तरह आदिवासी अंचलों में जो बसाहट होती है वह भी इसी दृष्टि का विस्तार करती है। आदिवासी अंचलों में घरों की बनावट और बसाहट की अपनी मौलिक लोकदृष्टि होती है। आदिवासी अंचलों में मनुष्य केवल मनुष्य या परिवार या समाज के साथ ही नहीं रहता, समूची प्रकृति की अंतहीन जीवन शृंखला के साथ सहजता से सहजीवन करता है।
पर्वतीय इलाकों में हो या घने जंगल में आदिवासी अंचलों की जीवन शैली में समूचे जीवन या प्राकृतिक शृंखला का समावेश होता है। एक बात मैंने आदिवासी अंचलों में चार-पांच दशकों के अपने लोक संपर्क और सहजीवन से समझी है कि प्रकृति और सहजीवन की सहज समझ आज के कालखंड में आदिवासी अंचलों के लोक जीवन में मौजूद होकर आज भी बनी हुई है।
एक बार मैंने आलीराजपुर के अंदरूनी हिस्से के सघन जंगलों में देखा कि अधिकांश घर मिट्टी और लकड़ी के सुंदर, सुरुचिपूर्ण और आकर्षक संरचना के साथ मौजूद हैं। निरक्षर लोगों ने बिना कागज पर कोई प्रारूप या रेखाकंन बनाए और बिना बड़े भौतिक संसाधनों को इस्तेमाल किए ही अपनी लोक परंपरागत नजर और सहज समझ के समन्वय से स्थानीय संसाधनों से बनाए हैं। जिसमें हर किसी के लिए अपनी सुविधा और जरूरत के हिसाब से घर को साझा इस्तेमाल करने का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है।
जब मैंने एक आदिवासी बुजुर्ग से उनकी बसाहट को लेकर यह जिज्ञासा प्रकट की कि आपके घरों में दरवाजे क्यों नहीं है? तो उन्होंने मुझे अपनी लोकदृष्टि से विनम्रतापूर्वक समझाते हुए कहा कि वकील साहब, यह घर केवल हमारे परिवार के सदस्यों के लिए ही हम नहीं बनाते।
हमारे साथ हमारी बकरी, मुर्गी और गाय-बैल भी हमारे जीवन एवं परिवार के सदस्य हैं। उन्हें जब हमारे घर में आवश्यकतानुसार अंदर बाहर आना-जाना हो तो दरवाजा उनके स्वतंत्र अवागमन में बाधा खड़ी कर सकता है। हम उनकी जरूरत और सुविधा की दृष्टि से दरवाजा नहीं रखते हैं।
ऐसी उदात्त लोकदृष्टि खुद ही आदिवासी समाज प्राकृतिक जीवन की निरंतरता को जीवन में आत्मसात कर, सब पर पूरा-पूरा विश्वास रखते हुए घर के सदस्य की तरह सहजता से करता है। तो मन खिल उठता है। खिला हुआ मन आदिवासी लोक जीवन की अनूठी धरोहर है जो सारी दुनिया के वनप्रांतरों में रची-बसी आदिवासी लोक परंपरा का सार या निचोड़ है।
अभी भी सुदूर आदिवासी अंचलों में पीने का पानी घर के बाहर एक छोटे मिट्टी और लकड़ी से बने मचान में मटके को चारों और से मिट्टी से ही ढंककर उसमें पानी सबके लिए रखने की लोक परंपरा कहीं कहीं देखने को मिलती है। इसी तरह अनाज को भी घर के बाहर बांस एवं गोबर मिट्टी से निर्मित बड़ी-बड़ी कोठियों में रखने की लोक परंपरा आज भी आदिवासी अंचलों में देखने को मिलती है। सब पर भरोसा और आत्मविश्वास, आदिवासी लोक परंपरा का मूल है।
आज भी अधिकांश आदिवासी अंचलों में स्वावलंबन और सहजीवन की अनोखी जुगलबंदी की मजबूती से खड़ी होकर मौजूद दिखाई देती है। आधुनिक जीवनशैली के आदी होते जा रहे विकसित शहरी सभ्यता के लोग, आदिवासी अंचलों की जीवनशैली के प्राकृतिक रूप-स्वरूप और दर्शन को आत्मसात करने का आत्मविश्वास और उदात्त मानवीय मूल्यों को समझने के बजाय जाने अंजाने अपने आप ही प्रकृति से दूर जाते जा रहे हैं।
इससे ऐसा आभास होता है कि विकसित मानव सभ्यता की दिशा सरलता से जटिलता की दिशा में बढ़ती ही जा रही है। जिसे आज की विकास यात्रा में हम शहरी या विकसित बसाहट में सब कुछ यंत्राधारित करने की अंधी दौड़ में निरंतर ले जाने में प्राण-प्रण से जुट गए हैं, उससे हम सब की प्राकृतिक सोच, समझ और जीवन का आनंद हमारे पास से निरंतर दूर जाने की दिशा में बढ़ता जा रहा है।
भौतिक समृद्धि और प्राकृतिक संपदा के सह संबंध को भूलकर आगे बढ़ने की दौड़ में हम सब हांफ रहे हैं। इसी से कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम विकसित सभ्यता के आदी मनुष्य अपने प्राकृतिक जीवन क्रम को खुद होकर लुप्त करने में लगे हुए हैं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
संबंधित समाचार

शिप्रा आरती पर घमासान पुलिस बल प्रयोग के विरोध में जल सत्याग्रह:11 साल की परंपरा और नई व्यवस्था आमने-सामने

पुरानी कार बेचने से पहले कर लें ये 5 काम:बढ़ जाएगी रीसेल वैल्यू; खरीदार भी देगा बेहतर कीमत

ग्वालियर किले में धड़ल्ले से चल रही अवैध गतिविधि:दुकानें, वसूली और जुआ-सट्टे के आरोप पर विधानसभा सवाल से पत्राचार तक

दतिया जैसा दर्द फिर न मिले:पहली बार आज पार्षदों से मिलेंगे महासचिव

ब्रिक्स संस्कृति सम्मेलन प्रदेश का गौरव मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव:11वीं ब्रिक्स संस्कृति मंत्रियों की बैठक में संबोधन

महाकाल का जयकारा लगाकर भक्तों ने ग्रहण की प्रसादी

भीषण सड़क हादसा:ट्रॉले ने ईको वैन को मारी टक्कर; महाकाल दर्शन कर लौट रहे 6 युवकों की मौत

इंदौर के नए तुगलकों का फरमान आया है...

कावड़ यात्रियों ने काशी- विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन कर की गोसेवा:केंद्रीय विधि मंत्री मेघवाल ने किया बाणेश्वरी कावड़ यात्रा का स्वागत

विश्व आदिवासी दिवस पर उमड़ा जनसैलाब:रैली में शामिल हुए हजारों युवा; पारंपरिक वेशभूषा में दिखी संस्कृति की झलक, कई रास्तों पर ट्रैफिक डायवर्ट

एयरपोर्ट के पास क्रैश हुआ ट्रेनिंग विमान:8 महीने में तीसरी बार हुआ हादसा; सुरक्षा पर उठे सवाल

अलीफ कॉन्वेंट स्कूल पर छात्रा के भविष्य से खिलवाड़ का लगा आरोप:थाने में शिकायत; झूठे आरोप में फंसाने की धमकी भी दी

घी में विषैला लेड:किडनी के साथ दिमाग को भी कर देता है डैमेज

संवाद से ही विवादों के समाधान तक पहुंचना संभव:इंदौर में वेस्ट जोन सम्मेलन में सुलभ न्याय पर मंथन; मध्यस्थता और तकनीक से लंबित मामलों के बोझ को कम करने पर जोर

भू-माफिया फारुख लम्बू तीन महीने के लिए हुआ जिलाबदर

डॉक्टर का नंबर गूगल पर सर्च करना पड़ा भारी:लिंक भेजकर मोबाइल किया मिरर; खाते से उड़ाए रुपए

तक्षशिला कैंपस में विवाद को लेकर एनएसयूआई ने थाने में दिया ज्ञापन:एबीवीपी कार्यकर्ता पर गाली-गलौज और धमकी का आरोप; एफआईआर दर्ज करने की मांग

पत्नी को छेड़ने पर दोस्त की हत्या कर दफना दी थी लाश:पुलिस ने निकाली लाश; दंपति को भेजा जेल

एमराल्ड डेवलपर्स इंदौर को दुबई-पेरिस के मुकाबले खड़ा कर देगा:समाजसेवी उद्योगपति विनोद अग्रवाल ने संजोया है इंदौर को दुनिया का अग्रणी शहर बनाने का सपना

खाद्य सुरक्षा विभाग की बड़ी कार्रवाई:3.35 लाख का 550 किलो घी किया जब्त
टिप्पणियाँ
अभी कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी करें!