सपना टूटा, उम्मीद कायम: आधी आबादी को पूरा हक नहीं दे पाई देश की संसद
KHULASA FIRST
संवाददाता

संख्याबल नाकाफी, सरकार के तीनों बिल लोकसभा में गिरे, महिला आरक्षण भी लटका
अब सत्ता में आधी आबादी की 33 फीसदी हिस्सेदारी 2029 में संभव नहीं, 2034 तक टला फैसला
संविधान संशोधन बिल के पक्ष में 298, विरोध में 230 वोट, सरकार को चाहिए थे 352 वोट
2026 की नई जनगणना के आधार पर ही होगा अब लोकसभा-विधानसभा सीटों का विस्तार
एनडीए ने विपक्ष को बताया आधी आबादी का दुश्मन, अब सड़क पर मोर्चा खोलेगा एनडीए
सरकार की नीयत पर भी संदेह, नया परिसीमन पुरानी जनगणना के आधार पर करने पर क्यों अड़ी सरकार?
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट,इंदौर।
वह नारी ही क्या, जो हार मान जाए। नारी की नियति में ही संघर्ष लिखा हुआ है। रोजमर्रा के जीवन से लेकर देश की सबसे बड़ी पंचायत में उसकी सम्मानजनक हिस्सेदारी के मामले में उसके हिस्से में अब तक संघर्ष ही आया है।
शुक्रवार को एक बार फिर आधी आबादी का पूरा हक संघर्ष की राह पर धकेल दिया गया। देश की राजनीति महिलाओं को उनका वाजिब हक नहीं दे पाई। पक्ष की हक देने की कोशिशें विपक्ष की आपत्तियों की भेंट चढ़ गईं।
देश की मातृशक्ति जश्न की तैयारियों के साथ उस पल का इंतजार कर रही थी, जब उसे सत्ता में बराबरी का हक मिलने वाला था, लेकिन देश की संसद ये हक उन्हें न दे पाई। कारण भले ही राजनीतिक हो, लेकिन हार नारी शक्ति की हो गई।
एक सपना था कि 2029 से ही देश की संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी 33 फीसदी हो जाएगी। अब ऐसा 2033 तक होता दिख रहा है। यानी सपना जरूर टूटा है, लेकिन उम्मीदें कायम हैं। आखिर स्त्री शक्ति उम्मीद का ही तो पर्याय है...!
दे श की संसदीय प्रणाली में देश की आधी आबादी को पूरा हक देने निकली भारत की बहुदलीय राजनीति अगर-मगर, किंतु-परंतु में उलझ गई। देश की संसद दो दिन की बहस के बाद भी आधी आबादी का असल हक नहीं दे पाई। केंद्र की एनडीए सरकार सदन में हक के लिए जरूरी संख्याबल जुटा नहीं पाई और वह बिल गिर गया, जिसके जरिये देश की चुनावी राजनीति में महिलाओं की 33 प्रतिशत हिस्सेदारी तय होना थी।
इस मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष आखिरी तक एकमत नहीं हो पाए। विपक्ष का आरोप था कि सरकार महिलाओं की भागीदारी के बहाने देश के चुनावी भूगोल को मनमाने तरीके से बदलना चाहती है। सरकार भी आखिरी तक विपक्ष व देश के गले ये बात उतार नहीं पाई कि महिलाओं को सत्ता में 33 फीसदी हिस्सेदारी के लिए लोकसभा सीटों का विस्तार 2011 की जनगणना के आधार पर ही क्यों करना चाहती है, जबकि 2026 में नई जनगणना शुरू हो गई है?
इसी तर्क-वितर्क में वोटिंग की नौबत आ गई। बिल के पक्ष में जरूरी 352 वोट सरकार जुटा नहीं पाई। वह 298 तक आकर थम गई। विरोधी भी 230 वोट से आगे नहीं बढ़ पाए। लेकिन संविधान संशोधन के इस बिल के जरूरी दोतिहाई बहुमत के नियम-कायदों में आधी आबादी के हिस्से हार दर्ज हो गई। महिला आरक्षण के साथ-साथ परिसीमन व केंद्र शासित राज्यों के कानून में संशोधन के बिल भी गिर गए। विपक्ष इसे अपनी जीत बता रहा है तो सरकार विपक्ष को आधी आबादी का दुश्मन बता रही है।
बिल के गिर जाने से ये पूरी तरह साफ हो गया है कि अब महिलाओं की सत्ता में 33 फीसदी हिस्सेदारी बहुत आगे तक टल गई। सरकार इस बिल के जरिये ये भागीदारी 2029 के आगामी आमचुनाव में करने की मंशा के साथ विशेष सत्र के जरिये सदन में आई थी, लेकिन बिल को मिली हार ने ये सुनिश्चित कर दिया है कि 2029 के चुनाव में तो किसी भी सूरत में आधी आबादी पूरे हक के साथ चुनाव मैदान में नहीं उतर पाएगी। अगर बिल पास हो जाता तो 2029 तक ही लोकसभा की सीटें बढ़कर 543 से 850 तक हो जातीं। अब सब ठंडे बस्ते में है।
अब महिलाओं को सत्ता में 33 फीसदी हिस्सेदारी तब ही मिलेगी, जब 2026, यानी हाल ही में शुरू हुई जनगणना के मुकम्मल नतीजे सामने नहीं आ जाते। इन्हीं नतीजों के आधार पर देश का चुनावी नक्शे में सुधार होगा। लोकसभा व विधानसभा की सीटों में इजाफे के लिए इसी जनगणना के आधार पर सीटों का दायरा तय किया जाएगा।
मोदी सरकार की मंशा थी कि ये काम 2011 की जनगणना के आधार पर अभी ही कर लिया जाए, ताकि महिलाओं को 2029 से ही आरक्षण का लाभ मिल जाए। विपक्ष इसे सरकार की नीयत से जोड़ रहा था। उसका कहना था कि इतनी हड़बड़ी क्यों? नई जनगणना में जातिगत आंकड़े सामने आने के बाद तक सरकार रुक क्यों नहीं रही?
प्रधानमंत्री-गृहमंत्री की मान-मनुहार, टस से मस नहीं हुआ विपक्ष
इस मुद्दे पर संसद में दूसरे दिन भी जोरदार बहस हुई। दोपहर बाद राहुल गांधी सदन में मुखर हुए और उन्होंने दो-टूक कहा कि ये मामला नारी शक्ति के वंदन का नहीं, सरकार की चुनावी जमावट का है। अगर सरकार की नीयत साफ है तो पुराना बिल लाए। इसे सीटों के परिसीमन से जोड़कर क्यों लाया जा रहा है?
हमेशा की तरह राहुल गांधी के भाषण में हंगामा भी हुआ। कारण वही, असंसदीय शब्दों का उपयोग। बाद में अमित शाह ने पूरी चर्चा पर विस्तार से जवाब भी दिया और विपक्ष को समझाने की कोशिश भी की कि आप साथ दीजिए, हम लिखित में संशोधन भी करने को तैयार हैं।
इसके पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विपक्ष से इस बिल पर अपने घर की मां, बहन, बेटी और पत्नी की ओर देखकर वोटिंग की अपील की, लेकिन वोटिंग के परिणाम ने साफ कर दिया कि इस मामले में विपक्ष टस से मस नहीं हुआ और उसने प्रधानमंत्री व गृहमंत्री की बातों को सिरे से नकार दिया। अब एनडीए इस मुद्दे को सड़क पर लाने पर आमादा हो गया है, जिसमें वह विपक्ष को महिला विरोधी करार देगा। वहीं विपक्ष इसे संविधान की जीत के साथ जश्न मनाएगा।
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