कई प्रश्नों को जन्म देता है महिला आरक्षण विधेयक का गिर जाना
KHULASA FIRST
संवाददाता

प्रो. मनमोहन प्रकाश स्वतंत्र पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारत जैसे लोकतंत्र में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी सामाजिक आवश्यकता है, बल्कि हमारे संवैधानिक आदर्शों की अनिवार्य शर्त भी है। सांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो 2011 की जनगणना के अनुसार प्रति 1000 पुरुषों पर 943 महिलाएं थीं, जबकि एनएफएचएस-5 के नवीनतम आँकड़े लिंगानुपात में सुधार दर्शाते हुए प्रति 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाओं की उपस्थिति दर्ज करते हैं। स्पष्ट है कि देश की लगभग आधी आबादी महिलाओं की है। ऐसे में यह प्रश्न उठना अपरिहार्य है कि क्या नीति-निर्धारण के सर्वोच्च मंचों (संसद और विधानसभाओं) पर उनकी भागीदारी इस अनुपात के अनुरूप है?
राजनीति और समाजशास्त्र के विशेषज्ञों का मत है कि लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के न्यून प्रतिनिधित्व के कारण उनके सरोकारों को वह स्वर नहीं मिल पाता, जिसकी वे हकदार हैं। विडंबना देखिए कि यदि इन सदनों में उनकी सहभागिता प्रभावी होती, तो क्या महिलाओं के उत्थान से संबंधित कोई विधेयक इस तरह गिर सकता था?
हाल ही में, वर्ष 2029 के चुनावों से महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से लाया गया ‹नारी शक्ति वंदन विधेयक› (131वाँ संविधान संशोधन विधेयक) संसद में दो-तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण पारित नहीं हो सका। केंद्र सरकार का यह महत्वाकांक्षी स्वप्न राजनीति की भेंट चढ़ गया। यह घटना भारतीय राजनीति की जटिलताओं और प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने को विवश करती है। यहाँ विचारणीय है कि क्या महिला प्रतिनिधित्व केवल एक चुनावी मुद्दा भर है?
महिला आरक्षण का प्रश्न दशकों से लंबित है। यह मात्र एक विधायी प्रस्ताव नहीं, अपितु लैंगिक समानता की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। इसके बावजूद विधेयक का गिरना क्या यह संकेत नहीं देता कि महिला सशक्तिकरण को आज भी राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर तौला जा रहा है?
जहां सत्तापक्ष ने प्रधानमंत्री की अपील और गृहमंत्री के स्पष्टीकरण से प्रतिबद्धता दर्शाने का प्रयास किया, वहीं विपक्ष का रुख कई गंभीर प्रश्न छोड़ गया जैसे क्या विपक्ष महिला सशक्तिकरण के प्रति वास्तव में गंभीर था?;क्या ‹परिसीमन› जैसे तकनीकी विषय महिला प्रतिनिधित्व से अधिक महत्वपूर्ण थे?;क्या विपक्षी दलों के लिए ‘विरोध के लिए विरोध’ की राजनीति एक विवशता थी या सोची-समझी रणनीति?;
क्या क्षेत्रीय दलों के शीर्ष नेतृत्व में यह असुरक्षा है कि आरक्षण लागू होने से उनके परिवारवाद का वर्चस्व कम हो जाएगा? विपक्ष के कुछ गुटों का तर्क था कि इस आरक्षण के भीतर पिछड़ी, दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान होना चाहिए।
यह तर्क सैद्धांतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है, किंतु क्या इस आधार पर पूरे विधेयक को ही अस्वीकार कर देना उचित था?, क्या सुधार की प्रक्रिया को सिरे से खारिज करना ही समाधान है? राजनीतिक दल चाहते तो विधेयक का समर्थन कर अपनी पार्टियों के भीतर आंतरिक स्तर पर पिछड़ी, दलित, आदिवासी जातियों को प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था कर सकते थे।
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