जन्म के 24 घंटे में ही पकड़ में आ जाएगी बीमारी: अस्पताल में शुरू होगी न्यूबोर्न स्क्रीनिंग; केंद्र सरकार की मदद से बढ़ेंगी सुविधाएं
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अब सिकल सेल बीमारी की पहचान के लिए बच्चे के बड़ा होने या लक्षण सामने आने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इंदौर के महाराजा यशवंतराव अस्पताल (एमवायएच) स्थित सेंटर ऑफ कॉम्पिटेंस फॉर सिकल सेल डिजीज में जन्म के शुरुआती 24 घंटे के भीतर ही बीमारी की स्क्रीनिंग शुरू करने की तैयारी है।
इसके लिए न्यूबोर्न स्क्रीनिंग को बड़े स्तर पर शुरू करने की योजना बनाई जा रही है। केंद्र सरकार की टीम द्वारा सेंटर का निरीक्षण किए जाने के बाद नई सुविधा के लिए वित्तीय और उपकरण संबंधी मदद का आश्वासन भी मिला है।
इस सुविधा का सबसे बड़ा फायदा मध्यप्रदेश के उन जनजातीय इलाकों के नवजात बच्चों को होगा, जहां सिकल सेल का प्रभाव अधिक है।
जन्म के समय ही बीमारी या उसके खतरे की पहचान होने पर बच्चे की समय रहते निगरानी और उपचार शुरू किया जा सकेगा। एमवायएच में फिलहाल सिकल सेल एनीमिया के करीब 1400 मरीज पंजीकृत हैं।
एचएलए टाइपिंग की सुविधा भी होगी शुरू
एमवायएच अधीक्षक डॉ. अशोक यादव के मुताबिक न्यूबोर्न स्क्रीनिंग के साथ सेंटर में एचएलए टाइपिंग की सुविधा विकसित करने की भी तैयारी है। इसके लिए केंद्र सरकार से सहयोग मिलने का आश्वासन मिला है। उपकरण, रिएजेंट्स और अन्य जरूरी संसाधनों को शामिल करते हुए संशोधित प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जा रहा है।
एचएलए टाइपिंग के जरिए शरीर की कोशिकाओं पर मौजूद ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन की पहचान और मिलान किया जाता है। कई चिकित्सा प्रक्रियाओं में इसका महत्वपूर्ण उपयोग होता है।
केंद्रीय सचिव ने सेंटर का किया निरीक्षण
19 अगस्त को जनजातीय कार्य मंत्रालय की केंद्रीय सचिव रंजना चोपड़ा ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग स्थित सेंटर ऑफ कॉम्पिटेंस फॉर सिकल सेल डिजीज का निरीक्षण किया।
उन्होंने सेंटर में चल रही गतिविधियों और उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं की समीक्षा की। उन्होंने सेंटर को सिकल सेल प्रभावित जनजातीय आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने और राष्ट्रीय उन्मूलन लक्ष्य की दिशा में रोल मॉडल बताया।
गंभीर मरीजों के लिए रेड सेल एक्सचेंज की सुविधा
सेंटर की बड़ी सुविधाओं में रेड सेल एक्सचेंज भी शामिल है। यह सुविधा देश के चुनिंदा संस्थानों में ही उपलब्ध है। दूसरे राज्यों और जनजातीय क्षेत्रों से गंभीर मरीज यहां इलाज के लिए रेफर होकर पहुंचते हैं।
गंभीर स्थिति में एफेरेसिस मशीन के जरिए रेड सेल एक्सचेंज किया जाता है। एक मरीज की प्रक्रिया में करीब 15 से 18 यूनिट रक्त की जरूरत पड़ सकती है। इसके बाद शरीर में सिकल सेल की मात्रा करीब 10 से 15 प्रतिशत तक लाने में मदद मिलती है।
एक ही सेंटर पर जांच से इलाज तक सुविधा
सेंटर में बोन मैरो ट्रांसप्लांट और कोरियोनिक विलस सैंपलिंग (सीवीएस) जैसी आधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। इससे सिकल सेल की जांच, गर्भावस्था के दौरान आनुवंशिक स्थिति की जानकारी और गंभीर मरीजों के उपचार की सुविधाएं एक ही सेंटर पर मिल रही हैं।
पांच जिलों में 75 प्रतिशत मरीज
मध्यप्रदेश में सिकल सेल से प्रभावित करीब 75 प्रतिशत मरीज आलीराजपुर, अनूपपुर, छिंदवाड़ा, झाबुआ और डिंडौरी जैसे पांच आदिवासी जिलों में केंद्रित हैं। ऐसे में जन्म के समय ही स्क्रीनिंग शुरू होने से इन इलाकों में बीमारी की जल्द पहचान, नियमित निगरानी और समय पर उपचार को बड़ा फायदा मिल सकता है।
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