फिर नोट बोलेगा: डिजिटल का 66% नकदी में बदल सकता है
KHULASA FIRST
संवाददाता

2,000+ रु. के डिजिटल भुगतानों पर शुल्क : व्यापारियों का रुख और बाजार का भविष्य
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
यूपीआई ऑनलाइन ट्रांजेक्शन पर लगने वाले चार्ज (0.04 प्रतिशत) के विरोध में व्यापारियों द्वारा नकद लेनदेन (कैश ट्रांजेक्शन) बढ़ाने की घोषणा की गई है। इस स्थिति में नकदी मुद्रा नोट फिर से बाजार में हावी हो जाएगा।
नोटबंदी से नकदी लेनदेन को रोकने और डिजिटल ट्रांजेक्शन को बढ़ाने की जो भारी-भरकम अत्यंत महंगी कसरत सरकार और जनता को करनी पड़ी, वह अब फिर पूर्व की स्थिति में लौटती दिखाई दे रही है, जब बाजार में नोट या नकदी की बाढ़ आने लगेगी।
कारण 2000 से अधिक का डिजिटल ट्रांजेक्शन कॉल डिजिटल ट्रांजेक्शन का 66% है। हालांकि यह 66% ट्रांजेक्शन करीब 5% ही करते हैं, लेकिन इसका वॉल्यूम बहुत बड़ा होने से बाजार और सरकार दोनों प्रभावित होंगे।
एक अनुमान के अनुसार देश में इस समय 42 लाख करोड़ रुपए नोटबंदी के बाद छपे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या सरकार को और ज्यादा संख्या में नोट छापना पड़ेंगे?
सवाल यह भी है कि इससे कालाधन और ज्यादा तेजी से बढ़ेगा, जिसको नियंत्रित करने के लिए नोटबंदी और डिजिटल ट्रांजेक्शन जैसे कठिन उपाय किए गए थे? इस बड़ी कीमत को चुकाने के बदले देश और जनता को क्या हासिल होगा?
सवाल यह भी है कि क्या सरकार ने यह कदम अमेरिका के दबाव में उठाया है? प्राप्त जानकारी के आधार पर और अर्थशास्त्रियों के आकलन के आधार पर कहा जा रहा है कि फिर से नोट, यानी नकदी का बाजार में बोलबाला हो सकता है।
अर्थशास्त्र के शोधार्थी सुखबीर सिंह बताते हैं कि यूपीआई पर चार्ज के विरोध में व्यापारियों द्वारा कैश लेनदेन बढ़ाने से बाजार में नकदी का प्रबंधन और बैंकों में सिक्कों/नोटों की मांग में अस्थायी बदलाव आ सकता है, लेकिन इससे तुरंत कोई बड़ा आर्थिक संकट या सरकार पर नोट छापने का अत्यधिक दबाव नहीं आएगा। हालांकि पारदर्शिता घटने से टैक्स चोरी और कालेधन के खतरे को नकारा नहीं जा सकता।
सरकारी डिजिटल डैशबोर्ड और आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल डिजिटल भुगतान (जिसमें यूपीआई, एनईएफटी, आईएमपीएस, क्रेडिट/डेबिट कार्ड और प्रीपेड इंस्ट्रूमेंट्स शामिल हैं) की संख्या सालाना खरबों रुपयों को पार कर चुकी है। अकेले वित्तीय वर्ष में कुल डिजिटल ट्रांजेक्शन का आंकड़ा अरबों-खरबों में दर्ज किया गया है।
प्रतिदिन कितना डिजिटल ट्रांजेक्शन... एनपीसीआई के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार भारत में केवल यूपीआई के माध्यम से औसतन 65 से 68 करोड़ (650 से 680 मिलियन) ट्रांजेक्शन प्रतिदिन हो रहे हैं। यह आंकड़ा वैश्विक भुगतान दिग्गजों जैसे वीजा के दैनिक लेनदेन से भी आगे निकल चुका है।
दैनिक मूल्य : यदि वित्तीय मूल्य की बात करें, तो प्रतिदिन यूपीआई के जरिये औसतन 25 हजार करोड़ से 30 हजार करोड़ या उससे अधिक का लेन-देन होता है।
दो हजार से ज्यादा का लेनदेन 66%
संख्या के आधार पर : देश में होने वाले कुल मर्चेंट यूपीआई (पी2एम) ट्रांजेक्शन में से 95% से अधिक ट्रांजेक्शन 2 हजार से कम राशि के होते हैं। यानी संख्या के लिहाज से बहुत बड़ा हिस्सा (छोटे भुगतान) पूरी तरह सुरक्षित और मुफ्त है।
मूल्य के आधार पर वैल्यू : हालांकि संख्या में 2 हजार से ऊपर के ट्रांजेक्शन केवल लगभग 4% ही होते हैं, लेकिन बड़े आकार के होने के कारण ये कुल मर्चेंट पेमेंट के कुल मूल्य का लगभग दो-तिहाई (करीब 66%) हिस्सा कवर करते हैं।
भारत में यूपीआई के जरिये हर महीने औसतन 24 अरब से ज्यादा ट्रांजेक्शन होते हैं, जिनकी कुल मासिक वैल्यू करीब 30 लाख करोड़ तक पहुंच चुकी है। इस कुल मासिक मूल्य का बड़ा हिस्सा (लगभग 70%) व्यक्ति-से-व्यक्ति (पी2पी) ट्रांसफर का होता है, जो पूरी तरह मुफ्त है।
वहीं मर्चेंट भुगतानों में 2 हजार से अधिक के बड़े कमर्शियल ट्रांजेक्शन कुल मौद्रिक मूल्य में एक बड़ा हिस्सा बनाते हैं, जिन पर अब तय नियमों के तहत 0.4% चार्ज लागू किया गया है।
सरकार और एनपीसीआई के आंकड़ों के अनुसार चूंकि 95% से ज्यादा छोटे दैनिक लेनदेन (जैसे चाय, किराना या छोटी खरीदारी) 2 हजार की सीमा से नीचे हैं, इसलिए आम जनता और छोटे दुकानदारों पर इसका सीधा असर नहीं पड़ेगा। यह चार्ज मुख्य रूप से बड़े व्यावसायिक भुगतानों पर केंद्रित है।
मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक खबरें बताती हैं कि यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) या चार्ज लगाए जाने के पीछे अमेरिकी दबाव को एक कारण बताया जा रहा है। इस संबंध में सरकार ने अपना पक्ष स्पष्ट किया है।
अमेरिकी कंपनियों को नुकसान और लॉबीइंग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में यूपीआई के पूरी तरह से मुफ्त (0 एमडीआर) मॉडल के कारण वीजा और मास्टरकार्ड जैसी बड़ी अमेरिकी पेमेंट कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
भारत में डिजिटल ट्रांजेक्शन तेजी से बढ़ने के कारण इन अमेरिकी कंपनियों का कारोबार प्रभावित हुआ, जिसके चलते वे लंबे समय से भारत के जीरो-एमडीआर मॉडल का विरोध कर रही थीं और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधियों (यूएसटीआर) के माध्यम से दबाव बना रही थीं।
विपक्ष ने भी लगाए आरोप... कांग्रेस ने आरोप लगाया कि अमेरिकी प्रशासन और वहां की कंपनियों के दबाव के आगे झुकते हुए सरकार ने 2 हजार रुपए से अधिक के मर्चेंट यूपीआई ट्रांजेक्शन पर 0.4% चार्ज लगाने का रास्ता खोल दिया है।
उनका दावा है कि इससे अमेरिकी कार्ड कंपनियों को भारत के डिजिटल पेमेंट बाजार में आसानी से मुकाबला करने का मौका मिलेगा। दूसरी ओर वित्त मंत्रालय और सरकार ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
सरकार का कहना है कि यह निर्णय पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से लिया गया है, ताकि देश का डिजिटल पेमेंट का तंत्र वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर और समावेशी बन सके। सरकार के मुताबिक इस चार्ज से 95% से अधिक छोटे लेनदेन और आम जनता पूरी तरह सुरक्षित है, क्योंकि यह केवल 2 हजार रुपए से ऊपर के बड़े मर्चेंट भुगतानों पर ही लागू होता है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च के लिए शुल्क जरूरी
पिछले कई वर्षों से यूपीआई पूरी तरह ‘जीरो-एमडीआर’ मॉडल पर चल रहा था, जिसके कारण बैंकों और तकनीकी कंपनियों का तर्क था कि सर्वर लागत, साइबर सुरक्षा और नेटवर्क के रखरखाव का भारी खर्च उठाना उनके लिए मुश्किल हो रहा था।
इस नए शुल्क से मिलने वाले राजस्व का उपयोग इसी डिजिटल बुनियादी ढांचे (डिजिटल पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर) को और मजबूत करने के लिए किया जाएगा।
नोटों की छपाई और प्रचलन पर प्रभाव...यदि व्यापारी यूपीआई के बजाय नकद लेनदेन को प्राथमिकता देते हैं, तो बाजार में भौतिक मुद्रा का सर्कुलेशन तात्कालिक रूप से बढ़ जाएगा।
क्या नए नोट छापने पड़ेंगे...बाजार में केवल नकद लेनदेन का तरीका बदलने से सरकार को रातो-रात बहुत अधिक नए नोट नहीं छापने पड़ेंगे। वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पास पर्याप्त मात्रा में करेंसी नोट रिजर्व (मुद्रा भंडार) में उपलब्ध रहते हैं।
नए नोटों की छपाई मुख्य रूप से जीडीपी की वृद्धि, पुरानी और गंदी हो चुकी करेंसी को नष्ट करने और तय आर्थिक जरूरतों के आधार पर होती है, न कि केवल पेमेंट मोड बदलने से।
कितनी नकदी प्रचलन में है...आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार देश में जनता के पास सर्कुलेशन में मौजूद करेंसी लगातार बढ़ रही है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल करेंसी का यह आंकड़ा 34 लाख करोड़ से अधिक पहुंच चुका है।
नोटबंदी के बाद कितने नए नोट बाजार में आए...नवंबर 2016 की नोटबंदी के बाद से रिजर्व बैंक ने बाजार की मांग पूरी करने के लिए विभिन्न मूल्यवर्ग (विशेषकर 500 और 2000 के नोट, साथ ही 200, 100 और अन्य छोटे नोट) के भारी मात्रा में नए नोट छापे।
हालांकि सरकार और आरबीआई ने धीरे-धीरे उच्च मूल्य के 2 हजार के नोटों को चलन से बाहर कर दिया है, जिन्हें बैंकों में वापस जमा करा लिया गया है। वर्तमान में बाजार में सबसे बड़ा प्रचलन वाला नोट 500 का है।
क्या इससे कालाधन बढ़ेगा...डिजिटल ट्रांजेक्शन का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि हर लेनदेन का डिजिटल ट्रेल रहता है, जिससे टैक्स चोरी और कालेधन पर लगाम लगती है। यदि बाजार में बड़े पैमाने पर नकद लेनदेन लौटता है, तो लेनदेन का हिसाब-किताब छिपाना आसान हो जाता है, जिससे कर चोरी और अघोषित आय, यानी कालेधन को बढ़ावा मिलने की आशंका फिर से पैदा हो सकती है।
रुपए की कीमत पर कोई असर...रुपए की बाहरी या आंतरिक कीमत (विदेशी मुद्रा के मुकाबले एक्सचेंज रेट या घरेलू स्तर पर महंगाई) मुख्य रूप से देश के विदेशी मुद्रा भंडार, राजकोषीय घाटे, आयात-निर्यात और ब्याज दरों जैसे वृहद आर्थिक कारकों पर निर्भर करती है।
केवल घरेलू स्तर पर पेमेंट का माध्यम डिजिटल से कैश होने पर रुपए के अवमूल्यन पर कोई सीधा और बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता है।
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