युगपुरुष श्रीराम का धरा-अवतरण: चैत्र नवमी की पावन बेला और मर्यादा का अनंत विस्तार
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, हेमंत उपाध्याय।
समय के अनंत प्रवाह में कई सभ्यताएं आईं और ओझल हो गईं, लेकिन एक नाम ऐसा है जो अनगिनत सालों से भारत की धड़कन बना हुआ है- यह नाम है- 'राम'। राम केवल दो अक्षरों का शब्द नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता का वह व्याकरण है जिसके बिना हमारे संस्कार अधूरे हैं। 26 मार्च की दोपहर जब चैत्र की सुनहरी धूप अयोध्या की गलियों से लेकर इंदौर के हृदयस्थल ऐतिहासिक राजवाड़ा तक बिखरेगी, तब घड़ी की सुइयां केवल समय नहीं बताएंगी, बल्कि उस अलौकिक क्षण की गवाह बनेंगी जब 'मर्यादा' ने मनुष्य का चोला पहनकर इस धरती पर कदम रखा था। अलग-अलग पंचांगों और मतभिन्नता के कारण इस बार 26 और 27 मार्च यानी दो दिन रामनवमी मनाई जाएगी।
तिथि को लेकर अलग-अलग राय
पंडितों के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि महत्वपूर्ण होती है। जहां एक ओर मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना की जाती है, तो दूसरी ओर इस दिन श्री हरि विष्णु के सातवें अवतार भगवान श्री राम का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस साल नवमी तिथि दो दिन होने के कारण असमंसज है कि किस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्मोत्सव मनाया जाए। पंचांग धर्मसिंधु, निर्णय सिंधु के अनुसार रामनवमी के दिन श्री राम का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। इसी कारण रामनवमी का पर्व 26 मार्च को मनाया जाएगा। हालांकि कुछ लोग इस पर्व को अगले दिन मनाएंगे।
चैत्र नवरात्रि का समापन भी
अलग-अलग ज्योतिषियों और पंडितों से चर्चा का सार यह निकला कि रामनवमी केवल एक जन्मदिन नहीं है, यह चैत्र नवरात्रि का समापन है। अध्यात्म कहता है कि जब तक व्यक्ति अपनी आंतरिक शक्ति (नवदुर्गा) को जाग्रत नहीं करता, तब तक उसके भीतर 'राम' (विवेक) का उदय नहीं हो सकता। यह पर्व हमें सिखाता है कि शक्ति का उपयोग सदैव मर्यादा और शांति की स्थापना के लिए होना चाहिए।
ग्रहों ने लिखी दुर्लभ इबारत
पंडितों के अनुसार इस साल पंचांग के पन्नों पर ग्रहों ने एक दुर्लभ इबारत लिखी है। जब चैत्र शुक्ल नवमी का सूर्य उदित होगा तो वह अपने साथ 'शोभन योग' की आभा लेकर आएगा। दोपहर में नवमी तिथि में जब सूर्य अपने उच्चतम शिखर पर होगा, ठीक उसी समय प्रभु श्रीराम का अवतरण काल रहेगा।
साक्षात् विष्णु जी ने भगवान राम के रूप में लिया जन्म
त्रेतायुग में चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में अयोध्या के राजा दशरथ और माता कौशल्या के घर साक्षात् विष्णु जी ने भगवान राम के रूप में सातवें अवतार के रूप में जन्म लिया था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने 'रामचरितमानस' में इसका अद्भुत वर्णन किया है। इस दिन दोपहर 12 बजे (मध्याह्न) जब सूर्य अपने शिखर पर होता है, तब रामलला का प्राकट्य हुआ था, इसीलिए मुख्य पूजा इसी समय की जाती है। यह दोपहर हमें याद दिलाएगी कि 'मर्यादा' का अर्थ स्वयं को बांधना नहीं, बल्कि स्वयं को 'गढ़ना' है। रामनवमी पर केवल उपवास रखना पर्याप्त नहीं है।
शक्ति और शांति का समन्वय ही मूल मंत्र
इस दिन 'शिववास योग' का होना यह संकेत देता है कि शक्ति और शांति का समन्वय ही मूल मंत्र है। शाम होते-होते 'सर्वार्थ सिद्धि' और 'रवि योग' का सक्रिय होना उन साधकों के लिए वरदान है जो जीवन में नई शुरुआत की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ग्रह-गोचरों की गणना बताती है कि इस रामनवमी पर मेष राशि में शुक्र का प्रवेश और गुरु-चंद्र की युति से 'गजकेसरी राजयोग' बन रहा है।
पुराणों के आईने में ' भगवान श्रीराम'
पद्म पुराण में भगवान राम 'नाम' की महिमा का शिखर है। महादेव स्वयं कहते हैं कि राम का एक नाम विष्णु सहस्रनाम के तुल्य है। अग्नि पुराण राम को एक महान 'नीतिज्ञ' और धनुर्धारी योद्धा के रूप में पेश करता है, जो धर्म की स्थापना के लिए शस्त्र उठाने से नहीं हिचकते। श्रीमद्भागवत व विष्णु पुराण में राम 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हैं। वे सिखाते हैं कि एक आदर्श पुत्र और राजा बनने के लिए त्याग की पराकाष्ठा क्या होती है।
राम का धैर्य एक मनोवैज्ञानिक औषधि की तरह
आज के दौर में जहाँ जरा सी असफलता युवाओं को अवसाद की ओर धकेलती है, वहाँ राम का धैर्य एक मनोवैज्ञानिक औषधि की तरह है। निषादराज को गले लगाना और शबरी के जूठे बेर खाना- यह उस दौर की 'सोशल इंजीनियरिंग' थी जिसने समाज के अंतिम व्यक्ति को मुख्यधारा से जोड़ा। राम कल भी सत्य थे, आज भी समाधान हैं और आने वाले कल की सबसे बड़ी प्रेरणा रहेंगे। आइए, इस रामनवमी पर हम केवल दीप न जलाएं, बल्कि राम के उस शील को आत्मसात करें जिसने पत्थर को भी पानी पर तैरा दिया था।
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