मृत्यु के तीन साल बाद भी ट्रेजरी अधिकारी की भ्रष्टाचार की सजा बरकरार: हाईकोर्ट ने खारिज की अपील
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
पेंशन और ग्रेच्युटी का भुगतान कराने के एवज में 7 हजार रुपए रिश्वत लेने के 11 साल पुराने मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने अहम फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने तत्कालीन ट्रेजरी अधिकारी ओमप्रकाश मुंगेलवाल के खिलाफ निचली अदालत से हुई भ्रष्टाचार की सजा को बरकरार रखा है। फैसला उस समय आया, जब अधिकारी की मृत्यु हुए करीब तीन साल बीत चुके हैं।
जस्टिस जय कुमार पिल्लई की अदालत ने मामले के रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद सजा में हस्तक्षेप का आधार नहीं पाया।
अधिकारी के परिवार की ओर से उनकी मृत्यु का प्रमाण पत्र और इलाज से संबंधित दस्तावेज भी पेश किए गए थे।
रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े गए थे अधिकारी
मामला वर्ष 2015 का है। रिटायर्ड सब-इंजीनियर शैलेंद्र अग्रवाल अपने पेंशन प्रकरण के सिलसिले में इंदौर जिला कोषालय पहुंचे थे।
आरोप के मुताबिक, प्रकरण जल्द निपटाने के एवज में उनसे 10 हजार रुपए रिश्वत मांगी गई थी। बाद में सौदा 7 हजार रुपए में तय हुआ।
शिकायत के आधार पर लोकायुक्त पुलिस ने ट्रैप की कार्रवाई की। शिकायतकर्ता को 500-500 रुपए के नोट दिए गए और तय रकम के लेन-देन के दौरान मुंगेलवाल को रिश्वत लेते पकड़ा गया।
हाथ और पैंट की जेब के रासायनिक परीक्षण को माना अहम साक्ष्य
हाईकोर्ट ने मामले में रिश्वत की रकम के संपर्क से जुड़े रासायनिक परीक्षण को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। रिकॉर्ड के मुताबिक, अधिकारी के हाथ और पैंट की जेब के परीक्षण में रिश्वत की रकम से संपर्क की पुष्टि हुई थी।
इसके अलावा स्वतंत्र पंच गवाह ने भी रिश्वत मांगने और स्वीकार किए जाने की घटना की पुष्टि की। मुंगेलवाल की ओर से यह तर्क दिया गया था कि रकम रिश्वत की नहीं, बल्कि कर्ज चुकाने के लिए दी गई थी। कोर्ट ने इस दावे के समर्थन में पर्याप्त विश्वसनीय साक्ष्य नहीं पाया।
2018 में निचली अदालत ने सुनाई थी सजा
लोकायुक्त कार्रवाई के बाद मामले की सुनवाई चली। 31 अक्टूबर 2018 को निचली अदालत ने ओमप्रकाश मुंगेलवाल और सहायक ट्रेजरी अधिकारी राजेंद्र शर्मा को मामले में दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसके बाद मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
2021 में हो गया था मुंगेलवाल का निधन
मामले की अपील लंबित रहने के दौरान अक्टूबर 2021 में ओमप्रकाश मुंगेलवाल का निधन हो गया। उनके परिवार की ओर से कोर्ट में मृत्यु प्रमाण पत्र व इलाज के दस्तावेज प्रस्तुत किए गए।
हालांकि, उपलब्ध रिकॉर्ड और मामले में दर्ज साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने सजा के संबंध में हस्तक्षेप का आधार नहीं माना।
राजेंद्र शर्मा को मिली राहत
इसी मामले में आरोपी रहे सहायक ट्रेजरी अधिकारी राजेंद्र शर्मा को हाईकोर्ट से राहत मिली। उनके खिलाफ रिश्वत की रकम बरामद नहीं हुई थी। अभियोजन का प्रमुख आधार वॉयस रिकॉर्डिंग और पेंशन फाइल की जब्ती थी।
कोर्ट ने पाया कि वॉयस रिकॉर्डिंग में आवाज की पहचान को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक परीक्षण नहीं कराया गया था।
इस कारण शर्मा के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं माना गया और उन्हें राहत मिली।
11 साल पुराने मामले में आया फैसला
इस तरह वर्ष 2015 में शुरू हुआ रिश्वत का मामला करीब 11 साल बाद हाईकोर्ट के फैसले तक पहुंचा। एक ओर अदालत ने मुंगेलवाल के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निचली अदालत की सजा में हस्तक्षेप नहीं किया, वहीं दूसरे आरोपी राजेंद्र शर्मा के खिलाफ पर्याप्त वैज्ञानिक पुष्टि नहीं होने के कारण उन्हें राहत दी।
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