विरासत के आंगन में उतरेगी नववर्ष के सूर्य की पहली किरण: ऐतिहासिक पर्यटन नगरी मांडू में उमड़ेंगे देश-विदेश के प्रकृति प्रेमी
Khulasa First
संवाददाता

सुहाती ठंड के बीच सैलानियों के लिए गीत, संगीत और खानपान की सजेगी महफिल
गौरवशाली अतीत की यादों से जुड़ी इमारतें और वादियां लुभा रहीं पर्यटकों को
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
बाज बहादुर और रानी रूपमती की अमर प्रेम कहानी का प्रतीक, प्रकृति और इतिहास के अनूठे संगम की ऐतिहासिक पर्यटन नगरी मांडू तैयार है सैलानियों के लिए। सुहाती ठंड के बीच यहां देश-विदेश से आने वाले प्रकृति प्रेमी नववर्ष की अगवानी के लिए 31 दिसंबर की शाम से ही पहुंचना आरंभ हो जाएंगे।
‘सुबह-ए-बनारस, शाम-ए-अवध और शब-ए-मालवा’ - यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि मालवा की रानी, ‘सिटी ऑफ जॉय’ मांडू की उस अद्वितीय सुंदरता का बखान भी है, जिसे जीभरकर निहारने के लिए हर साल नववर्ष के अवसर पर देश-विदेश से हजारों पर्यटक और प्रकृति प्रेमी यहां का रुख करते हैं। इस बार भी नव वर्ष 2026 की पहली सुबह जब मांडू की ऐतिहासिक धरती सूर्य की किरणों से दमकेगी तो यहां उसका इस्तकबाल करने के लिए सैलानियों का सैलाब होगा।
सुहाती ठंड और सुहाना माहौल
पत्रकार राहुल सेन बताया कि इन दिनों ऐतिहासिक नगरी मांडू का मौसम खासा सुहाना है। सिहरा देने वाली, लेकिन सुहाती ठंड से यहां का खुशगवार मौसम पर्यटकों को रास आ रहा है। प्रतिदिन देश-विदेश से यहां बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंच रहे हैं।
31 दिसंबर और एक जनवरी के कार्यक्रम की तैयारी
शहर की होटलों और क्लबों में नववर्ष की पूर्व संध्या और पहले दिन होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए विशेष तैयारी की गई है। उम्मीद है कि पहले दिन दस हजार से अधिक सैलानी यहां प्रकृति का सौंदर्य देखने के लिए मौजूद रहेंगे। इंदौर से नियमित बड़ी संख्या में प्रकृति प्रेमी मांडव पहुंच रहे हैं।
मांडू का मौसम भी करता है पर्यटकों को आकर्षित
जानकार बताते हैं कि पर्यटन नगरी का मौसम यहां आने वालों को खूब पसंद आता है। दिसंबर और जनवरी में जहां पहाड़ियों और वादियों में घने कोहरे के दीदार होते हैं, वहीं गुदगुदाती ठंड का अलग ही अहसास होता है।
सजेगी गीत-संगीत और लजीज खाने की महफिल
राहुल सेन ने बताया कि यहां के होटलों ने नववर्ष पर गीत-संगीत के विशेष कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है। पारंपरिक व्यंजनों के साथ ही लजीज खाना भी परोसा जाएगा। मालवा के पारंपरिक दाल-पानिये का स्वाद लेने यहां आने वाले सैलानी आतुर रहते हैं। मांडव की इमली के स्वाद के दीवानों की संख्या भी कम नहीं है।
शहर के कोलाहल से दूर शांत माहौल
यहां आने वाले प्रकृति प्रेमियों का कहना है कि मांडू का शांत और सुरम्य माहौल बहुत अलग है। शहरी कोलाहल से दूर इस नगरी में कुछ दिन बिताने का अनुभव अलग ही है।
“बाज बहादुर की बांसुरी, और रूपमती का राग।
मांडव में जलती रहे, विरह की मीठी आग॥”
बाज बहादुर और रानी रूपमती की अमर प्रेम कहानी का प्रतीक यह नगरी किस्सों से आबाद है। यहां के गाइड, इतिहास के जानकार और पुरानी पीढ़ी के लोग इसे बड़े चाव से सुनाते हैं।
इतिहासकर बताते हैं कि रानी रूपमती और बाज बहादुर का प्रेम केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि वह कला, संगीत और प्रकृति से जुड़ा था। रानी रूपमती ने शर्त रखी थी कि वे तब तक भोजन ग्रहण नहीं करेंगी जब तक वे पुण्य सलिला नर्मदा जी के दर्शन न कर लें। उनकी इसी भक्ति के लिए बाज बहादुर ने ‘रूपमती मंडप’ बनवाया था, जहां से आज भी पर्यटक नर्मदा की पतली जलधारा को निहारते हैं। यहां हर दिन बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। कभी परमारों और सुल्तानों की राजधानी मांडू की इमारतें और वादियां खुद इतिहास का बखान करती नजर आती हैं।
जहाज महल, रानी रूपमती का महल और हिंडोला महल प्रमुख आकर्षण
राहुल सेन बताते हैं कि यहां आने वाले पर्यटक पहले रानी रूपमती का महल देखने की ख्वाहिश रखते हैं। इसके साथ ही पानी के बीचोबीच तैरते जहाज की आकृति वाला ‘जहाज महल’ और अनोखी ढलान दीवारों वाला ‘हिंडोला महल’ पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र रहता है।
सुगम यातायात और पार्किंग की चुनौती
सप्ताहांत और नववर्ष पर मांडू में यातायात की समस्या हो जाती है। बेतरतीब खड़े वाहनों से यातायात कई बार अवरुद्ध हो जाता है। कई मर्तबा लोगों को अपने वाहन रखने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
“गढ़ मांडव की साख, जो मांडव जले तो भी रहे सवा लाख।” ( अर्थात - मांडू की साख इतनी बड़ी है कि यदि
यह शहर पूरी तरह नष्ट भी हो जाए या जल जाए, तब भी इसकी राख या अवशेषों का मूल्य ‘सवा लाख’ यानी अत्यधिक कीमती ही रहेगा।)
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