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द मिथ ऑफ ईरान डिकोडेड

KHULASA FIRST

संवाददाता

31 मार्च 2026, 4:02 pm
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द मिथ ऑफ ईरान डिकोडेड

चंद्रशेखर शर्मा 94250-62800 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध के बीच हमारे देश की अलग-अलग जमातों और गलियारों में एक बहस इस बात पर है कि ईरान हमारा यानी भारत का कितना हितैषी या सगा है? इसी बहस में कुछ ऐसी बातें निकलकर आई हैं, जिन्हें माहिती में लाना बिलकुल बनता है। सो शुरू करते हैं।

हकीकतन बहुत लोग कहते हैं कि हमारे यानी भारत के ईरान से सदियों पुराने सांस्कृतिक और सिविलाइजेशनल संबंध हैं...ठीक है। तो चलिए, थोड़ा सा इतिहास को खासकर ईरान के इतिहास को खंगालते हैं। सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि पुराने सिविलाइज्ड ईरान और आज के मुल्ला ईरान में बहुत फर्क है।

आज की बात करें तो यह तथ्य भी गौरतलब है कि अभी करीब एक करोड़ भारतीय वेस्ट एशिया में हैं। मालूम हो कि भारत को आजादी मिली 1947 में और इजरायल बना इसके करीब एक बरस बाद यानी 1948 में। तब यानी 1948 से लेकर 1991 तक हमारी कांग्रेस सरकारों ने इजरायल को गोया राक्षस ही माना और यह बताकर माना कि वो मुसलमानों का बहुत बड़ा दुश्मन है। हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के वो अकेले और पहले पीएम हैं, जो दो बार इजरायल की यात्रा पर गए हैं। अब आते हैं ईरान पर।

दरअसल, ईरान के इतिहास में अहम मोड़ आया दिसंबर, 1979 में। तब, जब ईरान में इस्लामिक रेवोल्यूशन हुआ। इसके चलते शाह ईरान को ईरान छोड़कर भागना पड़ा। उसी समय अयातुल्लाह खामेनई, जो फ्रांस में निर्वासन का जीवन जी रहे थे, वो ईरान पहुंचे और उन्होंने ईरान में इस्लामिक सत्ता कायम की ! जमा यही नहीं, बल्कि उन्होंने ईरान के अमेरिका के साथ सारे संबंध तो खत्म किए ही किए, साथ ही तब तेहरान में मौजूद अमेरिकन एंबेसी के सारे अधिकारियों-कर्मचारियों को बंधक भी बना लिया और उनको करीब पांच सौ दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया।

उसी दौरान अयातुल्लाह खामेनई ने यह कहा था कि हम इस्लामिक रेवोल्यूशन को सारे मुस्लिम देशों में ‘एक्सपोर्ट’ करेंगे। इसके साथ यह भी कहा गया कि अरब देशों में जो शेख, बादशाह बनकर बैठे हैं उनको हम लेजिटिमेट गवर्नमेंट नहीं मानते, क्योंकि इस्लाम में राजशाही का कोई कांसेप्ट नहीं है।

इसके अलावा यह घोषणा भी थी कि हम इजरायल को शैतान मानते हैं और हम दुनिया के नक्शे से उसको मिटा देंगे व एक भी यहूदी को जिंदा रहने का हक नहीं है। उधर, हमास का यह कहना है कि जब तक एक भी यहूदी जिंदा है, कयामत नहीं आएगी। खैर।

पाकिस्तान के एक कमांडर थे ब्रिगेडियर एसके मलिक। इनकी लिखी एक किताब है ‘द कुरानिक कांसेप्ट ऑफ वॉर।’ इस किताब की प्रस्तावना लिखी जनरल जिया उल हक ने। वही जिया उल हक जो पाकिस्तान की फौज के सर्वेसर्वा थे और जिनसे भारत में सब परिचित। यह 1978-79 की बात है।

कहते हैं कि असल में यह किताब दुनियाभर के इस्लामी जिहादी आतंकवादी संगठनों की रूल बुक है! फिर चाहे वो हमास हो, हिजबुल्ला हो या भारत के कश्मीर सहित दीगर स्थानों पर कार्यरत इस्लामिक जिहादी आतंकवादी संगठन हों। बताते हैं कि यह किताब दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में आसानी से उपलब्ध है।

तो ईरान ने इसी से शुरुआत की और उसने पूरे पश्चिम एशिया में आतंकवादियों का एक ‘ग्रिड’ बनाना शुरू किया। ग्रिड यानी जैसे बिजली का पॉवर ग्रिड होता है न, वैसे ही। यानी एक नेटवर्क। इसके तहत उसने आतंकवादियों को मिलिट्री ट्रेनिंग और हथियार आदि देना शुरू किया। इस सिलसिले में उसने पहले हिजबुल्ला को खड़ा किया, जिसने आगे चलकर लेबनान में समानांतर सत्ता कायम की।

इसके पहले ईरान में यह व्यवस्था तय की गई कि वहां पार्लियामेंट तो है और चुनाव भी होते हैं, लेकिन वहां एक सुप्रीम काउंसिल होती है जो यह तय करती है कि कौन चुनाव लड़ेगा और कौन नहीं। यानी एक अनिर्वाचित संस्था या लोग यह तय करते हैं कि निर्वाचित संस्था के लिए कौन लड़ेगा, कौन नहीं और कौन वहां का राष्ट्रपति बनेगा !

इसी काउंसिल के अधीन होती है वहां की आईआरजीसी यानी इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गॉर्ड काउंसिल। ये आईआरजीसी वहां की मिलिट्री को कंट्रोल करती है। इसके अलावा इसी आईआरजीसी के अधीन है वहां की बासिज फोर्स, जो कि वहां का एक अर्धसैनिक बल है और इसका काम है ईरान के भीतर आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक नियंत्रण और वैचारिक प्रवर्तन।

इसका मूल काम है इस्लामिक रेवोल्यूशन की रक्षा करना और यह बहुत दमनकारी तरीके आजमाती है। इसका नमूना है कि पिछले करीब 50 बरसों में वहां जब भी जनता में असंतोष पनपा है तो उसको खत्म करने के लिए यह बल लाखों लोगों को मार चुका है! कहते हैं कि करीब 25 लाख लोगों को।

फिर ईरान में महंगाई भी जबरदस्त है। वहां महंगाई का आलम यह है कि वहां सरकार ने हाल ही में एक करोड़ रियाल का नोट छापा है, जो भारतीय करंसी में करीब साढ़े सात सौ रुपए के बराबर है। गोया ईरान की इकोनॉमी तकरीबन ध्वस्त हो चुकी है।

ईरान की जो आईआरजीसी है, उसका बॉस होता है वहां का सुप्रीम लीडर। बोले तो चंद दिनों पहले तक जो अयातुल्लाह खामेनई वहां वो लीडर होते थे। असल में अयातुल्लाह एक मजहबी डिग्री या पदवी है, जो बहुत साधना और लंबे अनुभव के बाद मिलती है। सो ईरान ने पहले आईआरजीसी बनाई, फिर उसके अधीन बासिज बनाया और आगे एक फोर्स बनाया कुद्स।

कुद्स का काम था ईरान के बाहर इस्लामिक रेवोल्यूशन को विस्तार देने के लिए ऑपरेशन चलाना और जहां भी कोई शत्रु हो तो उसको समाप्त करना। ईरान ने यमन में शिया और सुन्नी के बीच लड़ाई भी करवाई और वहां जो हूती शिया हैं, वो ईरान के साथ हैं। जमा ईरान ने कुछ अन्य पड़ोसी देशों में भी ऐसी ही खुराफातें कीं।

बोले तो हमास, हिजबुल्लाह, हूती आदि के रूप में ईरान ने आतंकवादियों के ऐसे ही ग्रिड खड़े किए। मकसद बस एक कि हमें पूरी इस्लामिक दुनिया पर कब्जा करना है। कहते हैं कि ईरान अभी अमेरिका और इजरायल से युद्ध में खाड़ी देशों पर जो हमले कर रहा है, वो असल में उसकी निगाह में इस्लामिक रेवोल्यूशन का उसका एक्सपोर्ट है।

बता दें कि इराक भी शिया बहुल देश है और वहां बगदाद में अमेरिकन एंबेसी पर पिछले दिनों हमला किया गया। यह भी बताते चलें कि शिया मुसलमान और सुन्नी मुसलमान में एक इमामत में यकीन रखते हैं और दूसरे खलीफत में। जमा ईरान पहले एक सुन्नी मुल्क था, लेकिन बाद में वहां एक राजा हुआ, जिसने बताते हैं, सुन्नी मुसलमानों को मार-मारकर शिया बनाया।

खैर...ये तो हुआ ईरान का इतिहास। भारत की बात करें तो जब यहां तुर्कों का आक्रमण हुआ, जिन्हें बाद में मुगल कहा गया तो यहां जो मुगलों का सचिवालय था या मुगलों का जो पूरा ब्रेन था, उसे ईरानियों ने चलाया था! अलावा इसके मुगलों की उस समय कोर्ट की जो भाषा थी वो पर्शियन थी और न कि अरेबिक। उधर, नादिर शाह ने भारत को कितना लूटा, यह भी इतिहास में दर्ज है।

आगे 1965 में जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया था तो ईरान ने अपनी पूरी वायु सेना और थल सेना पाकिस्तान के हवाले कर दी थी। फिर 1971 में युद्ध हुआ तो उस समय शाह ईरान के जीजा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे कि उनकी बेगम, नुसरत भुट्टो ईरान की थी। तब उन्होंने भी अपनी पूरी सेना पाकिस्तान के हवाले कर दी थी।

आगे जब 1979 में ईरान में इस्लामिक रेवोल्यूशन हुआ तो हमारे कश्मीर में आतंकवादियों को और इस्लामिक जिहाद को सबसे बड़ा समर्थन देने का काम अयातुल्लाह खामेनई ने किया। अभी 24 अप्रैल 2025 को जब हमारे यहां पहलगाम हमला हुआ तो अयातुल्लाह खामेनई के बयानों की पूरी सीरीज है भारत के खिलाफ !

सो हमारे यहां जो लोग कहते हैं कि भारत और ईरान के संबंध बहुत प्राचीन हैं और सिविलाइजेशनल हैं, उन्हें यह सब भी पता होना चाहिए। जमा यह भी कि ईरान में भारत से हर साल थैलेसीमिया की ढाई से तीन हजार टन वैक्सीन जाती हैं। इसके अलावा बहुत बड़ी मात्रा में चावल और जीवनरक्षक दवाइयां आदि भी।

हां, प्राचीन और सिविलाइजेशन संबंध की जहां तक बात है तो ईरान में बहुत पहले पर्शियन सभ्यता थी। वो तो बाद में अरबों ने ईरान को पीट-पीटकर मुसलमान बनाया और फिर उन्हीं के राजा ने उन्हें मार-मारकर शिया बनाया। अलबत्ता बताते हैं कि पिछले करीब तीस बरस में ईरान की आधी से ज्यादा आबादी इस्लाम तज चुकी है।

पिछले दिनों वहां जब महंगाई को लेकर बवाल हुआ तो सैकड़ों की संख्या में मस्जिदें जला दी गईं। अब वहां करोड़ों ऐसे लोग हैं, जो खुलेआम कहते हैं कि हम मुसलमान नहीं हैं, बल्कि पर्शियन हैं। सो वहां आईआरजीसी नाम का जो दमनकारी ‘टूल’ है, केवल उसी के दम पर वहां स्थानीय परचम फहरा रहा है।

हालांकि, अमेरिका और इजरायल ने ताजा युद्ध में ईरान को बहुत जबरदस्त नुकसान पहुंचाया है और ईरान ने पिछले 60-70 बरसों में जो आधारभूत ढांचा खड़ा किया था, वो मटियामेट हुआ पड़ा है। ईरान के पास अब मुख्य रूप से दो चीजें बची हैं। एक है 90 हजार मेगावॉट पॉवर जनरेशन फेसेलिटी।

ट्रंप ने बार-बार कहा है कि वो इस फेसेलिटी को डिस्ट्रॉय नहीं करेंगे, क्योंकि ईरान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को पॉवर एक्सपोर्ट भी करता है। जमा ईरान के तेल-गैस आदि निर्यात के लिए भी यह फेसेलिटी जरूरी है। दूसरा है ईरान का खर्ग आईलैंड, जहां से ईरान का करीब 90 फीसद तेल निर्यात होता है।

बहरहाल, जानकारों का कहना है कि ईरान खुद को असली मुसलमान बताता है और उसका मकसद है पहले पूरी इस्लामिक दुनिया पर कब्जा करना और उसके बाद पूरी दुनिया को मजबूर कर दुनियाभर की इकोनॉमी को ब्लैकमेल करना है कि अब हमारी शर्तों पर तेल और गैस का व्यापार होगा।

इस सिलसिले में ईरान द्वारा अभी स्ट्रेट ऑफ हार्मुज को बंद कर वहां से गुजरने वाले जहाजों से ‘वसूली’ दुनिया देख-भुगत ही रही है। सो जानकार मानते हैं कि ईरान ने पिछले करीब 40-50 बरसों में आतंक का या आतंकवादियों का जो ग्रिड खड़ा किया है, उसको तबाह करना आज विश्व के सामने एक बड़ी चुनौती है।

इजरायल ने इस मामले में हमास और हिजुल्लाह को काफी हद तक खत्म किया है। हालांकि हिजबुल्लाह अभी भी इतना मजबूत है कि वो इजरायल पर राकेट आदि हमले कर रहा है। उधर, बताते हैं कि कुरान में दर्जनों दफा इजरायल का नाम आया है, जबकि फलस्तीन का एक बार भी जिक्र न है।

कुल जमा समझने वाली बात यह है कि इजरायल-अमेरिका और ईरान का यह युद्ध न मुसलमान और यहूदियों की लड़ाई है, न मुसलमान और ईसाइयों की और न शिया और सुन्नी की। यह दरअसल एक तरह से सिविलाइजेशनल वॉर है और इसके मूल में है पॉलिटिकल इस्लाम!

जानकार कहते हैं कि यदि दुनिया में शांति बरकरार रखनी है तो उसके लिए मुल्ला ईरान का मुकम्मल इलाज निहायत जरूरी है। बता दें कि उपरोक्त तमाम जानकारी ‘प्रारब्ध’ नाम के यूट्यूब चैनल के ‘द मिथ ऑफ ईरान डिकोडेड’ शीर्षक से जारी एपिसोड से ली गई है।

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