दतिया का दंगल: सत्ता की बेदर्द बिसात और नरोत्तम मिश्रा के आंसू; जब अपनों के ही चक्रव्यूह में घिर गया राजनीति का ‘चाणक्य’
KHULASA FIRST
संवाददाता

नरोत्तम के आंसुओं ने फिर साबित किया- राजनीति किसी की सगी नहीं होती
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राजनीति के खेल में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, यह जुमला पुराना है। नया सच यह है कि राजनीति में आपका अपना रसूख भी कभी स्थायी नहीं होता। मध्य प्रदेश की सियासत में ‘गब्बर' और ‘चाणक्य' जैसे भारी-भरकम विशेषणों से नवाजे जाने वाले भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के साथ दतिया के रण में जो कुछ हुआ, वह सत्ता के इसी बेदर्द चरित्र का नया अध्याय है।
दतिया विधानसभा उपचुनाव के इस नाटकीय घटनाक्रम ने एक झटके में यह साफ कर दिया कि आलाकमान के फैसलों के आगे अतीत की वफादारियां और दशकों का कद कितनी बेबसी से घुटने टेक देता है। टिकट कटने की खबर जितनी अप्रत्याशित थी, उसके बाद दतिया की सड़कों पर उबला जनाक्रोश, हिंसक प्रदर्शन और पथराव उतना ही विस्फोटक रहा।
इस पूरे सियासी ड्रामे की सबसे मार्मिक और चौंकाने वाली तस्वीर नामांकन के दिन सजी चुनावी सभा में देखने को मिली। जो नेता कल तक भोपाल से लेकर दिल्ली तक अपनी कड़क आवाज और आक्रामक बयानों के लिए जाना जाता था, जिसके इशारे पर कभी सूबे की प्रशासनिक मशीनरी थर्राती थी, वही नरोत्तम मिश्रा मंच पर माइक थामते ही भीतर तक टूट गए। अपनों के बीच जब दर्द छलका, तो शब्द छोटे पड़ गए और आंखें नम हो गईं।
राजनीति के इस कड़क चेहरे के आंसू देखकर वहां मौजूद समर्थकों की सांसें थम गईं। वे आंसू सिर्फ एक टिकट छूटने की टीस नहीं थे, बल्कि उस राजनीतिक अकिंचनता का अहसास थे, जो सत्ता की मखमली दीवारों के पीछे अक्सर बड़े-बड़े दिग्गजों को झेलनी पड़ती है।
यह वही दतिया है, जिसे कभी नरोत्तम मिश्रा की मर्जी के बिना पत्ता न हिलने वाले अभेद्य किले के रूप में देखा जाता था, लेकिन उपचुनाव की इस बिसात ने साबित कर दिया कि जब संगठन का पहिया घूमता है, तो वह सबसे पहले बड़े चेहरों की जमीन ही नापता है।
समर्थकों का गुस्सा और पथराव अपनी जगह है, लेकिन दिल्ली और भोपाल के बंद कमरों में लिखी गई इस पटकथा ने नरोत्तम को यह कड़वा सबक सिखा दिया है कि वक्त बदलते ही वफादारियों के मायने बदल जाते हैं।
मंच पर रोते हुए नरोत्तम मिश्रा की यह तस्वीर मध्य प्रदेश की चुनावी तारीखों में लंबे समय तक याद रखी जाएगी, जो बिना कुछ बोले हर उभरते नेता को यह चेताती रहेगी कि सियासत की धूप बहुत बेदर्द होती है,यहां छांव की गारंटी कोई भी आलाकमान नहीं दे सकता।
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