एक थे ‘रबड़ी' गुरु एक थे ‘सन्नू' गुरु: एमडी ड्रग में बदनाम वर्तमान के इंदौर में कभी था मनुक्का का ‘आयुर्वेद आनंद’
KHULASA FIRST
संवाददाता

अतीत का झरोखा: पुराने इंदौर की पहचान थे कल्याणदत्त शर्मा और सूर्यकुमार शर्मा
आयुर्वेदक औषधियों के प्रयोग से इंदौर को पहली बार मनुक्का का स्वाद चखाने वाले पिता-पुत्र की अनोखी दास्तान
पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ साथ आयुर्वेदाचार्य, पुत्र शिव का अनन्य भक्त
1965 में रबड़ी गुरु और इंदौर के जरिए पूरे मालवा अंचल ने जाना मनुक्का का स्वाद
पिता-पुत्र इतने सिद्धांतवादी कि मनुक्का के नाम पर भांग का अवैध कारोबार होने पर बंद कर दिया अच्छा भला कारोबार
मिट्टी से इत्र बनाने की कला में भी रबड़ी गुरु को थी महारथ हासिल, सन्नू गुरु ने संभाली फिर विरासत
दादा-परदादा के आदर्शों के साथ सिरपुर-चंदन नगर क्षेत्र में आज भी रह रही रबड़ी गुरु की तीसरी व चौथी पीढ़ी
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
याद आता है सत्तर-अस्सी का दशक। इंदौर आज जैसा ‘हाबल्या-गाबल्या' नहीं था। शांत, स्थिर व खूब जीवंत शहर। सुकूनदायक नगर। हरियाली से आच्छादित, पंछियों के कलरव से आबाद।
साफ-सुथरी समाजिक व्यवस्था और साफ-सुथरा समाज। ‘बाप को बाप और पड़ोसी को काका' कहने का रिवाज़ वाला दौर। ऐसे में ‘मनुक्का' खा लेना ही बड़े कलेजे का काम होता था या माना जाता था।
ऐसा नही कि मनुक्का का सेवन कोई नशा था। महज आयुर्वेद औषधि ही होती थी मनुक्का, लेकिन बदनाम इसलिए हो गई कि इसके निर्माण में ‘विजियापत्र' का इस्तेमाल होता है यानी भांग। ‘भांग बूटी' के बिना मनुक्का का अस्तित्व आकार नहीं लेता था। इसलिए उस ‘सज्जन दौर' में मनुक्का का शौक रखना या पालना, कलेजे का काम होता था।
जबकि मनुक्का आयुर्वेद के बेहद स्वादिष्ट चूर्ण के साथ ‘गटागट गोली' जैसी बाजार में आती थी। साफ-सुथरा सफेद डिब्बा। डिब्बे में भी पन्नी के अंदर पैक मनुक्का व स्वादिष्ट चूर्ण। डिब्बे के बाहर तमाम उन आयुर्वेद सामग्रियों की मात्रा व जानकारी, जो मनुक्का में इस्तेमाल हुई। इतनी शुद्धता के बावजूद ‘मनुक्का' उस ‘शुद्ध' दौर में ‘नशा' मानी गई। बावजूद इसके मनुक्का परिवार में, घर-घर में जगह बना पाई तो उसके पीछे बस एक ही नाम था- रबड़ी गुरु-सन्नू गुरु।
जी हां, ये ही वो दो नाम है, जिन्होंने न सिर्फ इंदौर बल्कि समूचे मालवा-निमाड़ को मनुक्का ब्रांड व स्वाद से रूबरू करवाया। भांग के इस्तेमाल से होने वाले कारोबार के बावजूद पूरे सरकारी नियम-कायदे दोनों ईमानदारी से पूर्ण करते थे। मनुक्का के नाम पर नशा नही, जनसामान्य को ‘आयुर्वेद आनंद' से तर रखने का उद्देश्य ही था, जो समूचे व्यापार को सरकारी निगरानी में ही संचालित करता था।
रबड़ी गुरु यानी स्व. कल्याणदत्त शर्मा और सन्नू गुरु यानी सूर्यकुमार शर्मा। रबड़ी गुरु खांटी गांधीवादी व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। साथ ही आयुर्वेद का अच्छा खासा ज्ञान होने के कारण आयुर्वेदाचार्य भी थे।
पुत्र सन्नू गुरु शिव भक्त और पितृ भक्त। पिता-पुत्र की ये उस वक्त शहर में आदर्श जोड़ी थी। इस जोड़ी ने ही अपनी इसी साख पर ‘रबड़ी गुरु की मनुक्का' को एक इंदौरी ब्रांड बनाकर उस दौर में देश ही नहीं, जगत तक पहुंचा दिया।
बिना किसी पब्लिसिटी व मार्केटिंग, हाथ से बनाना और बनाकर हाथ से ही बांटने निकलने वाला परिश्रम ही था कि मनुक्का ने घर में स्थान बनाया। इसी साख की दोनों पिता-पुत्र ने अंतिम समय तक चिंता की कि मनुक्का के नाम से भांग की लत समाज में चलन में न आए।
ये ही कारण था कि पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने अपना अच्छा भला चलता कारोबार सिर्फ इसलिए बंद कर दिया कि मनुक्का व्यवसाय की आड़ में इंदौर में अवैध रूप से भांग का कारोबार होने लगा।
शराब माफिया जैसा शहर में भांग माफिया का भी उदय हो गया। मनुक्का के नाम पर ‘अनन-सनन-भनन' और ‘ काले-पीले-नीले घोड़े' शहर में दौड़ने लगे। आए दिन मनुक्का का नाम शहर में बदनाम होने लगा। चूंकि मनुक्का नाम के साथ पिता स्व. कल्याणदत्त शर्मा रबड़ी गुरु का नाम जुड़ा था। लिहाजा पुत्र सन्नू गुरु यानी सूर्यकुमार शर्मा ने कारोबार ही बंद कर दिया।
आज अतीत का जब एक झरोखा खुला तो रबड़ी गुरु और उनका कुनबा याद आ गया। नाॅर्थ राजमोहल्ला का वो दो कमरे का उनका किराए का मकान याद आ गया, जो खादी की झक सफेद धोती-कुर्ता व गांधी टोपी, हाथ मे गांधीजी जैसी लाठी टेके एक ‘ऊर्जावान' बुजुर्ग की पहचान था।
शिवभक्त पुत्र सन्नू गुरु ने इस किराए के दो कमरे की पहचान को तबके सुरम्य सिरपुर क्षेत्र में एक बड़े आशियाने में बदल दी। वह भी शिव मंदिर के साथ, जो आज भी कायम है। रबड़ी गुरु के प्रपौत्र आशीष शर्मा व सन्नू गुरु के पौत्र प्रियांशु व प्रपौत्र श्रीथिक शर्मा कुनबे की पहचान को कायम रखे हैं।
सन्नू गुरु को इसी 27 अगस्त को ब्रह्मलीन हुए एक बरस बीत गया। उनकी विदाई बीते बरस बेहद खामोशी से इस शहर से हो गई थी। वे खालिस इंदौर की पहचान थे। लिहाजा इस पक्का इंदौरी से कैसे छूट सकते थे। बीते बरस नहीं तो क्या हुआ? इस बरस सन्नू गुरु यानी सूर्यकुमार शर्मा जी को बजरिये खुलासा फर्स्ट इंदौर की तरफ से अश्रुपूरित श्रद्धासुमन।
अजमेर के कल्याणदत्त इंदौर आकर रबड़ी गुरु हो गए
रबड़ी गुरु यानी कल्याणदत्त रामरतन शर्मा राजस्थान (अजमेर) के पास शाहपुरा ग्राम के थे। मिट्टी से इत्र बनाने की कला सहित जीवन रूपी आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण संग वे शाहपुरा से नेनोद के पास रिजलाय गांव के मंदिर में पंडिताई करते हुए इंदौर शिफ्ट हुए। सराफा, कुंवर मंडली और बाद में नाॅर्थ राज मोहल्ला आकर बस गए।
अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई संग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की भूमिका में जेल भी कई बार आना-जाना रहा। जेल में रहते हुए वैद्य विशारद होकर आयुर्वेदिक औषधियों हेतु निर्माण संग सर्वप्रथम मनुक्का उत्पादक का गौरव प्राप्त किया। सन् 1965 से शुरुआत हुई और 1999 में ये काम बंद कर दिया।
रबड़ी गुरु व सन्नू गुरु के इस संघर्ष में एक अन्य भाई कमलकिशोर शर्मा, पुत्र आशीष शर्मा, भतीजे अरुण का भी योगदान रहा। रबड़ी गुरु घराने की आयुर्वेदिक औषधियों में दुबला होने का चूर्ण, केश निखार तेल, मृत संजीवनी सुरा, चर्म रोग का तेल, सादी मनुक्का, भांग की मनुक्का किशमिश युक्त अहम थी।
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