मुख्यमंत्री की नहीं सुनी वित्त आयोग ने: 16वें वित्त आयोग के नए नियम सरकार के लिए मुसीबत बने
KHULASA FIRST
संवाददाता

खाली हाथ आए थे, खाली हाथ हैं, आगे क्या होगा नहीं मालूम
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
करीब 380 दिन पहले (4 से 7 मार्च 2025) भोपाल में 16वें वित्त आयोग का गाजे-बाजे के साथ भव्य स्वागत-सत्कार किया गया था। आयोग के कदमों में सरकार बिछी हुई नजर आई थी। जैसे आयोग न होकर भगवान हो। हमेशा की तरह मीडिया, पसंदीदा इंडस्ट्री वाले अर्थशास्त्री, तथाकथित प्रबुद्ध नागरिक और जो-जो भी आयोग के लायक समझे गए, उन सबको सरकार ने जोता था।
डॉ. मोहन यादव सरकार के टॉप आईएएस ऑफिसर और प्रमुख सचिवों ने भारी-भरकम प्रेजेंटेशन दिए थे। इसलिए कि केंद्र से मिलने वाली करों की हिस्सेदारी 41 से बढ़कर 48% हो जाए। सरकार को जब चाहे, जितना चाहे केंद्र से पैसा मिल जाए। ऐसा होना स्वाभाविक भी है, जब जेब खाली हो।
सरकार को लग रहा था कि वित्त आयोग केंद्रीय धन से मालामाल करवा देगा। आयोग के अध्यक्ष को मीडिया ने या मीडिया के माध्यम से सरकार ने कुबेर के तुल्य महिमामंडित कराया, ऐसा प्रतीत होता रहा। आयोग के लिए रेड कारपेट वेलकम किया गया। स्वर्ग जैसी सुख-सुविधा न्योछावर कर दी।
इस सब का परिणाम कितना सुखद रहा यह 1 अप्रैल से लघु वित्त आयोग की सिफारिश से स्पष्ट हो गया है। मध्य प्रदेश को निराशा हाथ लगी। जो-जो मांगा था, वह नहीं मिला। वित्त आयोग किसी भी सरकार के चाले में नहीं आया। केंद्रीय वित्त आयोग ने राज्यों के लिए केंद्र सरकार से मदद पाने के परंपरागत तौर तरीकों को पूरी तरह से खारिज करते हुए नई लाइन खींच दी है।
मप्र सरकार के सारे तर्क धरे के धरे रह गए। आयोग की लागू की गई सिफारिश से प्रदेश का किस तरह से नफा-नुकसान होगा, इस बारे में नीतिगत ज्ञान रखने वाले लोगों से बात की।
16वें वित्त आयोग के नए नियम मप्र के लिए आर्थिक रूप से कितने नुकसानदेह साबित हो सकते हैं, इस सवाल पर उद्योगों के प्रतिनिधि और आर्थिक मामलों के जानकार डॉ. गौतम कोठारी कहते हैं कि अब राज्यों के सामने मुख्य समस्या वित्तीय आवश्यकता बनाम आर्थिक प्रदर्शन की हो गई है।
भारत के संविधान के तहत वित्त आयोग का काम अमीर और गरीब राज्यों के बीच की खाई को पाटना था, लेकिन 16वें वित्त आयोग ने अपनी नीति बदल दी है। पीथमपुर औद्योगिक संगठन के साथ भी आयोग की महत्वपूर्ण बैठक करवाई गई थी। उद्योगों ने आयोग को लंबा-चौड़ा ज्ञापन दिया था, लेकिन कोई बात नहीं मांनी।
अब धन का वितरण वित्तीय जरूरत (गरीबी दूर करने) के बजाय आर्थिक प्रदर्शन (जीडीपी में योगदान) के आधार पर किया जा रहा है। इसका सीधा मतलब है कि जो राज्य पहले से अमीर और औद्योगिक रूप से विकसित हैं (जैसे तमिलनाडु, कर्नाटक), उन्हें अधिक पैसा मिलेगा। वहीं मप्र जैसे राज्य, जो कृषि पर निर्भर हैं, उन्हें कम धन मिलेगा।
डॉ. कोठारी कहते हैं कि मप्र इन नए नियमों का सबसे बड़ा शिकार बनेगा। मप्र के साथ परिस्थितियां अलग हैं। उल्लेखनीय है मप्र का क्षेत्रफल बड़ा है और आबादी बिखरी हुई है, जिससे यहां बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना महंगा है। नए नियमों में क्षेत्रफल के महत्व को कम कर दिया गया है। जनसांख्यिकी भी बड़ा कारण है।
राज्य में एक बड़ी आदिवासी आबादी है, जिसके कल्याण के लिए विशेष धन की आवश्यकता है, लेकिन नए नियम इसे नजरअंदाज करते हैं। महाराष्ट्र जैसे राज्यों के पास बड़े टेक हब और फैक्ट्रियां हैं, जबकि मप्र मुख्य रूप से खेती पर निर्भर है। इसलिए वह आर्थिक योगदान की दौड़ में पीछे रह जाता है।
सरकार के हाथ निराशा लगी
16वें केंद्रीय वित्त आयोग के साथ डॉ. मोहन यादव ने लंबी चर्चा की थी, ताकि केंद्र से किसी तरह ज्यादा पैसा मिले। उन्होंने कहा था कि बड़ा राज्य है, जरूरतें ज्यादा की हैं और केंद्र के सहयोग से ही प्रदेश का विकास संभव है।
आयोग के समक्ष सरकार ने राज्य के कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग जैसे क्षेत्रों में तेजी से विकास करने का दावा भी किया था। उन्होंने वित्त आयोग से केंद्र करों में राज्य की हिस्सेदारी 41% से बढ़ाकर 48% करने का अनुरोध किया था, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
डॉ. यादव ने कहा था कि केंद्र से ज्यादा वित्तीय मदद मिलने पर राज्य का विकास तेजी से होगा। राज्य कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, वन, पर्यटन और उद्योग जैसे क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
इन क्षेत्रों में और विकास के लिए केंद्र सरकार से मजबूत वित्तीय सहायता जरूरी है, लेकिन ऐसा कुछ भी आयोग ने नहीं किया, जो सरकार चाहती थी। यानी सरकार के प्रयासों पर पानी फिर गया। अब सरकार के समक्ष और बड़ी चुनौती खड़ी हो गई।
हिस्सेदारी में गिरावट
राष्ट्रीय करों/टैक्स में मप्र की हिस्सेदारी 7.85% से घटकर 7.35% रह गई है।
वित्तीय घाटा
डॉ. कोठारी के अनुसार इस छोटे से बदलाव के कारण राज्य को हर साल लगभग 1,535 करोड़ और अगले पांच वर्षों में कुल 7,677 करोड़ का नुकसान होगा।
विकास पर असर
यह राशि 500 किमी ग्रामीण सड़कों के निर्माण या 150 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के पूरे साल के खर्च के बराबर है।
योजनाओं पर संकट
मप्र ने बुनियादी ढांचे (सड़कें, सिंचाई, नदी जोड़ो परियोजनाएं) पर 1 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की योजना बनाई है। केंद्र से मिलने वाले फंड में कटौती और कर्ज लेने की सख्त सीमाओं के कारण राज्य की ये महत्वपूर्ण परियोजनाएं रुक सकती हैं।
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