नहीं बैठ पा रहा दो और दो चार गुना का गणित: भूमि अधिग्रहण कानून की कसौटी पर एमपी सरकार
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सरकार के जादुई गणित के दो गुना में दो गुना जोड़ने के बाद भी चार गुना का पूर्णांक नहीं हो रहा है। चार गुना होने के बाद भी ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा, यह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से बेहतर कोई नहीं जानता। उन्होंने बंद मुट्ठी खोली जरूर लेकिन पूरी तरह नहीं।
इस कारण दो और दो चार नहीं हो पा रहे हैं। बंद मुट्ठी में पुरानी कम दर की गाइड लाइन दबी हुई है। ईमानदार और न्यायप्रिय मुख्यमंत्री को वाकई न्याय करना है तो बंद मुट्ठी को पूरी तरह से खोलें और गाइड लाइन को क्षेत्रीय बाजार मूल्य के बराबर बढ़ाते हुए अपने चार गुना के फैसले को सही साबित करें।
इसके लिए अपने पुराने सनातन वैदिक गणित के अंक गणित से चार गुना का पूर्णांक हासिल करेंगे तो ही चार गुना का मतलब पूरा होगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दो गुना में दो और जोड़कर चार गुना करने का जो बोल्ड डिसीजन लिया, वह उनकी कार्यशैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
उदारमना मुख्यमंत्री को भूमि अधिग्रहण से प्रभावित लोग कह रहे हैं, सरकार के जादुई गणित के जोड़ में थोड़ी-सी कमी है। जानकार कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण का दो गुना मुआवजा दो गुना और बढ़ा दिया। इस तरह चार गुना कर दिया।
यानी अलग से सिर्फ दो गुना ही खर्च करना होगा, इसलिए गाइड लाइन में वृद्धि करके मुआवजा तय करना महंगा नहीं पड़ेगा, क्योंकि भूमि अधिग्रहण कानून का पालन करना जरूरी है।
इस तर्क को स्पष्ट करते हुए प्रभावित लोग कहते हैं
भूमि अधिग्रहण के बदले मुआवजा तय करने वाली गाइड लाइन हमेशा प्रभावित लोगों को मिस गाइड करती रही है। सरकार है कि इसमें गाइड करती गाइड लाइन को ही अपनी गाइड लाइन मानती है, क्योंकि वह मिस गाइड करने के लिए ही बनाई गई है।
चार गुना मुआवजा को लेकर भी मिस गाइड करती सरकार की गाइड लाइन जब तक बाजार मूल्य के बराबर नहीं बढ़ाई जाती, तब तक चार गुना मुआवजा पूरी तरह चार गुना नहीं होगा।
मुख्यमंत्री और सिंहासन बत्तीसी
उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य और उनका सिंहासन बत्तीसी न्याय के लिए जाने जाते हैं। स्वाभाविक है, इसीलिए प्रदेश के सिंहासन बत्तीसी पर आसीन मुख्यमंत्री और कठोर, लेकिन न्यायप्रिय शासक डॉ. मोहन यादव सबके साथ समान रूप से न्याय करते नजर आते हैं।
उनके लिए सब समान हैं, चाहे उनसे नाराज रहने वाले उनके कैबिनेट मंत्री हों, विधायक हों या बड़े अफसर या फिर संगठन के लोग, सबके साथ इस समय समान रूप से न्याय हो रहा है। ऐसे में समाज के अंतिम व्यक्ति और भूमि अधिग्रहण से प्रभावित लोग चार गुना मुआवजे का न्यायसंगत लाभ चाहते हैं।
इसलिए उम्मीद है धामनोद-बड़वाह स्टेट हाईवे से प्रभावित किसान शुरू से ही पहली मांग गाइड लाइन में वृद्धि की कर रहे हैं और इसी बाजार मूल्य के समक्ष वाली गाइड लाइन बढ़ोतरी के आधार पर चार गुना मुआवजा दिया जाए, यह मांग आंदोलन के पहले दिन से की जा रही है। भारतीय किसान संघ के इस आंदोलन के पूर्व इंदौर में भी आउटर पश्चिमी बायपास के लिए किसान संघ की मांग पर सरकार ने 200 से 300% तक गाइड लाइन बढ़ाकर मुआवजा दिया।
कानून का पालन करना है तो पूरी तरह से करें
मध्य प्रदेश में भूमि अधिग्रहण पर चार गुना मुआवजा देने के फैसले को अब केंद्रीय कानून भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (एलएआरआर एक्ट 2013) की कसौटी पर परखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार का यह कदम कानून की भावना के अनुरूप दिखता जरूर है, लेकिन जमीनी अमल में गाइड लाइन दरें ही इसकी सफलता तय करेंगी।
कानून क्या कहता है?... एलएआरआर एक्ट 2013 के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतम 4 गुना मुआवजा। बाजार मूल्य के आधार पर या पंजीकृत बिक्री के औसत पर मुआवजा राशि की गणना होगी और इसमें से जो भी अधिकतम हो वह आधार बनेगा।
इसके ऊपर सोलैटियम (100%) और अन्य लाभ भी जोड़े जाते हैं। साथ में पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अनिवार्य है। यानी कानून का उद्देश्य सिर्फ फैक्टर का गुणा-भाग या दो का चार गुना करना यह चार का दो गुना करना नहीं, बल्कि वास्तविक बाजार आधारित आर्थिक लाभ और सामाजिक, आर्थिक, आजीविका, पर्यावरण और बेहतर मानव संसाधन के लिए न्याय देना है।
इसलिए हो रहा है टकराव... सरकार ने 4 गुना मुआवजा लागू किया, लेकिन आधार अब भी गाइड लाइन (सरकारी दर) है। गाइड लाइन कई जगह बाजार मूल्य से 3-10 गुना कम पर रुकी या रुकवा रखी है। इतनी कामदार की गाइड लाइन का चार गुना मुआवजा अधूरा है।
गाइडलाइन के गणित का सच
पहले 2 गुना मुआवजा (शिवराजसिंह चौहान सरकार)। अब 4 गुना (नई नीति)। लेकिन 2 गुना मुआवजा बढ़ाने का आधार नहीं बदला। नतीजे में भूमि स्वामी का फायदा सीमित और सरकार का फायदा ज्यादा है। इसलिए किसानों को सरकार का जादुई गणित समझ नहीं आ रहा।
प्रभावित वर्ग का कहना है गाइड लाइन इतनी न्यूनतम है कि चार गुना जोड़ भी लें तो असली बाजार मूल्य से वह कम है, यह न्याय नहीं। इसकी वजह जितना मुआवजा मिलेगा, उस राशि से अपने इलाके में उपजाऊ कृषि भूमि खरीद पाना असंभव होगा, क्योंकि जमीन के भाव बहुत ज्यादा हैं।
बेहतर होगा सरकार जमीन के बदले जमीन दे तो असलियत समझ में आ जाएगी। बड़वाह-महेश्वर धाम न्यूज स्टेट हाईवे सिर्फ उदाहरण है। छिंदवाड़ा, छतरपुर, सिंगरौली, धार, झाबुआ, बड़वानी, मंडला में जनजातीय लोगों का विस्थापन हो रहा है।
उनकी छोटी-छोटी जमीन, गांव, मकान अधिग्रहित कर लिए गए हैं और मुआवजा कम गाइड लाइन के आधार पर दो गुना की नीति से तय हुआ होगा। उन आदिवासी गांव में, जहां सिंचाई परियोजनाएं हैं या खदानों के लिए भूमि अधिग्रहण विस्थापन हो रहा है या फिर अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, सभी के साथ कम मूल्य की गाइड लाइन आधारित मुआवजे का संकट खड़ा है।
बड़वाह-धामनोद फोरलेन से प्रभावित
किसान मुआवजा लेने से इसीलिए इनकार कर रहे हैं, क्योंकि गाइड लाइन कम रखी गई है। बढ़ी हुई गाइड लाइन को सरकार ने लगातार कम किया, इसलिए इसके आधार पर मुआवजा स्वीकार करना संभव नहीं है। इतनी कम गाइड लाइन पर मुआवजा 4 गुना नहीं, 2 गुना ही बैठता है।
क्या सरकार कानून की भावना के अनुसार गाइड लाइन को बाजार के करीब लाएगी? सरकार के सामने कानूनी और व्यावहारिक चुनौती है। कानून कहता है- मार्केट वैल्यू आधारित मुआवजा देना है। राज्य कर रहा है कम गाइड लाइन आधारित गणना, जिससे विवाद, कोर्ट केस, प्रोजेक्ट में देरी होने की आशंका बनी रहती है।
कुल मिलाकर न्यायप्रिय मुख्यमंत्री की असली परीक्षा अभी बाकी है। 4 गुना मुआवजा देना कानून की अनिवार्यता है। इस आधार पर न्याय तभी होगा, जब मार्केट वैल्यू को सही तरीके से लागू किया जाए। जब तक गाइड लाइन दरें वास्तविक बाजार के करीब नहीं आतीं और आर एंड आर प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं होता, तब तक 4 गुना मुआवजा सिर्फ कागजी अनुपालन बनकर रह जाएगा।
एलएआरआर एक्ट 2013 का असली संदेश साफ है- सिर्फ गुना नहीं, सही आधार जरूरी है। अब मोहन यादव सरकार की नीति इसी कसौटी पर परखी जाएगी।
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